भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 713

६८४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


कर देनेवाले महादेवजी! आप यहाँ पधारिये और मेरी की हुई इस पूजाको पार्वतीजीके साथ ग्रहण कीजिये।' इस प्रकार संकल्प और आवाहन करके पूजा आरम्भ करनी चाहिये। तत्पश्चात् मनुष्य एकाग्रचित्त हो रुद्रसूक्तका पाठ करते हुए वहाँ स्थापित किये हुए शंखके जलसे और पंचामृतसे महादेवजीका अभिषेक करके भाँति-भाँतिके मन्त्रोंसे आसन आदि उपचारोंको समर्पित करे। भावनाद्वारा दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित स्वर्णसिंहासनकी कल्पना करे और उसीपर भगवान्‌को विराजमान करके अष्टगुणयुक्त अर्घ्य और पाद्य निवेदन करे। फिर शुद्ध जलसे आचमन कराकर मधुपर्क दे। उसके बाद पुनः आचमनके लिये जल देकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नान करावे। फिर यज्ञोपवीत, वस्त्र और आभूषण अर्पण करे। परम पवित्र अष्टांगयुक्त चन्दन चढ़ावे। बिल्व, मदार, लाल कमल, धतूर, कनेर, सनईका फूल, चमेली, कुशा, अपामार्ग, तुलसी, जूही, चम्पा, भटकटइया और करवीरके फूलोंमेंसे जितने मिल जायँ, उन सबको शिवोपासक भगवान् शिवपर चढ़ावे। इनके अतिरिक्त भी नाना प्रकारके सुगन्धित पुष्प निवेदन करे। तत्पश्चात् लाल चन्दनसे उत्पन्न धूप और निर्मल दीप समर्पित करे। उसके बाद हाथ धोकर घी, नमकीन और साग, मिठाई, पूआ, शक्कर तथा गुड़के बने हुए पदार्थ एवं खीरका नैवेद्य भोग लगावे। मधु, दही और जल भी अर्पण करे। उस खीरका ही मन्त्रद्वारा प्रज्वलित की हुई अग्निमें हवन करे। यह होम शास्त्रोक्तविधिसे आचार्यके कथनानुसार सम्पन्न करना चाहिये। भगवान् शंकरको नैवेद्य देकर मुखशुद्धिके लिये उत्तम ताम्बूल अर्पण करे। धूप, आरती, सुन्दर छत्र, उत्तम दर्पणको वैदिक-तान्त्रिक मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक समर्पित करे। यदि यह सब करनेकी अपनेमें शक्ति न हो, अधिक धनका अभाव हो, तो अपने पास जितना धन हो, उसीके अनुसार भगवान्‌की पूजा करे। गौरीपति भगवान् शंकर भक्तिपूर्वक भेंट किये हुए पुष्पमात्रसे भी सन्तुष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके भगवान्‌को साष्टांग प्रणाम करे। फिर परिक्रमा करके पूजा समर्पित करनेके पश्चात् विधिपूर्वक श्रीगिरिजापतिकी प्रार्थना करे।

'देव! जगन्नाथ! आपकी जय हो। सनातन शंकर! आपकी जय हो। सम्पूर्ण देवताओंके अधीश्वर! आपकी जय हो। सर्वदेवपूजित! आपकी जय हो। सर्वगुणातीत! आपकी जय हो। सबको वर देनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। नित्य, आधाररहित, अविनाशी विश्वम्भर! आपकी जय हो, जय हो। सम्पूर्ण विश्वके लिये एकमात्र जानने योग्य महेश्वर! आपकी जय हो। नागराज वासुकिको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। गौरीपते! आपकी जय हो। चन्द्रार्धशेखर शम्भो! आपकी जय हो। कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी शिव! आपकी जय हो। अनन्त गुणोंके आश्रय! आपकी जय हो। भयंकर नेत्रोंवाले रुद्र! आपकी जय हो। अचिन्त्य! निरंजन! आपकी जय हो। नाथ! दयासिन्धो! आपकी जय हो। भक्तोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। दुस्तर संसारसागरसे पार उतारनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। महादेव! मैं संसारके दुःखोंसे पीड़ित एवं खिन्न हूँ, मुझपर प्रसन्न होइये। परमेश्वर! समस्त पापोंके भयका अपहरण करके मेरी रक्षा कीजिये। मैं महान् दारिद्र्यके समुद्रमें डूबा हुआ हूँ। बड़े-बड़े पापोंने मुझे आक्रान्त कर लिया है। मैं महान् शोकसे नष्ट और बड़े-बड़े रोगोंसे व्याकुल हूँ। सब ओरसे ऋणके भारसे लदा हुआ हूँ। पापकर्मोंकी आगमें जल रहा हूँ और ग्रहोंसे पीड़ित हो रहा हूँ। शंकर! मुझपर प्रसन्न होइये*।'


* जय देव जगन्नाथ जय शंकर शाश्वत । जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित ॥
जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद । जय नित्य निराधार जय विश्वम्भराव्यय ॥