संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 731, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७०२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
भद्रायु बोला—राजन् ! यह मेरा सखा वैश्यपुत्र है। इसका नाम सुनय है। मैं इसीके सुन्दर गृहमें अपनी माताके साथ निवास करता हूँ। मेरा नाम भद्रायु है। मैं अपना वृत्तान्त पीछे आपको बताऊँगा। इस समय आप स्त्रियों और मित्रजनोंके साथ नगरमें प्रवेश कीजिये और शत्रुओंका भय छोड़कर सुखसे रहिये। जबतक मैं पुनः लौटकर न आऊँ, तबतक इन शत्रुओंको न छोड़ियेगा।
ऐसा कहकर राजकुमार भद्रायु राजाकी आज्ञा ले अपने घरको आया और वहाँ उसने अपनी मातासे सब समाचार कह सुनाया। रानीने प्रसन्न होकर अपने पुत्रको हृदयसे लगा लिया और वैश्यराजने भी प्रेमसे राजकुमारका आलिंगन करके उसका विशेष सत्कार किया। इधर महाराज वज्रबाहु स्त्री, पुत्र और मन्त्रियोंके साथ अपने राजमहलमें प्रवेश करके बहुत प्रसन्न हुए। वह रात्रि व्यतीत होनेपर योगियोंमें श्रेष्ठ ऋषभ महारानी सीमन्तिनीके पति राजा चन्द्रांगदके समीप गये और भद्रायुकी उत्पत्ति तथा उसके अलौकिक पराक्रमका वर्णन करके एकान्तमें प्रेमपूर्वक बोले—‘राजन्! तुम अपनी पुत्री कीर्तिमालिनीका विवाह राजकुमार भद्रायुके साथ करो। इस प्रकार निषधराजको समझाकर योगी ऋषभ चले गये।’
तदनन्तर राजा चन्द्रांगदने वैवाहिक मंगलके लिये उपयुक्त शुभ मुहूर्तमें भद्रायुको बुलाया और अपनी कीर्तिमालिनी नामक पुत्री उसे ब्याह दी। भद्रायुके पिता राजा वज्रबाहुको भी बुलाकर निषधराजने मन्त्रियोंसहित उनकी अगवानी की और नगरमें आनेपर उनका यथावत् सत्कार किया। वज्रबाहुने देखा शत्रुओंका नाश करनेवाला भद्रायु विवाह करके मेरे चरणोंमें प्रणाम कर रहा है। तब उन्होंने बड़े प्रेम और हर्षसे उठाकर उसे हृदयसे लगा लिया तथा निषधराजसे कहा—‘चन्द्रांगदजी ! आपका यह दामाद बड़ा बलवान् है। मैं इसके वंश और जन्मका यथार्थ परिचय सुनना चाहता हूँ।’ उनके इस प्रकार पूछनेपर निषधराजने उनसे एकान्तमें मिलकर हँसते हुए कहा—‘महाराज ! यह आपका ही पुत्र है। शैशवकालमें यह रोगसे पीड़ित था और इसकी माता भी रोगसे व्याकुल रहती थी। अतः आपने मातासहित इस बालकको वनमें त्याग दिया था। बालकके साथ वनमें घूमती हुई वह असहाय नारी दैवयोगसे एक वैश्यके घरमें जा पहुँची। वैश्यने उसकी रक्षा की। फिर आपका यह बालक रोगसे अत्यन्त पीड़ित होकर मर गया। किंतु किसी योगिराजने आकर इसे पुनः जीवित कर दिया। योगिराजका नाम ऋषभ है। शिवयोगी ऋषभके ही प्रभावसे ये माँ, बेटे देवताओंके समान दिव्य रूपको प्राप्त हुए हैं। उन्हींके दिये हुए शत्रुनाशक खड्ग और शंखके द्वारा शिव-कवचसे सुरक्षित हो भद्रायुने युद्धमें शत्रुओंपर विजय पायी है। ये अकेले ही बारह हजार हाथियोंका बल धारण करते हैं। ये सब विद्याओंमें पारंगत हैं और अब मेरे जामाता भी हो गये हैं। अतः आप इन्हें और इनकी पतिव्रता माताको साथ लेकर अपने नगरको जाइये। इससे आप उत्तम कल्याणके भागी होंगे।’
ये सब बातें बताकर राजा चन्द्रांगद अपने रनिवासमें ठहरी हुई राजाकी ज्येष्ठ पत्नीको वहाँ ले आये। वे वस्त्र-आभूषणोंसे विभूषित थीं। उन्होंने वज्रबाहुको रानीसे मिलाया। यह सब वृत्तान्त सुनकर और देखकर राजा वज्रबाहु बहुत लज्जित हुए और मूर्खतावश उनके द्वारा जो अनुचित कर्म हो गया था, उसकी वे स्वयं ही निन्दा करने लगे। पत्नी और पुत्रके दर्शनसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई। उनके सब अंगोंमें रोमांच हो आया और उन्होंने दोनोंको हृदयसे लगा लिया। इस प्रकार निषधराजसे पूजित और प्रशंसित होकर राजा वज्रबाहुने अपनी बड़ी रानीको, राजकुमार भद्रायुको और पुत्रवधू कीर्तिमालिनीको भी साथ ले परिवारसहित अपनी राजधानीको प्रस्थान किया।