संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ही श्रेष्ठ माताके रूपमें पाकर ब्राह्मण बालकके साथ ब्राह्मणभावको प्राप्त हो गया है।' शाण्डिल्य मुनिका यह वचन सुनकर ब्राह्मणीको बड़ा विस्मय हुआ। उसने भरी सभामें मुनिको प्रणाम करके पूछा—'ब्रह्मन्! एक संन्यासीके कहनेसे मैं इस बालकको अपने घर ले आयी हूँ। यद्यपि अभीतक इसके कुलका पता नहीं लगा, तथापि मैं पुत्रकी भाँति इसका पालन-पोषण करती हूँ। आप ज्ञानके नेत्रोंसे देखते हैं, अतः आपसे मैं यह जानना चाहती हूँ कि यह बालक किस कुलमें उत्पन्न हुआ है और इसके माता-पिता कौन हैं?'
मुनि बोले—यह विदर्भदेशके राजाका पुत्र है।
इतना कहकर मुनिने उस बालकके पिताके युद्धमें मारे जानेका तथा उसकी माताके ग्राहद्वारा ग्रस्त होनेका सब समाचार पूर्णरूपसे बतलाया। यह सुनकर ब्राह्मणीको और भी आश्चर्य हुआ। अतः उसने फिर प्रश्न किया—'महामुने! वे राजा सम्पूर्ण भोगोंको छोड़कर युद्धमें क्यों मरे और इस बालकको दरिद्रता कैसे प्राप्त हुई? अब दरिद्रताको पूर्णतः नष्ट करके यह पुनः राज्य कैसे प्राप्त करेगा? मेरा यह पुत्र भी भिक्षान्नसे ही जीवन-निर्वाह करता है। अतः इसकी दरिद्रताके निवारणका भी क्या उपाय है, यह बतानेकी कृपा करें?'
शाण्डिल्यने कहा—इस राजकुमारके पिता विदर्भराज पूर्वजन्ममें पाण्ड्य देशके श्रेष्ठ राजा थे। वे सब धर्मोंके ज्ञाता थे और सम्पूर्ण पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करते थे। एक दिन प्रदोषकालमें राजा भगवान् शंकरका पूजन कर रहे थे और बड़ी भक्तिसे त्रिलोकीनाथ महादेवजीकी आराधनामें संलग्न थे। उसी समय नगरमें सब ओर बड़ा भारी कोलाहल मचा। उस उत्कट शब्दको सुनकर राजाने बीचमें ही भगवान् शंकरकी पूजा छोड़ दी और नगरमें क्षोभ फैलनेकी आशंकासे राजभवनसे बाहर निकल गये। इसी समय राजाका महाबली मन्त्री शत्रुको पकड़कर उनके समीप ले आया। वह शत्रु पाण्ड्यराजका ही सामन्त था। उसे देखकर राजाने क्रोधपूर्वक उसका मस्तक कटवा दिया। शिवपूजा छोड़कर नियमको समाप्त किये बिना ही राजाने रातमें भोजन भी कर लिया। इसी प्रकार राजकुमार भी प्रदोषकालमें शिवजीकी पूजा किये बिना ही भोजन करके सो गया। वही राजा दूसरे जन्ममें विदर्भराज हुआ था। शिवजीकी पूजामें विघ्न होनेके कारण शत्रुओंने उसको सुखभोगके बीचमें ही मार डाला। पूर्वजन्ममें जो उसका पुत्र था, वही इस जन्ममें भी हुआ है। शिवजीकी पूजाका उल्लंघन करनेके कारण यह दरिद्रताको प्राप्त हुआ है। इसकी माताने पूर्वजन्ममें छलसे अपनी सौतको मार डाला था। उस महान् पापके कारण ही वह इस जन्ममें ग्राहके द्वारा मारी गयी। मैं सत्य कहता हूँ, परलोकमें हितकी बात कहता हूँ, शास्त्रोंका सार एवं उपनिषदोंका हृदय कहता हूँ, इस भयंकर असार संसारको प्राप्त हुए जीवके लिये ईश्वरके चरणारविन्दोंकी सेवा ही सार वस्तु है। जो प्रदोषकालमें अनन्यचित्त होकर परमेश्वरके चरणारविन्दोंकी पूजा करते हैं, वे इसी संसारमें सदा बढ़नेवाले धन-धान्य, स्त्री-पुत्र, सौभाग्य और सम्पत्तिके द्वारा सबसे बढ़कर होते हैं। ब्राह्मणी! यह तुम्हारा पुत्र पूर्वजन्ममें उत्तम ब्राह्मण था। इसने सारी आयु केवल दान लेनेमें बितायी है। यज्ञ आदि सत्कर्म नहीं किये हैं। इसीलिये यह दरिद्रताको प्राप्त हुआ है। उस दोषका निवारण करनेके लिये अब यह भगवान् शंकरकी शरणमें जाय।