भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 714
  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६८५

निर्धन मनुष्य इस प्रकार पूजाके अन्तमें भगवान् गिरिजापतिकी प्रार्थना करे। धनाढ्य अथवा राजाको इस प्रकार भगवान् शंकरकी प्रार्थना करनी चाहिये— 'हे शंकरजी ! आपके प्रसादसे मेरे सदा आनन्द रहे। मेरे राज्यमें लुटेरे न रहें, सब लोग निरापद होकर रहें। पृथ्वीपर अकाल, महामारी आदिके सन्ताप शान्त हो जायँ। सबकी खेती धन-धान्यसे समृद्ध हो। सम्पूर्ण दिशाओंमें सुखका साम्राज्य छा जाय।' इस प्रकार प्रदोषव्रतके दिन गिरिजापति भगवान् शंकरकी आराधना करे, ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा देकर सन्तुष्ट करे। इस प्रकार मैंने सब पापोंका नाश, सब प्रकारकी दरिद्रताका निवारण तथा समस्त मनोवांछित वस्तुओंका दान करनेवाली शिवपूजाका वर्णन किया। यह शिवकी पूजा शिवजीके द्रव्यका हरण करनेके पापको छोड़कर शेष सभी महापातकों और उपपातकोंके महान् समुदायका नाश करती है। यदि ये दोनों बालक इसी प्रकार भगवान् शंकरका पूजन प्रत्येक प्रदोषके दिन करते रहें, तो वर्षभरके भीतर ही इन्हें उत्तम सिद्धिकी प्राप्ति होगी।

शाण्डिल्य मुनिका यह वचन सुनकर उस ब्राह्मणीने दोनों बालकोंके साथ मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'भगवन् ! आज मैं आपके दर्शनमात्रसे कृतार्थ हो गयी। ये दोनों बालक आजसे आपकी शरणमें हैं। ब्रह्मन् ! यह मेरा पुत्र है और इसका नाम शुचिव्रत है और यह राजकुमार है, जिसका नाम मैंने धर्मगुप्त रख दिया है। ये दोनों बालक और मैं सभी आपके चरणोंके दास हैं। इस घोर दारिद्र्यसागरमें गिरे हुए हम सबका आप उद्धार कीजिये।'

इस प्रकार शरणमें आयी हुई ब्राह्मणीको अमृतके समान मधुर वचनोंद्वारा आश्वासन देकर मुनिने उसके दोनों बालकोंको भगवान् शंकरके आराधनकी मन्त्र-विद्याका उपदेश दिया। तत्पश्चात् दोनों बालक और ब्राह्मणी मुनिकी आज्ञा ले वहाँसे चले गये। मुनिवरके उपदेशानुसार दोनों बालक प्रत्येक प्रदोषव्रतके दिन पार्वतीवल्लभ शिवकी आराधना करने लगे। इस प्रकार शिवपूजा करते हुए द्विजकुमार और राजकुमारके चार महीने सुखपूर्वक बीत गये। एक दिन द्विजकुमार राजकुमारको साथ लिये बिना ही नदीके तटपर स्नान करनेके लिये गया और वहाँ मौजसे देरतक इधर-उधर घूमता रहा। वहाँ झरनेके जलके आघातसे खाईंकी भूमि कट जानेसे उसमें गड़ा हुआ एक बड़ा भारी खजानेका कलश चमक रहा था, जिसपर ब्राह्मणकुमारकी दृष्टि पड़ी। उसे देखकर वह सहसा हर्ष और कौतूहलमें भरकर उसके समीप गया और उसे देवताके प्रसादसे प्राप्त हुआ मानकर सिरपर लेकर घरको चल दिया तथा घरके भीतर उस घड़ेको रखकर मातासे कहा—'माँ! यह भगवान् शंकरका प्रसाद तो देखो, उन्होंने दया करके घड़ेके रूपमें यह खजाना दिखला दिया।' तब उस पतिव्रता ब्राह्मणीने राजकुमारको भी बुलाकर कहा—'पुत्रो ! इस खजानेके घड़ेको तुम दोनों आपसमें बराबर-बराबर बाँट लो।' माताकी बातको सुनकर ब्राह्मणके पुत्रको प्रसन्नता हुई। किंतु राजपुत्रने उससे कहा—'माँ! यह तुम्हारे ही पुत्रके पुण्यसे प्राप्त हुआ है, अतः मैं इस खजानेको बाँटकर लेना नहीं चाहता हूँ। अपने पुण्यसे प्राप्त हुए खजानेका ये स्वयं ही उपभोग करें। वे ही भगवान्


जय विश्वैकवेद्येश जय नागेन्द्रभूषण। जय गौरीपते शम्भो जय चन्द्रार्धशेखर॥
जय कोट्यर्कसंकाश जयानन्तगुणाश्रय। जय रुद्र विरूपाक्ष जयाचिन्त्य निरञ्जन॥
जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिभञ्जन। जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो॥
प्रसीद मे महादेव संसारार्तस्य खिद्यतः। सर्वपापभयं हत्वा रक्ष मां परमेश्वर॥
महादारिद्र्यमग्नस्य महापापहतस्य च। महाशोकविनष्टस्य महारोगातुरस्य च॥
ऋणभारपरीतस्य दह्यमानस्य कर्मभिः। ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य प्रसीद मम शंकर॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० ७।५९-६६)