संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 710, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६८१
मुहूर्तमें एक पुत्रको जन्म दिया। तत्पश्चात् अत्यन्त प्याससे व्याकुल हो वह सुन्दर अंगोंवाली रानी जलाशयमें उतरी। इतनेमें ही एक बड़े भारी ग्राहने आकर उसे अपना ग्रास बना लिया। वह बालक पैदा होते ही माता-पितासे हीन हो गया और भूख-प्याससे पीड़ित हो उस सरोवरके किनारे जोर-जोरसे रोने लगा। वह नवजात शिशु जब इस प्रकार क्रन्दन कर रहा था, उसी समय भाग्यवश वहाँ एक श्रेष्ठ ब्राह्मणी आ पहुँची। वह भी अपने एक वर्षके बालकको गोदमें लिये हुए आयी थी। ब्राह्मणी निर्धन और विधवा थी।
घर-घर भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करती थी। उसका नाम उमा था। उसी सती-साध्वी ब्राह्मणीने उस राजकुमारको देखा। उसे अनाथकी भाँति क्रन्दन करते देखकर उसने मन-ही-मन विचार किया—‘अहो! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात दिखायी देती है कि यह नवजात शिशु, जिसकी नाल भी अभीतक नहीं कटी है, पड़ा हुआ है। इसकी माता कहाँ चली गयी। न इसका पिता है न और कोई बन्धु-बान्धव है। यह दीन अनाथ बालक बिना बिस्तरके भूमिपर सो रहा है। यह चाण्डालका पुत्र है या शूद्रका, वैश्यका बालक है या ब्राह्मणका अथवा यह क्षत्रियका शिशु है। इसका निश्चय कैसे किया जाय? मैं इस शिशुको उठाकर अपने सगे पुत्रकी तरह अवश्य पालन कर सकती हूँ; परंतु यह किस कुलका है, यह न जाननेके कारण इसे छूनेका साहस नहीं होता।' वह पतिव्रता ब्राह्मणी जब इस प्रकार कह रही थी, उसी समय कोई संन्यासी महात्मा वहाँ आ गये। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो साक्षात् शंकर हों। उन श्रेष्ठ भिक्षुने उस स्त्रीसे कहा—'ब्राह्मणी! खेद न करो, हृदयकी संशयवृत्ति दूरकर इस बालककी रक्षा करो। इससे तुम्हें शीघ्र ही परम कल्याणकी प्राप्ति होगी।' इतना कहकर वे दयालु भिक्षु तुरंत वहाँसे चले गये। उनके जानेके बाद ब्राह्मणीने विश्वासपूर्वक उस बालकको लेकर अपने घरकी ओर प्रस्थान किया। उस राजकुमारका ब्राह्मणीने अपने बेटेके समान ही पालन-पोषण किया। एकचक्रा नामक नगरमें उस ब्राह्मणीका घर था। वह भिक्षाके अन्नसे ही अपने पुत्र और राजकुमारको भी पालने लगी। ब्राह्मणोंने ब्राह्मणीके तथा राजाके भी पुत्रका संस्कार कर दिया। वे दोनों सर्वत्र सम्मानित होकर दिन-दिन बढ़ने लगे। समय आनेपर उनका उपनयन-संस्कार हुआ। अब वे दोनों बालक एक साथ रहकर नियमोंका पालन करने लगे। दोनों माताके साथ प्रतिदिन भिक्षाके लिये जाते थे। एक दिन वह ब्राह्मणी उन दोनों बालकोंके साथ भीख माँगती हुई दैवयोगसे देव-मन्दिरमें गयी। वहाँ बड़े-बूढ़े ऋषि-मुनि रहा करते थे। उन दोनों बालकोंको देखकर परम बुद्धिमान् शाण्डिल्य नामक मुनिने कहा—‘अहो! दैवका बल बड़ा विचित्र है। कर्मोंका उल्लंघन करना किसी भी जीवके लिये अत्यन्त कठिन है। देखो न, यह बालक दूसरी माताकी शरण लेकर भिक्षासे जीवननिर्वाह करता है। इस ब्राह्मणीको