भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

शंकर मुझपर भी कृपा करेंगे।' इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करते हुए उन दोनों कुमारोंका उसी घरमें एक वर्ष व्यतीत हो गया। एक दिन राजकुमार उस ब्राह्मणकुमारके साथ वसन्त-ऋतुमें वनमें भ्रमण करनेके लिये गया। कुछ दूर जानेपर उन्होंने सैकड़ों गन्धर्वकन्याओंको परस्पर क्रीडा करते हुए देखा। उन्हें देखकर ब्राह्मणकुमारने दूरसे ही राजकुमारसे कहा- 'यहाँसे आगे जाना उचित नहीं है; क्योंकि उधर स्त्रियाँ विहार कर रही हैं। स्वच्छ अन्तःकरणवाले विद्वान् पुरुष स्त्रियोंका सामीप्य त्याग देते हैं। ये रमणियाँ छल करनेवाली तथा वाणीद्वारा अनुनय-विनय करनेमें कुशल हैं। ये पुरुषोंको अपनी दृष्टिमात्रसे मोहित कर लेती हैं। इसलिये अपने धर्ममें तत्पर ब्रह्मचारी कभी स्त्रियोंके समीप जाकर उनके साथ वार्तालाप न करे।' ऐसा कहकर ब्राह्मणकुमार लौट पड़ा और दूर जाकर खड़ा हो गया। किंतु राजकुमार अकेला ही निर्भय होकर स्त्रियोंकी उस क्रीडास्थलीकी ओर चला गया। उन गन्धर्वकन्याओंमेंसे एकने राजकुमारको आते देख मन-ही-मन कुछ विचार किया और सखियोंसे कहा- 'सहेलियो ! यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक उत्तम वन है, जहाँ विचित्र चम्पा, अशोक, पुन्नाग और वकुल आदि वृक्ष खिले हुए हैं। वहाँ जाकर तुम सब लोग फूल तोड़ो। तबतक मैं यहीं बैठी हूँ। तुम फूलोंका संग्रह करके पुनः यहाँ आ जाना।' उसके इस प्रकार आदेश देनेपर सखियाँ वनके भीतर चली गयीं और वह गन्धर्वकन्या राजकुमारपर दृष्टि लगाये वहीं खड़ी रही। उसे देखकर राजकुमार कामदेवके बाणोंसे पीड़ित हो गया। गन्धर्वकन्याने अपने पास आये हुए राजकुमारको बैठनेके लिये कोमल पल्लवोंका आसन दिया और पूछा- 'कमलनयन ! तुम कौन हो? किस देशसे यहाँ आये हो और किसके पुत्र हो?' इस प्रकार पूछनेपर राजकुमारने अपना पूरा परिचय बतलाया- 'मैं विदर्भराजका पुत्र हूँ। मेरे पिता-माता बचपनमें ही मर गये हैं। शत्रुओंने मेरे राज्यपर अधिकार जमा लिया है और मैं दूसरेके राज्यमें गुजारा करता हूँ।'

ये सारी बातें बताकर राजकुमारने उस गन्धर्वकन्यासे पूछा- सुन्दरी ! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारा क्या कार्य है और तुम किसकी पुत्री हो? उनके इस प्रकार पूछनेपर कन्याने कहा- 'महाराजकुमार ! एक द्रविक नामक गन्धर्व हैं, जो समस्त गन्धर्वकुलके अगुआ माने जाते हैं। मैं उन्हींकी पुत्री हूँ और मेरा नाम अंशुमती है। सब सखियोंको छोड़कर मैं यहाँ अकेली हूँ। मैं तुम्हारी अभिलाषा जानती हूँ। तुम्हारा मन मुझमें आसक्त हो गया है। इसी प्रकार दैवने मेरे मनमें भी तुम्हारे लिये उत्कण्ठा भर दी है। अब हम दोनोंका स्नेह कभी भंग नहीं होना चाहिये।' ऐसा कहकर गन्धर्वकुमारीने शीघ्र ही अपने गलेसे मोतीका हार निकालकर प्रेमपूर्वक राजकुमारको भेंट किया। उस अद्भुत हारको देखकर राजकुमारने पूछा- 'भीरु ! मैं एक बात कहता हूँ। मैं राज्यहीन और निर्धन हूँ। तुम मेरी प्रिया कैसे होना चाहती हो? मूर्ख स्त्रीकी भाँति पिताकी आज्ञाका उल्लंघन करके अपनी इच्छाके अनुसार आचरण क्यों करती हो?' यह सुनकर गन्धर्वकन्याने कहा- 'प्रियतम ! आपका कहना ठीक है। मैं पिताकी आज्ञाके विरुद्ध नहीं करूँगी। आप इस समय घरको पधारें और परसों प्रातःकाल पुनः यहीं दर्शन दें। आपसे कुछ हमारा कार्य है।' इतना कहकर वह गन्धर्वकन्या अपनी सखियोंके आ जानेसे उनके साथ चली गयी और राजकुमार भी हर्षपूर्वक ब्राह्मणकुमारके समीप लौट आया। उसने द्विजपुत्रसे सब बातें बतायीं और उसके साथ घरको प्रस्थान किया। वहाँ पतिव्रता ब्राह्मणीको भी यह शुभ समाचार सुनाकर राजकुमारने प्रसन्न किया तथा पूर्वनिश्‍चित समय आनेपर वह पुनः द्विजपुत्रके साथ वनमें गया।

नियत स्थानपर पहुँचकर राजकुमारने देखा-