संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 730, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ७०१
होनेपर बलवान् राजकुमार भद्रायुने भी यह समाचार सुना कि शत्रुओंने मेरे पिताको बाँध लिया, मेरी माताओंको भी हर लिया और दशार्णदेशका राज्य नष्ट कर दिया है। यह सुनकर राजकुमार भद्रायु सिंहकी भाँति गर्जना करने लगा। उसने शंख और खड्ग ले लिये, कवच पहना और घोड़ेपर सवार हो वह शत्रुओंको जीतनेकी इच्छासे बड़े वेगसे उस स्थानपर आया, जहाँ मागधसेना भरी हुई थी। राजकुमार शीघ्र ही शत्रुओंकी सेनामें घुस गया और धनुषको कानतक खींचकर बाणोंकी वर्षा करने लगा। राजपुत्रके बाणोंकी मार खाकर शत्रु भी उसपर टूट पड़े और बड़े वेगसे भयंकर बाणोंद्वारा उसे घायल करने लगे। युद्धोन्मत्त शत्रुओंके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षासे आहत होकर भी धीर-वीर राजकुमार रणभूमिमें विचलित नहीं हुआ। वह शिवकवचसे पूर्णतः सुरक्षित था। मागध-सैनिकोंकी अस्त्र-वर्षाका सामना करते हुए ही वीरवर भद्रायुने शत्रुसेनामें प्रवेश करके बहुत-से रथों, हाथियों और पैदल सैनिकोंको शीघ्रतापूर्वक मार गिराया। रणभूमिमें ही एक रथीको सारथिसहित मारकर राजकुमारने उस रथपर अधिकार कर लिया और अपने मित्र वैश्यकुमारको सारथि बनाकर युद्धमें विचरण प्रारम्भ किया। ऐसा जान पड़ता था, मानो मृगोंके झुंडमें कोई सिंह भ्रमण कर रहा है। तब शत्रुसेनाके सभी बलवान् सेनापति अपना धनुष उठाये क्रोधमें भरकर केवल उसीकी ओर दौड़ पड़े। यह देख राजकुमार भद्रायु उन आक्रमणकारियोंके सामने अपना भयंकर खड्ग उठाये उन्हें अपना पराक्रम दिखलानेके लिये आगे बढ़ा। चमकती हुई विकराल तलवारको देखते ही सब सेनापति सहसा उसके प्रभावसे प्रतिहत हो प्राणोंसे हाथ धो बैठे। उस रणभूमिमें जो-जो सैनिक उस चमचमाती हुई तलवारको देख लेते थे, उन सबकी तत्काल मृत्यु हो जाती थी। तदनन्तर भद्रायुने शत्रुओंकी सम्पूर्ण सेनाका नाश करनेके लिये अतिशय गर्जना करनेवाले उस महाशंखको बजाया। उस शंख-ध्वनिके सुनते ही सब शत्रु मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। अचेत होकर पृथ्वीपर पड़े हुए शस्त्रहीन सैनिकोंको मृततुल्य मानकर धर्मशास्त्रके ज्ञाता राजकुमारने उनका वध नहीं किया। अपने बँधे हुए पिताको बन्धनमुक्त करके शत्रुओंके वशमें पड़ी हुई अपनी माताओंको भी राजकुमारने छुड़ाया। इसी प्रकार मुख्य-मुख्य मन्त्रियों तथा अन्य पुरवासियोंकी स्त्रियों, बालकों और कन्याओंको गोधन आदिसहित शत्रुओंके भयसे मुक्त करके उन सबको धैर्य बँधाया। तत्पश्चात् राजकुमारने नगरके राजा, मन्त्री तथा मुख्य-मुख्य अधिकारियों और सेनापतियोंको कैद करके बलपूर्वक अपनी पुरीमें प्रवेश कराया। पहले युद्धमें जो लोग चारों दिशाओंमें भाग गये थे, वे सब विश्वस्त होकर लौट आये और राजकुमारका पराक्रम देखकर सबके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। सब लोग सोचने लगे—'अहो! यह कोई योगसिद्ध अथवा तपःसिद्ध पुरुष है, या कोई देवता है। क्योंकि इसने जो महान् कर्म किया है, वह मनुष्यकी शक्तिसे परे है। इस अनन्त शक्तिधारी वीरने नौ अक्षौहिणी सेनाको परास्त किया है।'
इसी समय भद्रायुके पिता राजा वज्रबाहु विस्मय और आह्लादमें डूबे हुए तथा नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाते हुए उसके सामने आये। राजकुमारने प्रेमसे विह्वल होकर पिताको प्रणाम किया। तब राजाने पूछा—'महामते! तुम कौन हो, देवता हो या मनुष्य? अथवा कोई गन्धर्व तो नहीं हो? तुम्हारे माता-पिता कौन हैं, तुम्हारा देश कौन-सा है और तुम्हारा नाम क्या है? तुमने हमें और हमारी स्त्रियोंको किस कारणसे शत्रुओंके बन्धनसे छुड़ाया है? तुम्हारे इस ऋणसे बन्धु-बान्धवोंसमेत मैं हजार जन्मोंमें भी मुक्त नहीं हो सकता। इन पुत्रों, इन पत्नियों तथा इस राज्य और नगरको छोड़कर मेरा चित्त तुम्हींमें प्रेमपूर्वक बँधा हुआ है।'