भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 712
  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * | ६८३ ---|---

प्रदोषव्रतकी विधि, इसके पालनसे द्विजकुमार और राजकुमारकी दरिद्रताका निवारण तथा राज्यकी प्राप्ति

सूतजी कहते हैं—मुनिके इस प्रकार कहनेपर साध्वी ब्राह्मणीने उन्हें प्रणाम करके शिवपूजनकी विधिका क्रम पूछा।

शाण्डिल्य बोले—दोनों पक्षोंकी त्रयोदशीको मनुष्य जब निराहार रहे, तब सूर्यास्तसे तीन घड़ी पहले स्नान करे। फिर श्वेत वस्त्र धारण करके धीर पुरुष सन्ध्या और जप आदि नित्यकर्मकी विधि पूरी करके मौन हो शास्त्रविधिका पालन करते हुए भगवान् शिवकी पूजा प्रारम्भ करे। भगवद्विग्रहके आगेकी भूमिको नये निकाले हुए शुद्ध जलसे भलीभाँति लीप-पोतकर सुन्दर मण्डल बनावे। धौत-वस्त्र आदिके द्वारा उस मण्डलको सब ओरसे घेर दे। ऊपरसे चाँदौवा आदि लगाकर फल-फूल और नवीन अंकुरोंसे उसको सजावे। मण्डलके मध्यकी भूमिमें पाँच रंगोंसे युक्त विचित्र कमल अंकित करके उसीपर सुस्थिर एवं उत्तम आसन बिछाकर बैठे और हृदयमें भक्तिभावसे युक्त हो पूजाकी सब सामग्री एकत्र करे। फिर पवित्र भावसे शास्त्रोक्त मन्त्रद्वारा देवपीठको आमन्त्रित करे। तत्पश्चात् क्रमशः आत्मशुद्धि और भूतशुद्धि आदि करके तीन प्राणायाम करे। उसके बाद विन्दुयुक्त बीजाक्षरोंके द्वारा विधिपूर्वक मातृकान्यास करे। तदनन्तर परा देवताका ध्यान करके मातृकान्यासकी विधि पूरी करे। फिर परम शिवका ध्यान करके पीठके वाम भागमें गुरुको प्रणाम करे, दक्षिण भागमें गणेशजीको मस्तक झुकावे, दोनों अंशों (कन्धों) और ऊरुओं (जाँघों) में धर्म आदि (धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य) का न्यास करे। नाभि तथा पार्श्वभागोंमें अधर्म (अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य) आदिका न्यास करे। तत्पश्चात् हृदयमें अनन्त आदिका न्यास करके देवपीठपर मन्त्रका न्यास करे। आधारशक्तिसे लेकर ज्ञानात्मातकका क्रमशः न्यास करके हृदयमें एक कमलकी भलीभाँति भावना करे। वह कमल नौ शक्तियोंसे युक्त एवं परम सुन्दर हो। उसी कमलकी कर्णिकामें कोटि-कोटि चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान उमापति भगवान् शिवका ध्यान करे। भगवान्‌के तीन नेत्र हैं। मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट शोभा पाता है। जटाजूट कुछ-कुछ पीला हो गया है। उसपर रत्नजटित किरीट सुशोभित है। उनके कण्ठमें नील चिह्न है और अंग-अंगसे उदारता सूचित होती है। सर्पोंके हारसे उनकी बड़ी शोभा हो रही है। उनके एक हाथमें वरद और दूसरेमें अभयकी मुद्रा है। वे फरसा धारण करते हैं। उन्होंने नागोंका कंकण, केयूर, अंगद तथा मुद्रिका धारण कर रखी है। वे व्याघ्रचर्म पहने हुए रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनके वाम भागमें गिरिराजनन्दिनी उमादेवीका चिन्तन करे। इस प्रकार महादेवजी तथा गिरिजादेवीका ध्यान करके क्रमशः गन्ध आदिसे उनकी मानसिक पूजा करे। पाँच वैदिक मन्त्रोंसे गन्ध आदि द्वारा पूर्वोक्त पाँच स्थानोंमें अथवा हृदयमें पूजा करे। फिर मूलमन्त्रसे तीन बार हृदयमें ही पुष्पांजलि दे। उसके बाद बाह्यपीठ (सिंहासन) पर महादेवजीका पुनः पूजन प्रारम्भ करे। पूजाके आरम्भमें एकाग्रचित्त होकर संकल्प पढ़े। तदनन्तर हाथ जोड़कर मन-ही-मन भगवान् शिवका ध्यान एवं आवाहन करे—‘हे भगवान् शंकर! आप ऋण, पातक, दुर्भाग्य और दरिद्रता आदिकी निवृत्तिके लिये तथा सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेके लिये मुझपर प्रसन्न होइये। मैं दुःख और शोककी आगमें जल रहा हूँ, संसारभयसे पीड़ित हूँ, अनेक प्रकारके रोगोंसे व्याकुल और दीन हूँ। वृषवाहन! मेरी रक्षा कीजिये। देवदेवेश्वर! सबको निर्भय