भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 703
६७४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

परमेष्ठी ब्रह्मा, वीरवर कार्तिकेय तथा गणेशजीके स्थान हैं। गोकर्ण तीर्थमें कोटि-कोटि शिवलिंग विद्यमान हैं। वहाँ पग-पगपर असंख्य तीर्थ मौजूद हैं। सत्ययुगमें महाबल नामक भगवान् शिव श्वेतवर्णके होते हैं, त्रेतामें उनका रंग अत्यन्त लाल हो जाता है, द्वापरमें वे पीत वर्णके और कलियुगमें श्याम वर्णके हो जायँगे। महाबल शिव भयंकर कलियुग प्राप्त होनेपर कोमल भावको प्राप्त होंगे। परम उत्तम गोकर्ण क्षेत्र पश्चिम समुद्रके तटपर है। वह ब्रह्महत्या आदि पापोंको भस्म कर डालता है। इस संसारमें जो ब्रह्मघाती, भूतद्रोही, शठ और अन्यान्य पापी होते हैं, वे सब गोकर्ण तीर्थमें पहुँचकर वहाँके तीर्थोंमें स्नान करके महाबल नामक शिवजीका दर्शन करनेपर शिवलोकको प्राप्त होते हैं। वहाँ पुण्य तिथियोंको पुण्य नक्षत्र एवं पुण्य दिनमें जो महेश्वर शिवकी पूजा करते हैं, वे सब शिवरूप हो जाते हैं। यदा-कदा जो कोई भी मनुष्य गोकर्ण तीर्थमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। रविवार, सोमवार तथा बुधवारको जब अमावास्या तिथिका योग हो, तब वहाँ समुद्रमें किया हुआ | स्नान, दान, पितृतर्पण, शिवपूजा, जप, होम, व्रतचर्या और ब्राह्मणोंका सत्कार अनन्त फल देनेवाला होता है। महाप्रदोषकी बेलामें भगवान् शिवका पूजन मोक्ष देनेवाला है। माघ मास (फाल्गुन) में जो परम पुण्यमयी कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी आती है, उस दिन शिवलिंग और बिल्वपत्र इन सबका सुयोग दुर्लभ है। अहो! माया कैसी प्रबल है कि जिससे मूढ़ हुए मनुष्य भगवान् शिवकी इस महातिथिको उपवासतक नहीं करते। शिवरात्रिका उपवास, जागरण, भगवान् शंकरके समीप निवास तथा गोकर्ण क्षेत्रका वास इन सबका सुयोग होना मनुष्योंके लिये शिवलोकमें जानेकी सीढ़ी है। राजन्! मैं भी इस समय गोकर्ण तीर्थसे लौटकर आया हूँ। शिवरात्रिको उपवास करके भगवान् शिवका महोत्सव देखकर लौटा हूँ। शिवरात्रिपर वहाँका महान् उत्सव देखनेके लिये सब देशोंसे चारों वर्णोंके लोग आये थे। स्त्री, बालक, वृद्ध तथा चारों आश्रमोंके निवासी वहाँ आकर देवेश्वर शिवका दर्शन करके कृतकृत्यताको प्राप्त हुए। लौटते समय मार्गमें एक अद्भुत आश्चर्यकी बात देखकर मैं परमानन्दमें निमग्न हो कृतार्थ हो गया हूँ।


गोकर्ण क्षेत्रमें शिवरात्रिके शिव-पूजनके माहात्म्यसे एक चाण्डालीका परमधाम-गमन

राजाने पूछा— ब्रह्मन्! आपने मार्गमें कहाँ कौन-सी आश्चर्यकी बात देखी है, वह मुझे भी बताइये।

गौतमजीने कहा— राजन्! गोकर्णसे आते समय एक स्थानपर दोपहरके समय मुझे एक स्वच्छ सरोवर दिखायी दिया। वहाँ जल पीकर मैंने रास्तेकी थकावट दूर की और घनी एवं शीतल छायावाले बरगदके नीचे विश्राम किया।उसी समय थोड़ी ही दूरपर मैंने एक अन्धी, बूढ़ी एवं दुबली-पतली चाण्डालीको देखा। उसका मुँह सूख गया था। उसने कुछ भी भोजन नहीं किया था और वह अनेक प्रकारके रोगोंसे पीड़ित थी। उसके सब अंगोंमें कोढ़का घाव हो गया था तथा उसमें बहुत-से कीड़े पड़ गये थे। उसकी कमरमें पीब और रक्तसे सना हुआ एक फटा-पुराना वस्त्र लिपटा हुआ था। उसे