भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 736, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 736
* ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड *७०७

सधवा, विधवा, कुमारी तथा रजस्वला सभी तरहकी स्त्रियोंका हरण करके उनके साथ कुकर्म करता था। इस प्रकार दूषित विषयभोगोंमें आसक्त, मत्त एवं मदिरापानमें रत रहनेके कारण मुझे जवानीमें ही यक्ष्मा आदि बड़े-बड़े रोगोंने घेर लिया। मन्त्रियों और सेवकोंने भी मुझे त्याग दिया। अन्तमें अपने ही कुकर्मके कारण मैं मर गया। जो मनुष्य धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है, उसकी आयु नष्ट होती है, अयश बढ़ता है, भाग्य क्षीण होता है। वह अत्यन्त दुर्गतिमें पड़ता है तथा उसके पूर्वज पितर स्वर्गसे निश्चय ही गिर जाते हैं*। मृत्युके पश्चात् यमराजके दूत मुझे यमलोक ले गये। वहाँ मैं भयंकर नरककुण्डमें डाल दिया गया। उस कुण्डके भीतर यमदूतोंसे पीड़ित होकर मुझे तीस हजार वर्षोंतक रहना पड़ा। तदनन्तर बचे हुए पापके फलसे मैं निर्जन वनमें भूख-प्याससे विकल पिशाच हुआ। पिशाचयोनिमें मैंने एक सौ दिव्य वर्ष व्यतीत किये। फिर दूसरे जन्ममें व्याघ्र, तीसरेमें अजगर, चौथेमें भेड़िया, पाँचवेंमें सूअर, छठेमें गिरगिट, सातवेंमें कुत्ता, आठवेंमें सियार, नवेंमें गवय (नीलगाय), दसवेंमें मृग, ग्यारहवें जन्ममें वानर, बारहवेंमें गीध, तेरहवेंमें नेवला, चौदहवेंमें कौआ, पंद्रहवेंमें रीछ, सोलहवेंमें वनमुर्गा, सत्रहवेंमें गदहा, अठारहवेंमें बिलाव, उन्नीसवेंमें मेढक, बीसवेंमें कछुआ, इक्कीसवेंमें मछली, बाईसवेंमें चूहा, तेईसवेंमें उल्लू, चौबीसवेंमें जंगली हाथी और पचीसवें जन्ममें मैं ब्रह्मराक्षस हुआ। इस समय आपके शरीरके स्पर्शमात्रसे मेरी पूर्वजन्मोंकी स्मृति जाग उठी है। आपके संगसे मेरे मनमें वैराग्य एवं प्रसन्नता हुई है। महामते! ऐसा प्रभाव आपको कैसे प्राप्त हुआ?

वामदेवजी बोले—यह मेरे शरीरमें लगे हुए भस्मका महान् प्रभाव है। भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कौन है, जो भस्मकी शक्तिको जानता हो। महादेवजीका जैसा माहात्म्य है, वैसा ही भस्मका भी है। भस्मके संसर्गसे तुम्हारी बुद्धि भी निर्मल हो गयी। अतः तुम भी श्रद्धासे पवित्र त्रिपुण्ड्र धारण करो।

महातपस्वी शिवयोगी वामदेवने इस प्रकार भस्मका माहात्म्य बतलाकर भस्मको अभिमन्त्रित करके उसे घोर ब्रह्मराक्षसको दिया। उससे ब्रह्मराक्षसने अपने ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण किया और उसके प्रभावसे वह तत्काल ब्रह्मराक्षस-शरीरका त्याग करके दिव्य स्वरूपसे सुशोभित होने लगा। उसने भक्तिपूर्वक गुरु वामदेवकी परिक्रमा की और दिव्य विमानपर बैठकर पुण्य-लोकको प्रस्थान किया। महायोगी वामदेव साक्षात् शिवकी ही भाँति पुनः संसारमें भ्रमण करने लगे।

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भस्मकी महिमा, शबरकी चिताभस्मद्वारा की हुई पूजासे शिवजीकी प्रसन्नता और उसकी जली हुई पत्नीका पुनः जीवित होना

सूतजी कहते हैं—श्रद्धा ही सम्पूर्ण धर्मोंके लिये अत्यन्त हितकर है। श्रद्धासे ही मनुष्योंको दोनों लोकोंमें सिद्धि प्राप्त होती है। श्रद्धासे भजन करनेवाले पुरुषको पत्थरकी मूर्ति भी फल देनेवाली होती है। श्रद्धा-भक्तिसे पूजा करनेपर अज्ञानी गुरु भी सिद्धिदायक हो जाता है। श्रद्धासे


* आयुर्विनश्यत्ययशो विवर्धते भाग्यं क्षयं यात्यतिदुर्गतिं व्रजेत्। स्वर्गाच्च्यवन्ते पितरः पुरातना धर्मव्यपेतस्य नरस्य निश्चितम् ॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १५। ३५)

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