भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 704
  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६७५

उस दशामें देखकर मुझे बड़ी दया आयी और उसके मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता हुआ मैं क्षणभर वहीं बैठा रहा। इतनेहीमें भगवान् शंकरके पार्षदोंद्वारा लाया जाता हुआ एक विमान देखा, जो अपनी किरणोंसे आकाशमार्गको आलोकित कर रहा था। तब मैंने शीघ्र ही समीप जाकर आकाशमें खड़े हुए उन शिवगणोंसे पूछा—'आपलोगोंको नमस्कार है। मैंने आपलोगोंको पहचान लिया है। आप सभी महादेवजीके चरणोंके सेवक हैं। आपने इस समय जो यहाँ आनेका कष्ट उठाया है, यह आपकी यात्रा सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये हुई है या आपलोगोंको कोई विनोद सूझा है? कृपा करके मुझे बतलाइये। आप यहाँ किसलिये पधारे हैं?'

शिवजीके दूत बोले—मुने! यह सामने जो बूढ़ी चाण्डाली मर रही है, इसीको ले जानेके लिये भगवान् शिवने हमें आदेश दिया है।

यह सुनकर मैंने पूछा—अहो! यह महापापात्मा घोर चाण्डाली इस दिव्य विमानपर बैठनेकी अधिकारिणी कैसे हो सकती है? यह तो जन्मसे लेकर जीवनभर प्रायः अपवित्रतामें ही डूबी रही है। पापमग्ना एवं पापका अनुगमन करनेवाली है। इस दुराचारिणीको आपलोग शिवलोकमें क्यों ले जाना चाहते हैं? इसने कभी शिवजीका पंचाक्षर मन्त्र नहीं जपा, शिवजीका पूजन नहीं किया और न कभी भगवान् शंकरका ध्यान ही किया है? सत्संगसे सदा दूर रहनेवाली इस अत्यन्त क्रोधी स्वभाववाली स्त्रीको आपलोग भगवान् शिवके लोकमें कैसे ले जाना चाहते हैं। अहो! ईश्वरकी इस लीलाका रहस्य देहधारियोंकी समझमें आना कठिन है, जिसमें पापात्मा प्राणी भी दया करके परम पदमें पहुँचाये जाते हैं।

मेरे ऐसा कहनेपर देवाधिदेव भगवान् शिवके दूत इस प्रकार बोले—महामते! यह कर्मोंके परिपाकसे प्राप्त होनेवाली गति देखो, जो कि एक नीच-से-नीच नारी भी आज रोग-शोकसे रहित परम धामपर आरूढ़ हो रही है। इसने पूर्वजन्ममें अन्न-दान आदि नहीं किया था, अतः भूख-प्यास आदि क्लेशोंसे यहाँ पीड़ित हो रही है। इसने जो मदिराके नशेमें अन्धी होकर बड़ा भयंकर पाप कर डाला था, उसीके फलसे यह जन्मान्ध हो गयी। पूर्वजन्ममें इसने जान-बूझकर गायके बछड़ेको खाया था, इसलिये इस जन्ममें यह अतिशय निन्दित चाण्डाली हुई। इसने सदाचारका मार्ग त्यागकर पूर्वजन्ममें व्यभिचारके मार्गको अपनाया था, उसी अकथनीय पापसे इस जन्ममें यह दुराचारिणी और दुर्भाग्यवती हुई। विधवा होकर भी इसने दूसरे पतिका आलिंगन किया, उसी महान् पापके कारण इसके शरीरमें कोढ़के बहुत-से घाव हो गये हैं। इसने कामवेदनासे व्याकुल होकर स्वेच्छानुसार शूद्रसे रमण किया, उस पापके कारण इसे महारक्त पीब और कीड़ोंसे पीड़ित होना पड़ा है। इसने कभी उत्तम व्रतोंका पालन नहीं किया, यज्ञपूजा नहीं की, कुआँ आदि खुदवाने या बगीचे लगानेका काम नहीं किया, उसी पापसे यह सब प्रकारके भोग-साधनोंसे रहित होकर दुःख पा रही है। पूर्वजन्ममें इस मूढ़ स्त्रीने मदिरा-पान किया था, उसी पापसे यह महायक्ष्माकी पीड़ा और हृदय-शूलसे तड़प रही है। मुनिश्रेष्ठ! विवेकी महात्मा यहींपर सब मनुष्योंमें उनके सम्पूर्ण पापचिह्न देखते हैं। यहाँ जो बहुतसे रोगोंद्वारा पीड़ित और पुत्र तथा धनसे हीन हैं, जो दुष्ट लक्षणोंसे क्लेश पानेवाले और लाज छोड़कर भीख माँगनेवाले हैं, वस्त्र, अन्न, पान, शय्या, भूषण और अभ्यंग आदिसे वंचित, कुरूप, विद्याहीन, विकल अंगोंवाले (लूले-लँगड़े आदि), कुत्सित भोजन करनेवाले, दुर्भाग्यवान्, निन्दित तथा दूसरोंके सेवक हैं—ये सभी पूर्वजन्ममें बड़े भारी पापी रहे हैं। इस प्रकार यत्नपूर्वक विचार करके और संसारके मनुष्योंकी