भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
* ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड *७०७

सधवा, विधवा, कुमारी तथा रजस्वला सभी तरहकी स्त्रियोंका हरण करके उनके साथ कुकर्म करता था। इस प्रकार दूषित विषयभोगोंमें आसक्त, मत्त एवं मदिरापानमें रत रहनेके कारण मुझे जवानीमें ही यक्ष्मा आदि बड़े-बड़े रोगोंने घेर लिया। मन्त्रियों और सेवकोंने भी मुझे त्याग दिया। अन्तमें अपने ही कुकर्मके कारण मैं मर गया। जो मनुष्य धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है, उसकी आयु नष्ट होती है, अयश बढ़ता है, भाग्य क्षीण होता है। वह अत्यन्त दुर्गतिमें पड़ता है तथा उसके पूर्वज पितर स्वर्गसे निश्चय ही गिर जाते हैं*। मृत्युके पश्चात् यमराजके दूत मुझे यमलोक ले गये। वहाँ मैं भयंकर नरककुण्डमें डाल दिया गया। उस कुण्डके भीतर यमदूतोंसे पीड़ित होकर मुझे तीस हजार वर्षोंतक रहना पड़ा। तदनन्तर बचे हुए पापके फलसे मैं निर्जन वनमें भूख-प्याससे विकल पिशाच हुआ। पिशाचयोनिमें मैंने एक सौ दिव्य वर्ष व्यतीत किये। फिर दूसरे जन्ममें व्याघ्र, तीसरेमें अजगर, चौथेमें भेड़िया, पाँचवेंमें सूअर, छठेमें गिरगिट, सातवेंमें कुत्ता, आठवेंमें सियार, नवेंमें गवय (नीलगाय), दसवेंमें मृग, ग्यारहवें जन्ममें वानर, बारहवेंमें गीध, तेरहवेंमें नेवला, चौदहवेंमें कौआ, पंद्रहवेंमें रीछ, सोलहवेंमें वनमुर्गा, सत्रहवेंमें गदहा, अठारहवेंमें बिलाव, उन्नीसवेंमें मेढक, बीसवेंमें कछुआ, इक्कीसवेंमें मछली, बाईसवेंमें चूहा, तेईसवेंमें उल्लू, चौबीसवेंमें जंगली हाथी और पचीसवें जन्ममें मैं ब्रह्मराक्षस हुआ। इस समय आपके शरीरके स्पर्शमात्रसे मेरी पूर्वजन्मोंकी स्मृति जाग उठी है। आपके संगसे मेरे मनमें वैराग्य एवं प्रसन्नता हुई है। महामते! ऐसा प्रभाव आपको कैसे प्राप्त हुआ?

वामदेवजी बोले—यह मेरे शरीरमें लगे हुए भस्मका महान् प्रभाव है। भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कौन है, जो भस्मकी शक्तिको जानता हो। महादेवजीका जैसा माहात्म्य है, वैसा ही भस्मका भी है। भस्मके संसर्गसे तुम्हारी बुद्धि भी निर्मल हो गयी। अतः तुम भी श्रद्धासे पवित्र त्रिपुण्ड्र धारण करो।

महातपस्वी शिवयोगी वामदेवने इस प्रकार भस्मका माहात्म्य बतलाकर भस्मको अभिमन्त्रित करके उसे घोर ब्रह्मराक्षसको दिया। उससे ब्रह्मराक्षसने अपने ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण किया और उसके प्रभावसे वह तत्काल ब्रह्मराक्षस-शरीरका त्याग करके दिव्य स्वरूपसे सुशोभित होने लगा। उसने भक्तिपूर्वक गुरु वामदेवकी परिक्रमा की और दिव्य विमानपर बैठकर पुण्य-लोकको प्रस्थान किया। महायोगी वामदेव साक्षात् शिवकी ही भाँति पुनः संसारमें भ्रमण करने लगे।

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भस्मकी महिमा, शबरकी चिताभस्मद्वारा की हुई पूजासे शिवजीकी प्रसन्नता और उसकी जली हुई पत्नीका पुनः जीवित होना

सूतजी कहते हैं—श्रद्धा ही सम्पूर्ण धर्मोंके लिये अत्यन्त हितकर है। श्रद्धासे ही मनुष्योंको दोनों लोकोंमें सिद्धि प्राप्त होती है। श्रद्धासे भजन करनेवाले पुरुषको पत्थरकी मूर्ति भी फल देनेवाली होती है। श्रद्धा-भक्तिसे पूजा करनेपर अज्ञानी गुरु भी सिद्धिदायक हो जाता है। श्रद्धासे


* आयुर्विनश्यत्ययशो विवर्धते भाग्यं क्षयं यात्यतिदुर्गतिं व्रजेत्। स्वर्गाच्च्यवन्ते पितरः पुरातना धर्मव्यपेतस्य नरस्य निश्चितम् ॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १५। ३५)

७०८
* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


जप किया हुआ मन्त्र अव्यवस्थित होनेपर भी फलदाता होता है। श्रद्धासे पूजा करनेपर देवता नीच पुरुषको भी फल देनेवाले होते हैं। अश्रद्धासे की हुई पूजा, दान, यज्ञ, तप और व्रत सभी निष्फल होते हैं, जैसे बाँझ वृक्षका फूल व्यर्थ होता है। जो सर्वत्र संशययुक्त, श्रद्धाहीन और अत्यन्त चपल होता है, वह परमार्थसे भ्रष्ट होकर संसार-बन्धनसे मुक्त नहीं हो पाता। मन्त्र, तीर्थ, ब्राह्मण, देवता, ज्योतिषी, ओषधि तथा गुरुमें जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसी सिद्धि प्राप्त होती है*।

इस विषयमें एक अत्यन्त अद्भुत उपाख्यान बतलाया जाता है, जिसके श्रवणसे सब मनुष्योंकी अश्रद्धा तत्काल दूर हो जाती है। पूर्वकालमें पांचाल देशके राजाके सिंहकेतु नामसे विख्यात एक पुत्र था, जो समस्त उत्तम गुणोंसे युक्त और सदा क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाला था। एक दिन महाबली सिंहकेतु कुछ सेवकोंको साथ लेकर शिकार खेलनेके लिये वनमें गया। राजकुमारका कोई सेवक, जो शबर (भील) कुलमें उत्पन्न हुआ था, शिकारकी खोजमें इधर-उधर घूम रहा था। उसने एक टूटा-फूटा, गिरा-पड़ा पुराना देवालय देखा। उसमें चबूतरेपर एक शिवलिंग पड़ा था, जो पीठ (जलेरी)-से टूटकर अलग हो गया था। वह शिवलिंग सीधा और सूक्ष्म था। शबरने उसे मूर्तिमान् सौभाग्यकी भाँति देखा। पूर्वकर्मसे प्रेरित होकर उसने उस शिवलिंगको शीघ्रतापूर्वक उठा लिया और बुद्धिमान् राजपुत्रको दिखाया—

'प्रभो! देखिये, यह कैसा सुन्दर शिवलिंग है। मैंने इसे यहीं देखा है। मैं आदरपूर्वक इसकी पूजा करूँगा। आप मुझे पूजाकी विधि बता दें, जिससे मन्त्र न जाननेवाले मुझ-जैसे पुरुषोंके द्वारा भी की हुई पूजासे भगवान् शिव प्रसन्न हों।'

निषादके इस प्रकार पूछनेपर परिहासकुशल राजकुमारने हँसकर कहा—शिवलिंगको शुद्ध आसनपर स्थापित करके सदा संकल्पपूर्वक नूतन जलसे अभिषेक करे। शुभ गन्ध, अक्षत, वनके नये-नये पत्र, पुष्प तथा धूप-दीप आदिके द्वारा पूजन करे। चिताका भस्म चढ़ावे और अपने भोजन करनेयोग्य अन्नके द्वारा भगवान्‌को नैवेद्य लगावे। पुनः धूप-दीप आदि उपचारोंको अर्पित करे। यथायोग्य नृत्य, वाद्य और गीत आदिकी भी व्यवस्था करे। फिर नमस्कार करके विधिपूर्वक भगवान्‌का प्रसाद ग्रहण करना चाहिये। यह मैंने तुम्हें शिवपूजनकी साधारण विधि बतलायी है।

अपने स्वामीके इस प्रकार उपदेश देनेपर चण्डक नामवाले शबरने उसे सादर शिरोधार्य किया और अपने घर आकर लिंगमूर्ति महेश्वरका प्रतिदिन पूजन प्रारम्भ किया। वह प्रतिदिन चिता-भस्मका उपहार भेंट करता था। अपने लिये जो-जो वस्तु प्रिय थी, वह सब गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि पहले भगवान् शिवको निवेदन करता। उसके बाद वह भगवत्प्रसादको स्वयं ग्रहण करता था। इस प्रकार वह पत्नीके साथ भक्तिपूर्वक महेश्वरकी पूजामें संलग्न रहा। इस


* श्रद्धैव सर्वधर्मस्य चातीव हितकारिणी। श्रद्धयैव नृणां सिद्धिर्जायते लोकयोर्द्वयोः॥
श्रद्धया भजतः पुंसः शिलापि फलदायिनी। मूर्खोऽपि पूजितो भक्त्या गुरुर्भवति सिद्धिदः॥
श्रद्धया पठितो मन्त्रस्त्वबद्धोऽपि फलप्रदः। श्रद्धया पूजितो देवो नीचस्यापि फलप्रदः॥
अश्रद्धया कृता पूजा दानं यज्ञस्तपो व्रतम्। सर्वं निष्फलतां याति पुष्पं वन्ध्यतरोरिव॥
सर्वत्र संशयाविष्टः श्रद्धाहीनोऽतिचञ्चलः। परमार्थात्परिभ्रष्टः संसृतेर्न हि मुच्यते॥
मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ। यादृशी भावना यत्र सिद्धिर्भवति तादृशी॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १७। ३-८)

  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ७०९

आराधनामें उसके कई वर्ष बीत गये। एक दिन वह शबर जब शिवपूजाके लिये बैठा, तब देखता है कि पात्रमें चिताका भस्म तनिक भी शेष नहीं है। तब वह तुरंत उठकर दूर-दूरतक चिताभस्म ढूँढ़ता हुआ घूम आया, किंतु कहीं भी उसे चिताभस्म नहीं मिला। अन्तमें वह थककर घर लौट आया और अपनी पत्नीको बुलाकर उसने कहा—'प्रिये! चिताभस्म तो मुझे नहीं मिला। बताओ, अब क्या करूँ? आज मुझ पापीके शिव-पूजनमें विघ्न पड़ गया। पूजाके बिना मैं क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता।'

पतिको इस प्रकार व्याकुल देख शबरकी स्त्रीने कहा—नाथ! डरिये मत, मैं एक उपाय बताती हूँ। यह अपना घर बहुत दिनोंका पुराना हो गया है। मैं इसमें आग लगाकर उस अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगी। इससे आपके लिये बहुत-सा चिताभस्म तैयार हो जायगा।

शबर बोला—प्रिये! यह मानव-शरीर ही धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षका सबसे श्रेष्ठ साधन है। इस नवयौवन-सम्पन्न सुखोचित शरीरको क्यों त्याग रही हो?

शबरकी स्त्रीने कहा—जीवनकी सफलता इसीमें है कि दूसरोंके हितके लिये अपने प्राणोंका त्याग किया जाय। फिर साक्षात् शिवके लिये जो स्वयं प्राणत्याग करे, उसके लिये तो कहना ही क्या है? मैंने कौन-सी घोर तपस्या की है, जिससे भगवान् शिवकी प्रीतिके लिये प्रज्वलित अग्निमें अपने शरीरका त्याग करती हूँ।

अपनी पत्नीकी इस प्रकार स्थिरबुद्धि और शिवभक्ति देखकर दृढ़ संकल्पवाले शबरने 'तथास्तु' कहकर उसकी सराहना की। शबरीने स्वामीकी आज्ञा पाकर स्नानसे पवित्र हो अलंकार धारण किया और अपने घरमें आग लगाकर अग्निदेवकी भक्तिपूर्वक परिक्रमा करके अपने पतिदेव गुरुको नमस्कार और हृदयमें भगवान् सदाशिवका ध्यान करके अग्निमें प्रवेश करनेके लिये उद्यत हो हाथ जोड़कर इस प्रकार स्तवन किया—'हे देव! मेरी इन्द्रियाँ आपकी पूजाके लिये पुष्प हों, यह शरीर धूप एवं अगुरु हों, हृदय दीपक हो, प्राण हविष्यका काम दें और कर्मेन्द्रियाँ आपके लिये अक्षत होवें। इस समय यह जीव आपकी पूजाके फलको प्राप्त हो। मैं धनाधिपति कुबेरका पद नहीं चाहती, अविचल स्वर्गभूमिकी भी इच्छा नहीं रखती तथा ब्रह्माजीके पदकी भी अभिलाषा नहीं करती। बस, यही चाहती हूँ कि यदि फिर इस संसारमें मेरा जन्म हो, तो मैं प्रत्येक जन्ममें आपके चरणारविन्दोंके सुन्दर मकरन्दका पान करनेवाली भ्रमरी होऊँ। मेरे देवता! भले ही मेरे सैकड़ों जन्म हों, परंतु अज्ञानकी हेतुभूत माया मेरे चित्तमें प्रवेश न करे। किंचित् आधे क्षणके लिये भी मेरा हृदय आपके चरणकमलोंसे अलग न हो। महेश्वर! आपको नमस्कार है, नमस्कार है*।'

इस प्रकार देवेश्वर भगवान् शिवको प्रसन्न करके दृढ़ निश्चयवाली शबरी प्रज्वलित अग्निमें


* पुष्पाणि सन्तु तव देव ममेन्द्रियाणि धूपोऽगुरूर्वपुरिदं हृदयं प्रदीपः।
प्राणा हवींषि करणानि तवाक्षताश्च पूजाफलं व्रजतु साम्प्रतमेष जीवः॥
वाञ्छामि नाहमपि सर्वधनाधिपत्यं न स्वर्गभूमिकमचलां न पदं विधातुः।
भूयो भवामि यदि जन्मनि जन्मनि स्यां त्वत्पादपङ्कजलसन्मकरन्दभृङ्गी॥
जन्मानि सन्तु मम देव शताधिकानि माया न मे विशतु चित्तममोहहेतुः।
किञ्चित्क्षणार्धमपि ते चरणारविन्दानापैतु मे हृदयमीश नमो नमस्ते॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १७। ४३–४५)

७१०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

प्रवेश कर गयी और क्षणभरमें जलकर भस्म हो गयी। फिर शबरने उस भस्मको लेकर जले हुए घरके समीप ही भगवान् शिवका पूजन किया। पूजनके अन्तमें उसने प्रसाद लेनेको नित्य आनेवाली अपनी प्रियतमाका स्मरण किया। स्मरण करते ही वह पहलेकी भाँति हाथ जोड़कर सामने खड़ी दिखायी दी। पत्नीको देखकर तथा जलकर भस्म हुए घरको भी पूर्ववत् स्थित पाकर शबर आश्चर्यचकित हो सोचने लगा—'अहो! अग्नि तो अपने तेजसे वस्तुको जलाती है, सूर्य केवल किरणोंसे तपाते हैं, राजा अपने दण्डके द्वारा अपराधीको दग्ध करता है और ब्राह्मण मनसे जला डालता है। मेरी पत्नी तो प्रत्यक्ष अग्निमें जल गयी थी। यह जीवित कैसे हो गयी? पता नहीं यह स्वप्न है अथवा भ्रममें डालनेवाली माया।' इस प्रकार विचार करते हुए शबरने अपनी स्त्रीसे पूछा—'प्रिये! तुम तो अग्निमें भस्म हो गयी थी, यहाँ कैसे आ गयी और यह जला हुआ घर फिर पहलेके ही समान खड़ा कैसे हो गया?'

शबरीने कहा—जब मैं घरमें आग लगाकर उसके भीतर प्रविष्ट हुई, तबसे अपने-आपकी मुझे कोई सुध न रही। न तो मैंने आग देखी है और न लेशमात्र भी तापका अनुभव किया है। जान पड़ता था, मानो मैं जलमें घुसी हूँ। मैं आधे क्षणतक गाढ़ निद्रामें सोयी-सी रही और अब क्षणभरमें जाग उठी हूँ। उठते ही मैंने देखा अपना घर जला हुआ नहीं है, पूर्ववत् सुस्थिर है। इस समय भगवान्‌की पूजाके अन्तमें प्रसाद लेनेके लिये आपके पास आयी हूँ।

इस प्रकार वे दोनों दम्पति प्रेमपूर्वक आपसमें वार्तालाप कर रहे थे, इतनेमें ही उनके आगे परम अद्भुत दिव्य विमान प्रकट हुआ। उसपर भगवान् शंकरके चार सेवक आगेकी ओर बैठे थे। उन्होंने दोनों निषाद-दम्पतिका हाथ पकड़कर उन्हें विमानपर बिठा लिया। शबर और शबरीको अपने शरीरका त्याग भी नहीं करना पड़ा। शिवदूतोंके हाथोंका स्पर्श प्राप्त होते ही निषाद-दम्पतिके वे ही शरीर तत्काल उन्हींके समान दिव्य हो गये। इसलिये समस्त पुण्यकर्मोंमें श्रद्धा ही करनी चाहिये, क्योंकि शबरने नीच होकर भी श्रद्धाके बलसे योगियोंकी गति प्राप्त की। सब वर्णके लोगोंसे उत्तम जन्म पानेसे क्या लाभ? सम्पूर्ण शास्त्रोंका विचार करनेवाली विद्यासे भी यदि श्रद्धा न हो, तो क्या लाभ है? जिसके चित्तमें सदा भगवान् शिवकी भक्ति बनी रहती है, उससे बढ़कर तीनों लोकोंमें कौन पुरुष धन्य है।


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उमामहेश्वरव्रतकी महिमा, इसके पालनसे शारदाको शिवलोककी प्राप्ति तथा सत्कथा-श्रवणका माहात्म्य और ब्राह्मखण्डकी समाप्ति

सूतजी कहते हैं—आनर्तदेशमें वेदरथ नामक एक ब्राह्मण थे। उनका जन्म उत्तम कुलमें हुआ था। वे स्त्री-पुत्रसे सम्पन्न और विद्वान् थे। ब्राह्मणके एक कन्या हुई, जिसका नाम शारदा रखा गया। वह रूप और शुभ लक्षणोंसे सुशोभित कन्या जब बारह वर्षकी हुई, तब उसे पद्मनाभ नामक एक प्रौढ़ ब्राह्मणने माँगा। पद्मनाभजीकी पत्नी मर गयी थी। वे बड़े धनी, शान्त और राजाके मित्र थे। पिताने उनकी याचना भंग होनेके भयसे अपनी कन्या उन्हें दे दी। दोपहरमें विवाह करके पद्मनाभजी ससुरालमें सायंकाल होनेपर सन्ध्योपासना करनेके लिये एक सरोवरके

  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ७११

तटपर गये। वहाँ विधिपूर्वक सन्ध्योपासन करके जब लौटने लगे, तब अन्धकारपूर्ण मार्गमें एक साँपने उन्हें काट लिया। इससे उनकी मृत्यु हो गयी। विवाह करनेके पश्चात् सहसा उनकी मृत्यु होनेपर भाई-बन्धु रोने और विलाप करने लगे। सास-श्वशुर और वह कन्या सभी शोकमें डूब गये। भाई-बन्धु मृतकका दाह-संस्कार करके अपने-अपने घर लौट गये। विधवा शारदा पिताके ही घरमें रह गयी।

एक दिन 'नैध्रुव नामवाले कोई अन्धे मुनि अपने शिष्यका हाथ पकड़े हुए शारदाके घरपर आये। मुनि बहुत वृद्ध हो गये थे। जिस समय वे घरपर पधारे, शारदाके भाई कहीं बाहर चले गये थे। अतः शारदा ही उनके समीप आयी और इस प्रकार बोली—'महाभाग! आपका स्वागत है, इस पीढ़ेपर बैठिये। आप मुनिनाथको मेरा नमस्कार है। आज्ञा दीजिये मैं आपका कौन-सा कार्य करूँ?' यों कहकर शारदाने बड़े भक्ति-भावसे मुनिके पैर धुलवाये और पंखेसे हवा करके उन्हें सन्तुष्ट किया। थके-माँदे मुनिको पीढ़ेपर बिठाकर उन्हें विधिपूर्वक स्नान कराया और जब वे देवपूजा करके सुखपूर्वक आसनपर बैठे, तब उन्हें आदरपूर्वक उत्तम अन्न भोजन कराया। भोजन करके तृप्त हो जब वे मुनि आनन्दसे परिपूर्ण हुए, तब अन्धमुनिने उस कन्याके लिये उत्तम आशीर्वाद दिया—'भद्रे! तुम पतिके साथ विहार करके सर्वगुणसम्पन्न श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करो और संसारमें बड़ी भारी कीर्ति पाकर देवताओंके प्रसादकी अधिकारिणी बनो।'

अन्धमुनिके द्वारा कहे हुए इस वचनको सुनकर शारदा बहुत विस्मित हुई और हाथ जोड़कर बोली—ब्रह्मन्! आपका वचन सदा सत्य होता है, कभी झूठ नहीं होता। परंतु यह मुझ अभागिनीके लिये कैसे सफल होगा? मैं विधवा हूँ, आपके इन आशीर्वादोंकी पात्र कैसे हो सकूँगी।

मुनि बोले—शुभे! मुझ अन्धेने तुझे न देख सकनेके कारण तुम्हारे लिये जो कुछ कहा है, उसे मैं अवश्य सिद्ध करूँगा। तुम मेरी आज्ञाका पालन करो। यदि तुम उमा-महेश्वर नामक व्रत करोगी, तो उसके प्रभावसे शीघ्र ही कल्याण-भागिनी होओगी।

शारदाने कहा—ब्रह्मन्! आपके बताये हुए दुष्कर व्रतका भी मैं यत्नपूर्वक पालन करूँगी। मुझे वह व्रत और उसका विधान विस्तार-पूर्वक बताइये।

मुनि बोले—चैत्र अथवा मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षमें शुभ दिनको इस व्रतका प्रारम्भ करना चाहिये। अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या अथवा पूर्णिमाको विधिपूर्वक संकल्प करके प्रातःकाल स्नान करे, देवताओं और पितरोंका तर्पण करके अपने घर आकर एक सुन्दर मण्डप बनावे, जो चंदोवे आदिसे अलंकृत हो। उसे फल, फूल, पल्लव और बन्दनवारोंसे सजावे। बीचमें पाँच प्रकारके रंगोंसे कमलका चिह्न अंकित करे। उसके मध्यभागमें धान्य अथवा चावलोंकी राशि करके उसके ऊपर कुशा रखे और उस कुशाके ऊपर जलपूर्ण कलश स्थापित करके उसके ऊपर रँगा हुआ वस्त्र रखे। वस्त्रके ऊपर सोनेकी दो प्रतिमाएँ (जो शिव-पार्वतीकी प्रतीक हैं) स्थापित करे। तत्पश्चात् भक्तिभावसे अपनी शक्तिके अनुसार विस्तारपूर्वक उनकी पूजा करे। पंचामृतसे स्नान कराकर फिर शुद्ध जलसे नहलावे। एकादश रुद्रमन्त्रका जप करके एक सौ आठ बार 'नमः शिवाय' इस पंचाक्षरमन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। फिर सिंहासनपर उन प्रतिमाओंको पधराकर पूजा करे। बुद्धिमान् पुरुष स्वयं धुले हुए श्वेत वस्त्र धारण करके शुद्ध आसनपर बैठे। पीठको अभिमन्त्रित करके प्राणायाम करे। भगवान् शिवके आगे हाथ जोड़कर यों संकल्प पढ़े—

७१२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

'मेरे सैकड़ों जन्मोंमें जो भयंकर पाप संचित हुए हैं, उन सबका विनाश करनेके लिये मैं शिवकी पूजा प्रारम्भ करता हूँ। सौभाग्य, विजय, आरोग्य, धर्म और ऐश्वर्यकी वृद्धि तथा स्वर्ग एवं मोक्षकी सिद्धिके लिये मैं शिवजीकी पूजा करूँगा'—इस प्रकार संकल्प बोलकर मनुष्य एकाग्रतापूर्वक यथायोग्य अंगन्यास करके शिव और पार्वतीका ध्यान करे। अपने हृदय-कमलकी कर्णिकामें जगत्के माता-पिता शिव-पार्वतीका ध्यान करके तत्सम्बन्धी मन्त्रोंका जप करे। जपके पश्चात् बाह्य-पूजन प्रारम्भ करे। दोनों सुवर्ण-प्रतिमाओंमें शिव-पार्वतीका आवाहन करके उनके लिये आसन आदि दे। फिर निम्नांकित मन्त्रसे मन्त्रज्ञ पुरुष उन्हें अर्घ्य दे—

नमस्ते पार्वतीनाथ त्रैलोक्यवरदर्षभ।
त्र्यम्बकेश महादेव गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
नमस्ते देवदेवेशि प्रपन्नभयहारिणि।
अम्बिके वरदे देवि गृहाणार्घ्यं शिवप्रिये॥

'तीनों लोकोंको वर देनेवाले देवताओंमें सबसे श्रेष्ठ पार्वतीनाथ! आपको नमस्कार है। त्र्यम्बकेश्वर महादेव! आपको नमस्कार है, यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये। शरणागतोंका भय दूर करनेवाली देवदेवेश्वरी जगदम्बिके! वरदायिनी देवि! शिवप्रिये! आप यह अर्घ्य स्वीकार कीजिये।'

इस प्रकार तीन बार कहकर मनुष्य एकाग्रचित्त हो उन्हें अर्घ्य दे। फिर विधिपूर्वक गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप और दीप आदि उपचारोंको चढ़ावे। खीरके साथ घीमें तैयार किया हुआ नैवेद्य अर्पण करे। तत्पश्चात् मूलमन्त्रद्वारा एक सौ आठ बार हविष्यकी आहुति दे। फिर नैवेद्य हटाकर धूप, आरती करके ताम्बूल अर्पण करे और मनको एकाग्र करके नमस्कार करे। इस प्रकार उपचारसे पूजा करके ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन करावे। इसी प्रकार सायंकालकी पूजा करके ब्राह्मणकी अनुमति ले रातमें मौनभावसे दूधमें तैयार किया हुआ हविष्य भोजन करे। इस प्रकार विद्वान् पुरुष एक वर्षतक दोनों पक्षोंमें इस व्रतका पालन करता रहे। वर्ष पूरा होनेपर व्रतका उद्यापन करे। शतरुद्रियका पाठ करते हुए दोनों प्रतिमाओंको जलसे स्नान करावे। आगमोक्त मन्त्रोंसे शिव-पार्वतीकी भलीभाँति पूजा करे। अन्तमें वस्त्र, सुवर्ण और प्रतिमासहित कलश सदाचारी आचार्यको देकर ब्राह्मणोंको भोजन करावे। उनका भी यथाशक्ति स्वागत-सत्कार करके उन्हें गौ, सुवर्ण और वस्त्र आदिकी दक्षिणा दे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर अपने इष्टमित्रों और बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार जो भक्तिपूर्वक इस त्रिभुवनप्रसिद्ध व्रतका पालन करता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके मनोवांछित भोगोंका उपभोग करता है। इन्द्र आदि लोकपालोंके दिव्य लोकोंमें रमण करता है और अन्तमें भगवान् शिवको ही प्राप्त होता है। शुभे! मेरे बताये हुए इस महाव्रतका तुम भी श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करो। इससे अत्यन्त दुर्लभ मनोरथको भी प्राप्त कर लोगी।

  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * | ७१३ ---|---

मुनीश्वर नैध्रुवके इस प्रकार आदेश देनेपर शारदाने विश्वासपूर्वक उनके वचनोंको ग्रहण किया। तत्पश्चात् उसके पिता, माता और भाई बाहरसे घरमें आये। उन्होंने देखा मुनि भोजन करके सुखपूर्वक बैठे हुए हैं। सबने सहसा आकर उन महात्माके चरणोंमें प्रणाम किया और स्वयं भी उनका पूजन किया। 'साध्वी शारदाने उस श्रेष्ठ मुनिका पूजन किया है और मुनिने उसे अनुग्रहपूर्वक व्रतका उपदेश दिया है'— यह सब सुनकर उसके भाई-बन्धुओंको बड़ा हर्ष हुआ। वे सब हाथ जोड़कर बोले— 'मुने! आज आपके आगमनमात्रसे हम सब लोग धन्य हो गये। हमारा समस्त कुल पवित्र हो गया और यह घर भी सार्थक हो गया। आप हमारे घरके पास ही निवास करें और जो यह घरका मठ है, यह स्नान, पूजाके लिये बहुत उपयोगी है अतः इसीमें रहिये।' इस प्रकार प्रार्थना करनेपर उन मुनिश्रेष्ठने 'बहुत अच्छा' कहकर ब्राह्मणके उत्तम मठमें निवास किया।

इस प्रकार मुनिके समीप नियममें मन लगाकर उस महाव्रतका पालन करती हुई शारदाका एक वर्ष पूरा हो गया। वर्ष व्यतीत होनेपर उसने पिताके घरमें ही ब्राह्मण-भोजनपूर्वक भलीभाँति व्रतका उद्यापन किया। उन ब्राह्मणोंको यथायोग्य दक्षिणा देकर प्रणामपूर्वक विदा किया। माता-पिताने उसके इस कार्यकी बड़ी प्रशंसा की। शारदा उस दिन भी उपवास करके नियम-पालनपूर्वक महात्मा नैध्रुवके बताये हुए उत्तम मन्त्रका जप करती रही। तदनन्तर प्रदोषकाल आनेपर उसने भगवान् शंकरका पूजन किया और घरके पासवाले मठमें भगवान् शिवका ध्यान करती हुई साध्वी शारदा रातभर भगवान् शिवके समीप जागती रही। शारदाकी भक्ति और मुनिकी तपस्या एवं समाधिसे सन्तुष्ट होकर जगन्माता पार्वती उनके सामने प्रकट हुईं। उनके प्रकट होते ही अन्धे मुनिको दो नेत्र प्राप्त हो गये। अपने सम्मुख प्रकट हुई जगन्माता पार्वतीका दर्शन करके वे मुनि और वह ब्राह्मण-कन्या दोनों उनके चरणोंमें गिर पड़े। तब उन दोनोंको उठाकर पार्वतीदेवीने बड़े प्रेमसे कहा— 'मुनिश्रेष्ठ! मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ। पापरहित पुत्री शारदा! तुम्हारे ऊपर भी मैं प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम्हारी रुचिके अनुसार कौन-सा देवदुर्लभ वर प्रदान करूँ?'

मुनि बोले— देवि! यह 'शारदा' नामकी कन्या विधवा हो गयी है। मैंने अन्ध होनेके कारण इस बातको न जानकर इसकी सेवासे सन्तुष्ट हो यह आशीर्वाद दिया है कि 'तुम अपने पतिके साथ चिरकालतक विहार करके उत्तम पुत्र प्राप्त करो।' जगदम्बा! आप मेरे इस वचनको सत्य करें, आपको नमस्कार है।

श्रीपार्वतीदेवीने कहा— ब्रह्मन्! यह शारदा पूर्वजन्ममें एक द्राविड़ ब्राह्मणकी द्वितीय पत्नी थी। उस समय इसका नाम भामिनी था। भामिनी अपने पतिकी बड़ी प्यारी थी। अपनी रूपमाधुरीसे परम मनोहर दिखायी देनेवाली भामिनीने रूपवशीकरण आदि छलपूर्ण उपायोंसे पतिको अपने वशमें कर लिया। वह मोहग्रस्त ब्राह्मण अपनी छोटी पत्नीमें ही आसक्त होनेके कारण अपनी ज्येष्ठ एवं पतिव्रता पत्नीके पास कभी नहीं गया। पति-समागमसे वंचित होनेसे वह स्त्री पुत्रहीन रह गयी। इससे वह मन-ही-मन सदा सन्तप्त रहती थी और उसी दशामें समयानुसार उसकी मृत्यु हो गयी। भामिनीके घरके पास एक तरुण ब्राह्मण रहता था। वह इस सुन्दरीको देखकर मोहित हो गया था। एक दिन उसने कामसे आतुर होकर इसका हाथ पकड़ लिया। उस समय इसने क्रोधसे लाल आँखें करके उसे दूर

७१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भगा दिया। वह दिन-रात इसीका चिन्तन करते-करते मृत्युको प्राप्त हुआ।

इसने स्वामीको मोहित करके जो उन्हें ज्येष्ठ पत्नीसे विमुख किया था, उसी पापसे यह इस जन्ममें विधवा हुई। जो स्त्रियाँ संसारमें पति-पत्नीमें वियोग कराती हैं, उन्हें इक्कीस जन्मोंतक बाल्यावस्थामें विधवा होना पड़ता है। और वह काममोहित ब्राह्मण जो परायी स्त्रीके विरहसे पीड़ित होकर मृत्युको प्राप्त हुआ था, उसने भी पाप ही किया था। अतः इस जन्ममें वह इसका पाणिग्रहणमात्र करके मृत्युको प्राप्त हुआ है। पूर्वजन्ममें जो इसका पति था, वह इस समय पाण्ड्यदेशमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें उत्पन्न हुआ है। उसके पास धन, सम्पत्ति, स्त्री तथा सुखभोगकी सामग्री सब कुछ है। यह शारदा अपने उसी पतिके साथ प्रत्येक रात्रिमें स्वप्नावस्थामें समागम करके जागरण कालकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ रतिसुखका अनुभव करे। स्वप्नावस्थामें पति-समागमसे यह कुछ ही समयमें वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् पुत्र प्राप्त कर लेगी। वे ब्राह्मणदेवता भी स्वप्नमें अपने साथ चिरसमागमसे इसके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्रको सदैव देखा करेंगे। महामुने! पूर्वजन्ममें इसने मेरी आराधना की है और इसीको वर देनेके लिये मैं प्रकट हुई हूँ।

तदनन्तर महादेवी पार्वतींने शारदासे आदरपूर्वक कहा—बेटी! तुम मेरी उत्तम बात सुनो। जब कभी भी किसी देशमें अपने स्वप्नमें देखे हुए पूर्वपतिको देखना, तब समझ लेना कि यही मेरे पुरातन पति हैं। वे ब्राह्मण भी तुम्हें देखकर पहचान लेंगे। उस समय तुम दोनोंमें वार्तालाप होगा। ऐसा अवसर आनेपर तुम अपने विद्वान् पुत्रको उन्हीं ब्राह्मणकी सेवामें समर्पित कर देना। उमा-महेश्वर-व्रतका जो श्रेष्ठ फल है, उसके अर्धभागको इस प्रकार उन्हींके हाथोंमें सौंप देना और तबसे उन्हींके अधीन होकर रहना। तुम दोनोंको स्वप्न-मिलनके सिवा कभी शारीरिक संग नहीं करना चाहिये। समय आनेपर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण जब मृत्युको प्राप्त होंगे, तब उन्हींके साथ चिताकी अग्निमें प्रवेश करके तुम मेरे धामको प्राप्त होओगी।

ऐसा कहकर जगन्माता पार्वती अन्तर्धान हो गयीं। वह कन्या करुणामयी पार्वतीका वरदान पाकर बहुत प्रसन्न हुई। रात्रि व्यतीत होनेपर नूतन नेत्र पाये हुए धर्मज्ञ मुनिने उसके माता-पितासे एकान्तमें सब बात बतायी। तत्पश्चात् वे चले गये। इस प्रकार कुछ दिन बीतनेपर शारदाने स्वप्नमें पतिका समागम प्राप्त किया। पार्वतीदेवीके वरदानसे उसके गर्भ रह गया। उस विधवाको गर्भवती हुई सुनकर सब लोग व्यभिचारिणी कहकर उसे धिक्कार देने लगे। उसके मरे हुए पतिके जातिभाइयोंने जब यह असह्य बात सुनी, तब वे सब लोग शारदाके पिताके घर आये। गाँवके बड़े-बूढ़े पण्डित भी आये। सबने कुलके वृद्ध पुरुषोंके साथ बैठकर गोष्ठी की। लज्जासे नतमुख हुई गर्भवती शारदाको बुलाकर कुछ लोग बड़े क्रोधमें भरकर उसे डाँटने लगे। कुछ लोगोंने उसकी ओरसे मुँह फेर लिया। कुछ निर्दयी वृद्धोंने अपना निर्णय इस प्रकार व्यक्त किया—'यह पापबुद्धिवाली कन्या दोनों कुलोंका नाश करनेवाली है, इसके केश मुँड़वाकर नाक और कान काट दिये जायँ और इसे कुल और जातिसे बहिष्कृत करके गाँवसे बाहर निकाल दिया जाय।' यह सुनकर सब लोग ऐसा ही करनेको तैयार हो गये। इसी समय सबको आकाशवाणी सुनायी पड़ी—'इस कन्याने न तो कोई पाप किया है, न कुलमें कलंक लगाया है और न इसके पातिव्रत्यका भंग ही हुआ है। यह सदाचारपरायणा स्त्री है। इसके बाद जो लोग

  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ७१५

भी इसे कुलटा या व्यभिचारिणी कहेंगे, उन पापमोहित मनुष्योंकी जिह्वा तत्काल विदीर्ण हो जायगी।'

इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर उसके माता-पिता आदि सब लोगोंको बड़ा हर्ष हुआ। कुछ अविश्वासी मनुष्य बोल उठे—'यह आकाशवाणी झूठी है।' इतना कहते ही उनकी जिह्वा दो टूक हो गयी। फिर तो सब जाति-भाई, बन्धु-बान्धव, स्त्रियाँ और बड़े-बूढ़े 'साधु! साधु' कहकर शारदाकी प्रशंसा करने लगे। कुलकी स्त्रियाँ प्रसन्न हो गयीं। दूसरे लोग कहने लगे—'देवता झूठ नहीं बोलते। परंतु यह समझमें नहीं आता कि इसने कैसे गर्भ धारण किया?' इस प्रकार संशयमें पड़े हुए लोगोंको देखकर लोक-तत्त्वको जाननेवाले एक वृद्ध पुरुषने कहा—'यह जो कुछ देखने और सुननेमें आता है, वह सम्पूर्ण विश्व मायामय है। इस क्षणभंगुर संसारमें अकथनीय और असम्भव बातें भी मायासे होती रहती हैं। माया ईश्वरके अधीन है। अतः उस ईश्वरकी लीलाका रहस्य कौन जानता है? सत्यवती मछलीके पेटसे पैदा हुई और महिषासुर भैंसके गर्भसे उत्पन्न हुआ है। वसुदेवजीसे रोहिणीके गर्भसे पुत्रका जन्म हुआ। मुनिके शापसे साम्बके पेटसे मूसल पैदा हुआ और मुनियोंके मन्त्रबलसे राजा युवनाश्वके भी गर्भ रह गया था। इसी प्रकार यह कल्याणमयी सती शारदा भी अपने महान् व्रतके प्रभावसे गर्भवती हुई है, यह बात निश्चयपूर्वक कही जा सकती है। इस विषयमें स्त्रियाँ ही इसे एकान्तमें ले जाकर सच्ची बात पूछें?'

इस निश्चयके अनुसार स्त्रियोंने उसे एकान्तमें ले जाकर इस विषयमें पूछा। शारदाने उन स्त्रियोंसे अपना अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त पूर्णरूपसे कह सुनाया। यथार्थ बातका पता लगनेपर सब लोग उस सतीका आदर करके प्रसन्नचित्त हो अपने-अपने घरको गये। तदनन्तर शुभ समय आनेपर शुद्ध अन्तःकरणवाली शारदाने बालसूर्यके समान तेजस्वी बालकको जन्म दिया। वह कुमार बाल्यावस्थामें ही बहुत अधिक विद्या प्राप्त करके परम बुद्धिमान् हो गया। तत्पश्चात् गुरुने समयपर उसका उपनयन-संस्कार किया। वह लोकमनोहर बालक लोकमें शारदेय नामसे विख्यात हुआ। उसने आठवें वर्षकी आयुमें ऋग्वेद, नवें वर्षमें यजुर्वेद और दसवें वर्षमें सामवेदको लीलापूर्वक पढ़ डाला। तदनन्तर त्रिलोकपूजित शिवपर्व प्राप्त होनेपर सब देशके निवासी मनुष्य गोकर्णतीर्थमें जाने लगे। सती शारदा भी अपने पुत्रके साथ गोकर्णतीर्थमें गयी। वहाँ उसने अपने पूर्वजन्मके पतिको, जिनका स्वप्नमें सदा ही दर्शन किया था, आया हुआ देखा। वे ब्राह्मण बन्धुओंसे घिरे हुए थे। उन्हें देखकर शारदा प्रेममग्न हो गयी और उन्हींकी ओर दृष्टि लगाये खड़ी रही। ब्राह्मण भी रूप और लक्षणोंसे पहचानी हुई तथा स्वप्नमें सदा भोगी जानेवाली उस स्त्रीको और स्वप्नमें ही अपनेसे उत्पन्न हुए उस कुमारको भी देखकर आश्चर्यचकित हो उसके समीप आये और इस प्रकार बोले—'कल्याणी! तुम कौन हो, किसकी स्त्री हो, कौन तुम्हारा देश है और किसकी पुत्री हो?'

उनके द्वारा इस प्रकार पूछी जानेपर उस स्त्रीने बाल्यावस्थामें अपने विधवा होनेका सब वृत्तान्त कहा। तब ब्राह्मणने पुनः प्रश्न किया—'देवि! यह किसका पुत्र है? चन्द्रमाके समान सुन्दर इस बालकको तुमने कैसे गर्भमें धारण किया है?'

**शारदा बोली—**स्वामी! यह सब विद्याओंमें विशारद मेरा ही पुत्र है। मेरे ही नामपर इसको लोग 'शारदेय' कहते हैं।

७१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उसकी यह बात सुनकर श्रेष्ठ ब्राह्मण हँसकर बोले—देवि! तुम्हारा पति तो पाणिग्रहणमात्र करके मर गया। फिर इस पुत्रका जन्म कैसे हुआ, इसका कारण बताओ।

शारदा बोली—महामते! परिहाससे कोई लाभ नहीं! आप मुझे जानते हैं और मैं आपको जानती हूँ। इस विषयमें हम दोनोंके मन ही प्रमाण है।

ऐसा कहकर उसने देवीके दिये हुए वरदान आदिकी बातें बतायीं और अपने व्रतके आधे भाग व्रतधारी कुमार शारदेयको उन्हें सौंप दिया। वे ब्राह्मण देवता बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कुमारको हृदयसे लगा लिया और शारदाके माता-पिताकी आज्ञा लेकर शारदा तथा उस बालकको अपने घर बुला ले गये। ब्राह्मणके घरमें शारदाने कई मास व्यतीत किये। जब उनकी मृत्यु हो गयी, तब उन्हींके साथ चिताकी अग्निमें प्रवेश करके उसने उनका अनुसरण किया। फिर भी दोनों दिव्य दम्पति होकर दिव्य विमानपर बैठे और भगवान् शिवके लोकमें चले गये। इस प्रकार मैंने यह पवित्र उपाख्यान सुनाया, जो पढ़ने और सुननेवालोंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है।

प्रतिदिन भगवत्सम्बन्धी उत्तम कथाके श्रवणसे मनुष्य परम गतिको प्राप्त होता है। पुण्यक्षेत्रमें निवास करनेसे चित्त शुद्ध होता है। उत्तम कथाके सुननेसे मनुष्य जिस प्रकार उत्तम गतिको पाता है, उस प्रकार अन्य उत्तम व्रतोंसे नहीं। अन्य व्रतोंसे उसकी बुद्धि वैसी उत्तम नहीं होती। जैसे बार-बार शोधन करनेपर दर्पण निर्मल होता है, वैसे ही सत्कथाश्रवणसे चित्त अधिकाधिक शुद्ध होता है। चित्त शुद्ध होनेपर मनुष्योंके द्वारा शिवजीका ध्यान सिद्ध होता है। ध्यानसे पुण्यात्मा पुरुष मन, वाणी और शरीरद्वारा संचित समस्त पापराशिको धोकर भगवान् शिवके परम पदको प्राप्त होते हैं। अतः जिन्होंने अपना पुण्य भगवान् शिवके चरणोंमें समर्पित कर दिया है, उन लोगोंके लिये भगवान् शिवकी उत्तम कथाका श्रवण-कीर्तन ही सर्वोत्तम साधन है; क्योंकि कथासे ध्यान सिद्ध होता है और ध्यानसे कैवल्यकी प्राप्ति होती है।

मुनिवरो! आप सब लोग बड़े सौभाग्यशाली हैं। आपका ही जीवन सफल है; क्योंकि आपलोग सदा भगवान् शिवके उत्तम कथामृत-रसका सेवन करते हैं। इस जीव-जगत्में वस्तुतः उन्हींका जन्म सफल है, जिनका मन सदा भगवान् विश्वनाथका ध्यान करता है, वाणी उनके गुण गाती है और दोनों कान उन्हींकी कथा सुनते हैं। ऐसे ही लोग इस संसार-सागरको पार करते हैं। नाना प्रकारके गुणविभेद जिनके स्वरूपका कभी स्पर्श नहीं करते, जो अपनी महिमासे जगत्के बाहर और भीतर समान रूपसे व्याप्त हैं, जो अपने ही प्रकाशमें विहार करते हैं और जो मन-वाणीकी वृत्तियोंसे बहुत दूर हैं, मैं उन अनन्तानन्दघनस्वरूप परम शिवकी शरण लेता हूँ।

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ब्रह्मोत्तर-खण्ड सम्पूर्ण।

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ब्राह्म-खण्ड समाप्त

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१४. काशीखण्ड (पूर्वार्ध व उत्तरार्ध)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः

संक्षिप्त श्रीस्कन्दमहापुराण

~~ ० ~~

काशीखण्ड पूर्वार्ध

~~ ० ~~

मेरुगिरिसे स्पर्धा करके विन्ध्याचलका सूर्यके मार्गको रोकना और ब्रह्माजीके आदेशसे देवताओंका काशीमें अगस्त्य मुनिके समीप जाना

तं मन्महे महेशानं महेशानप्रियार्भकम्।
गणेशानं करिगणेशानाननमनामयम्॥

‘जिनका मुख गजराजके मुखके समान है, जो महादेवजीकी प्रिया पार्वतीजीके लाड़ले पुत्र हैं, सबके महान् शासक हैं तथा रोग-शोकसे सर्वथा रहित हैं, उन श्रीगणेशजीका हम चिन्तन करते हैं।’

भूमिष्ठापि न यात्र भूस्त्रिदिवतोऽप्युच्चैरधःस्थापि या
या बद्धा भुवि मुक्तिदा स्युरमृतं यस्यां मृता जन्तवः।
या नित्यं त्रिजगत्पवित्रतटिनी तीरे सुरैः सेव्यते
सा काशी त्रिपुरारिराजनगरी पायादपायाज्जगत्॥

‘जो पृथ्वीपर स्थित होकर भी यहाँ पृथ्वीसे सम्बन्ध नहीं रखती, जो पदमें स्वर्गसे ऊँची होनेपर भी नीचेके लोकमें स्थापित की गयी है, जो इस पांचभौतिक जगत्में आबद्ध (प्रविष्ट) होनेपर भी सबको मोक्ष देनेवाली है, जिसमें मरे हुए सभी जीव अमृतमय ब्रह्म हो जाते हैं, जो सदा तीनों लोकोंमें पवित्र नदी श्रीगंगाजीके तटपर सुशोभित है और देवता भी जिसका सेवन करते हैं, वह त्रिपुरारि महादेवजीकी राजधानी काशीपुरी सम्पूर्ण जगत्को विनाशसे बचावे।’

श्रीव्यासदेवजी कहते हैं—एक समय देवर्षि नारद नर्मदाके जलमें स्नान और श्रीॐकारनाथजीका भलीभाँति पूजन करके जब आगे गये, तब उन्हें वह विन्ध्यपर्वत दिखायी दिया, जो संसार-तापका संहार करनेवाली नर्मदा नदीके जलसे सुशोभित होता है। आकाशको अपने तेजसे प्रकाशित करनेवाले नारदजीको दूरसे आते देख गिरिराज विन्ध्यने उनकी अगवानी की। ब्रह्मकुमारके तेजसे उसका आन्तरिक अन्धकार दूर हो गया था। वह ब्रह्मतेजसे प्रभावित हो नारदजीके प्रति आदरका भाव रखकर उनका उत्तम सत्कार करनेको उद्यत हुआ। ऊपरसे कठोर होनेपर भी विन्ध्यगिरिने कोमलता धारण की। स्थावर-जंगम दोनों रूपोंमें उसकी कोमलता देखकर नारदजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। अपने घरपर आते हुए बड़े या छोटेको देखकर जो छोटा बनकर नम्रता धारण करता है, वही बड़ा है। आयुमें बड़ा होनेसे कोई बड़ा नहीं होता। विन्ध्यगिरिने पृथ्वीपर मस्तक रखकर महामुनि नारदजीको प्रणाम किया और नारदजी दोनों हाथोंसे उसे उठाकर आशीर्वादसे प्रसन्न करके उसके दिये हुए आसनपर बैठे। विन्ध्यने दही, शहद, घी, जलसे भीगे अक्षत, दूर्वा, तिल, कुश और पुष्प—इन आठ अंगोंसे युक्त अर्घ्य देकर मुनिका पूजन किया। फिर पैर दबाने आदि सेवाके द्वारा उसने थके हुए मुनिकी थकावट दूर की। जब मुनि विश्राम कर चुके, तब विन्ध्यगिरिने विनीतभावसे कहा—‘मुने! आज आपके चरणोंकी धूलि पड़नेसे मेरे भीतरका रजोगुण तत्काल दूर हो गया और आपके अंगोंके तेजसे मेरे भीतरका तमोगुण भी सहसा नष्ट हो गया। देवर्षे! आज ही मेरे लिये

७९८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सुदिन है; पूर्वजन्मोंके किये हुए मेरे चिरसंचित पुण्य आज ही फलीभूत हुए हैं।'

विन्ध्यगिरिकी यह बात सुनकर नारदजी कुछ लंबी साँस खींचकर रह गये। तब सब पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्यने कहा—'सब अर्थोंके ज्ञाता विप्रवर ! मुझे अपने उच्छ्वासका कारण बताइये।' नारदजीने मन-ही-मन सोचा—बढ़ते हुए अभिमानका संसर्ग किसीके लिये बड़प्पनका कारण नहीं है। अतः आज विन्ध्यगिरिका बल देखना चाहिये। यों सोचकर मुनि बोले—'पर्वतोंमें श्रेष्ठ मेरुगिरि तुम्हारा अपमान करता है, इसीलिये मैंने लंबी साँस खींची है और यह बात तुमसे बता दी है। तुम्हारा कल्याण हो।' ऐसा कहकर नारद मुनि आकाशमार्गसे चले गये। मुनिके जाते ही विन्ध्याचल अत्यन्त उद्विग्नचित्त हो बड़ी चिन्तामें पड़ गया और मन-ही-मन कहने लगा—'जिसने शास्त्रका एक अंश भी नहीं पढ़ा है, उसके जीवनको धिक्कार है। जो उद्योगहीन है, उसके जीनेको भी धिक्कार है और जिसका मनोरथ पूर्ण नहीं होता, उसके जीनेको भी धिक्कार है। पुरानी बातोंको जाननेवाले विद्वान् पुरुषोंने यह ठीक ही कहा है कि चिन्ताका स्वरूप बड़ा भयंकर है। चिन्ता न तो औषधोंसे शान्त होती है और न दूसरे किसी उपायसे। चिन्तारूपी ज्वर मनुष्योंकी भूख, नींद और बल हर लेता है। रूप, उत्साह, बुद्धि, सम्पत्ति और जीवनको भी नष्ट कर देता है। ज्वर छः दिन व्यतीत होनेपर जीर्णज्वर कहलाता है, किंतु तीव्र चिन्ताज्वर प्रतिदिन नूतनताको प्राप्त होता है *। इसे दूर करनेमें धन्वन्तरि भी धन्यवादके पात्र नहीं हो पाते। इसमें चरक भी विचरण नहीं कर सकते। इतना ही नहीं, नासत्य (दोनों अश्विनीकुमार) भी इसमें सत्य नहीं हो पाते। क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कैसे मेरुपर्वतको परास्त करूँ। यहाँ उचित और अनुचितके विचारका कोई उपयोग नहीं है, अथवा इन व्यर्थकी चिन्ताओंसे क्या लाभ? मैं विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले भगवान् विश्वनाथकी ही शरणमें चलूँ। वे ही मुझे बुद्धि प्रदान करेंगे। ग्रह, नक्षत्र और तारागणोंके साथ भगवान् सूर्य मेरुको अधिक बलवान् मानकर प्रतिदिन उसकी प्रदक्षिणा करते हैं।'

ये ही सब बातें सोचकर विन्ध्यगिरि ऊँचाईकी ओर बढ़ने लगा, मानो वह अपने शिखरोंसे अनन्त आकाशका अन्त कर देना चाहता हो। गिरिराज विन्ध्य सूर्यका मार्ग रोककर ही कुछ स्वस्थ-सा हुआ।

तदनन्तर अन्धकारका नाश करनेवाले भगवान् सूर्य उदयाचल पर्वतपर उदित हुए और क्रमशः दक्षिण दिशाकी ओर चले। किंतु जब उनके घोड़े आगे न बढ़ सके, तब अनूरु (अरुण) नामक सारथिने सूचित किया—'भानुदेव! अभिमानसे ऊँचे उठा हुआ यह विन्ध्यपर्वत आकाशका मार्ग रोककर खड़ा है। आप जो मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा किया करते हैं, उसके कारण यह गिरिराज मेरुसे लाग-डाँट रखता है।' अनूरुकी बात सुनकर भगवान् सूर्यने मन-ही-मन सोचा—'अहो! आकाशका मार्ग भी रोका जाता है। यह बड़े विस्मयकी बात है।' जो आधे पलमें दो हजार दो सौ दो योजन चलते हैं, वे सूर्य भी दैववश एक ही जगह अधिक समयतक रुके रह गये। इस प्रकार दीर्घकालतक प्रचण्डरश्मि सूर्यके ठहर जानेसे पूर्व और उत्तर दिशामें रहनेवाले जीव उनकी किरणोंके तापसे सन्तप्त हो बहुत व्याकुल हो गये। दक्षिण और पश्चिमके लोग लेटे हुए ही ग्रह तथा नक्षत्रोंसहित आकाशको देखने लगे। वे सोचते थे 'सूर्यका दर्शन नहीं हुआ, इसलिये यह दिन नहीं है और रात भी नहीं है; क्योंकि चन्द्रमा अस्त हो गये। आकाशके तारे भी लुप्त होते जाते हैं। अतः यह कौन-सा समय है, इसका पता नहीं चलता।' पृथ्वीपर स्वाहा (देवयज्ञ), स्वधा (पितृयज्ञ) और


* चिन्ताज्वरो मनुष्याणां क्षुधां निद्रां बलं हरेत्। रूपमुत्साहबुद्धिं श्रीं जीवितं च न संशयः॥
ज्वरो व्यतीते षडहे जीर्णज्वर इहोच्यते। असौ चिन्ताज्वरस्तीव्रः प्रत्यहं नवतां व्रजेत्॥
(स्क० पु०, का० पू० १।६९-७०)

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७१९

वषट्कार (ब्रह्मयज्ञ आदि) का सर्वथा अभाव हो गया। पंचयज्ञ कर्मका लोप हो जानेसे तीनों लोक काँप उठे। चित्रगुप्त आदि सब लोग सूर्यसे ही कालका ज्ञान रखते हैं। एकमात्र भगवान् सूर्य ही जगत्के सृष्टि, पालन और संहारके हेतु हैं। सूर्यदेवकी गति रुक जानेसे तीनों लोक स्तब्ध हो उठे। जो जहाँ था, वहीं चित्रलिखित-सा रह गया। एक ओर तो रातके अन्धेरेसे और दूसरी ओर सूर्यकी गरमीसे बहुत-से जीवोंकी मृत्यु हो गयी। समस्त चेतन जगत् भयसे इधर-उधर भागने लगा। यह अवस्था देख सब देवता ब्रह्माजीकी शरणमें गये और नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा उनके गुणगान करने लगे।

देवता बोले—परब्रह्मस्वरूप हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीको नमस्कार है। जिनका स्वरूप किसीको ज्ञात नहीं है, जो कैवल्य एवं अमृतरूप हैं, जिन्हें इन्द्रियाँ और उनके अधिष्ठाता देवता भी नहीं जानते, जहाँ मनकी भी पहुँच नहीं है और जहाँ वाणीका भी प्रस्तार नहीं हो पाता, उन सच्चिदानन्दमय परमात्माको नमस्कार है। योगीजन अविचलभावसे समाधिमें स्थित हो ध्यानके द्वारा अपने हृदयाकाशमें जिनके ज्योतिर्मय स्वरूपका साक्षात्कार करते हैं, उन श्रीब्रह्माजीको नमस्कार है। जो कालसे परे होकर भी कालस्वरूप हैं, स्वेच्छा (अथवा अपने भक्तोंकी इच्छा) से पुरुषरूप धारण करते हैं, सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण जिनके स्वरूप हैं तथा गुणोंकी साम्यावस्थारूप प्रकृति भी जिनका ही रूप है, उन ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप परमेश्वरको नमस्कार है। प्रभो! वेद आपके निःश्वास हैं, सम्पूर्ण विश्व आपके एक अंशमें स्थित है, द्युलोक आपके मस्तकसे प्रकट हुआ है, आपकी नाभिसे अन्तरिक्ष लोकका आविर्भाव हुआ है और वनस्पति आपके लोम हैं। भगवन्! चन्द्रमा आपके मनसे और सूर्य आपके नेत्रसे उत्पन्न हुए हैं। देव! आप ही सब कुछ हैं, आपमें ही सबकी स्थिति है, आप परमेश्वरसे यह सम्पूर्ण जगत् भलीभाँति व्याप्त है, आपको बारंबार नमस्कार है।

इस प्रकार ब्रह्माजीकी स्तुति करके सब देवता दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़ गये। तब ब्रह्माजीने उनसे इस प्रकार कहा—'देवताओ! मैं तुम्हारी स्तुतिसे सन्तुष्ट हूँ, उठो और इच्छानुसार वर माँगो।' देवतालोग जब प्रणाम करके खड़े हुए, तब ब्रह्माजीने उनसे पुनः इस प्रकार कहा—'विन्ध्याचल मेरु पर्वतसे डाह करता है, इसीलिये उसने सूर्यका मार्ग रोक रखा है। इसी संकटको टालनेके लिये तुमलोग मेरे पास आये हो। अतः इसके लिये मैं तुम्हें एक उत्तम उपाय बतलाता हूँ। मित्रावरुणके पुत्र महर्षि अगस्त्य बड़े भारी तपस्वी हैं। सबको मुक्ति देनेवाले अविमुक्त नामक महाक्षेत्र (काशी) में, जहाँ तारकमन्त्रका उपदेश देनेके लिये साक्षात् विश्वनाथजी सदा विद्यमान रहते हैं, वे अगस्त्य मुनि भगवान् विश्वनाथमें मन लगाकर बड़ी भारी तपस्या कर रहे हैं। वहाँ जाकर उन्हींसे इस कार्यके लिये याचना करो। वे तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध करेंगे।'

ऐसा कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर सब देवता आपसमें कहने लगे—'अहो! हम परम धन्य हैं, क्योंकि इसी कार्यके प्रसंगसे हमें मंगलमयी काशी और कल्याणमय काशीपतिका भी दर्शन प्राप्त होगा। हमने ब्रह्माजीके मुखसे जो काशीकी चर्चा सुनी है, उसके श्रवणजनित पुण्यसे आज काशीमें पहुँचेंगे।' ऐसा कहते हुए सब देवता प्रसन्नमुख हो काशीपुरीमें आये।

महर्षियोंसहित देवताओंने काशीपुरीमें पहुँचकर पहले मणिकर्णिका तीर्थमें विधिपूर्वक वस्त्रसहित स्नान और सन्ध्योपासन आदि पुण्यकर्म किया। तत्पश्चात् विश्वनाथजीका दर्शन, नमस्कार और स्तवन करके वे परोपकारके लिये उस स्थानपर गये, जहाँ अगस्त्य मुनि रहते थे। वे मुनि अपने नामसे शिवलिंगकी स्थापना करके उसके सामने कुण्ड निर्माण कराकर वहाँ शतरुद्रिय सूक्तका स्थिरचित्तसे जप करते थे। उनको दूरसे ही देखकर देवता परस्पर इस प्रकार कहने लगे—'अहो! इस आश्रमके चारों ओर हिंसक जीव भी सात्त्विक

७२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

दिखायी देते हैं। अपने स्वाभाविक वैरको भी त्यागकर प्रेमपूर्वक रहते हैं।' किंतु जो मनुष्य पापसे मोहित होकर मांस पकाता है, वह उस पशुके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक नरकमें निवास करता है। जो दूषित बुद्धिवाले मनुष्य पराये प्राणोंसे अपने प्राणोंका पोषण करते हैं, वे एक कल्पतक नरक भोगकर इस संसारमें जन्म लेते और उन्हीं प्राणियोंके खाद्य बनते हैं। भूखसे प्राण निकलकर कण्ठतक आ गये हों तो भी मांस नहीं खाना चाहिये*। ये हिंसक जीव भी मनुष्योंकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, जो अगस्त्यजीकी सेवासे ऐसी स्थितिको प्राप्त हो गये हैं कि हिंसाकी ओर इनका मन जाता ही नहीं। कहाँ मांस-भक्षण और कहाँ भगवान् शिवकी भक्ति। जो मद्य और मांसमें आसक्त हैं, उनसे भगवान् शंकर बहुत दूर रहते हैं। भगवान् शिवके प्रसादके बिना भ्रमका कहीं नाश नहीं होता। इस प्रकार आश्रमके पास विचरनेवाले पशु-पक्षियोंको भी मुनियोंके समान बर्ताव करते देख देवताओंने यह समझा कि यह इस पुण्यक्षेत्रका प्रभाव है; क्योंकि भगवान् विश्वनाथ इस क्षेत्रमें रहनेवाले पशु-पक्षियोंको भी मृत्युकालमें तारक मन्त्रका उपदेश देकर मुक्त करेंगे। इस तरह आश्चर्यमें पड़े हुए देवता ज्यों-ही मुनिके आश्रमपर पहुँचे त्यों-ही वहाँके पक्षिसमूहको देखकर अपने मनमें बहुत प्रसन्न हुए। पढ़ती हुई मैना तोतेको सार तत्त्वका उपदेश देती हुई कह रही थी—'हे शुक! इस अपार संसार-सागरसे पार उतारनेवाले केवल भगवान् शिव हैं।' कोयल कोमल वाणीमें अपनी कूक सुनाती हुई कहती थी—'काशी-निवासी प्राणियोंको कलियुग और यमराज अपना ग्रास नहीं बनाता।' वहाँके पशुओं और पक्षियोंकी ऐसी चेष्टा देखकर देवता आपसमें कहने लगे—ये काशी-निवासी पशु-पक्षी और मृग धन्य हैं, जिनकी इस संसारमें पुनरावृत्ति नहीं होगी। देवता ऐसे भाग्यशाली नहीं हैं; क्योंकि उनका पुनर्जन्मसे पिण्ड नहीं छूटता।

ऐसा कहते हुए देवताओंने मुनिकी पर्णकुटी देखी, जो होम एवं धूपकी सुगन्धसे सुवासित तथा बहुत-से ब्रह्मचारी विद्यार्थियोंसे सुशोभित थी। पतिव्रताशिरोमणि लोपामुद्राके चरण-चिह्नोंसे चिह्नित पर्णकुटीके आँगनको देखकर सब देवताओंने नमस्कार किया। महर्षि अगस्त्य समाधिसे उठकर कुशासनपर बैठे थे। उनका दर्शन करके इन्द्रादि देवता प्रसन्नमुख हो उच्चस्वरसे बोले—'जय हो, जय हो।' मुनि उठकर खड़े हो गये और उन सबको यथायोग्य आसनपर बैठाया। आशीर्वादसे उनका अभिनन्दन किया और वहाँ आनेका कारण पूछा।


* यः स्वार्थं मांसपचनं कुरुते पापमोहितः। यावन्त्यस्य तु रोमाणि तावत्स नरके वसेत्॥
परप्राणैस्तु ये प्राणान् स्वान् पुष्णन्ति हि दुर्धियः। आकल्पं नरकान् भुक्त्वा ते भुज्यन्तेऽत्र तैः पुनः॥
जातु मांसं न भोक्तव्यं प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥
(स्क० पु०, का० पू० ३।५१—५३)

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७२१ ---|---:

बृहस्पतिजीके मुखसे लोपामुद्राके पातिव्रतधर्मका वर्णन

अगस्त्यजीका वचन सुनकर सब देवता बृहस्पतिजीके मुखकी ओर देखने लगे। तब बृहस्पतिजीने कहा—'महाभाग अगस्त्यजी! आप धन्य हैं, कृतकृत्य हैं और महात्मा पुरुषोंके लिये भी माननीय हैं। आपमें तपस्याकी सम्पत्ति है, आपमें स्थिर ब्रह्मतेज है, आपमें पुण्यकी उत्कृष्ट शोभा है, आपमें उदारता है और आपमें विवेकशील मन है। आपकी सहधर्मिणी ये कल्याणमयी लोपामुद्रा बड़ी पतिव्रता हैं, आपके शरीरकी छायाके तुल्य हैं। इनकी चर्चा भी पुण्य देनेवाली है। मुने! ये आपके भोजन कर लेनेपर ही भोजन करतीं, आपके खड़े होनेपर स्वयं भी खड़ी रहतीं, आपके सो जानेपर सोतीं और आपसे पहले जाग उठती हैं। ये कभी अपने-आपको आपके सामने अलंकारहीन अवस्थामें नहीं उपस्थित करतीं। जब आप किसी कार्यसे कहीं परदेशमें जाते हैं, तब ये एक भी अलंकार नहीं धारण करतीं। आपकी आयु बढ़े—इस उद्देश्यसे ये कभी आपका नाम नहीं उच्चारण करती हैं। दूसरे पुरुषका नाम भी ये कभी अपनी जीभपर नहीं लातीं। ये कड़वी बात सह लेती हैं, किंतु स्वयं बदलेमें कोई कटु वचन मुँहसे नहीं निकालतीं। आपके द्वारा ताड़ना पाकर भी प्रसन्न ही होती हैं। जब आप इनसे कहते हैं—'प्रिये! अमुक कार्य करो' तब ये उत्तर देती हैं—'स्वामिन्! अभी किया। आप समझ लें वह काम पूरा हो गया।' आपके बुलानेपर ये घरके आवश्यक काम छोड़कर भी तुरंत चली आती हैं और कहती हैं—'प्राणनाथ! दासीको किसलिये बुलाया है। आज्ञा देकर मुझे अपने प्रसादकी भागिनी बनाइये।' ये दरवाजेपर देरतक नहीं खड़ी होतीं, द्वारपर बैठती और सोती भी नहीं हैं। आपकी आज्ञाके बिना कोई वस्तु किसीको नहीं देतीं, आप न कहें तब भी ये स्वयं ही आपके लिये पूजाका सब सामान जुटा देती हैं। नियमके लिये जल, कुशा, पत्र-पुष्प और अक्षत आदि प्रस्तुत करती हैं। सेवाके लिये अवसर देखती रहती हैं और जिस समय जो वस्तु आवश्यक अथवा उचित है, वह सब बिना किसी उद्वेगके अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उपस्थित करती हैं। पतिके भोजन करनेके बाद बचा हुआ अन्न और फल आदि खाती और पतिकी दी हुई प्रत्येक वस्तुको महाप्रसाद कहकर शिरोधार्य करती हैं। देवता, पितर और अतिथियोंको तथा सेवकों, गौओं और याचकोंको भी उनका भाग अर्पण किये बिना ये कभी भोजन नहीं करतीं। वस्त्र, आभूषण आदि सामग्रियोंको स्वच्छ एवं सुरक्षित रखती हैं। ये गृहकार्यमें कुशल हैं, सदा प्रसन्न रहती हैं, फिजूल खर्च नहीं करतीं, एवं आपकी आज्ञा लिये बिना ये कोई उपवास और व्रत आदि नहीं करती हैं। जनसमूहके द्वारा मनाये जानेवाले उत्सवोंका दर्शन दूरसे ही त्याग देती हैं। तीर्थयात्रा आदि तथा विवाहोत्सव-दर्शन आदि कार्योंके लिये भी ये कभी नहीं जातीं। पति सुखसे सोये हों, आरामसे बैठे हों अथवा अपनी मौजसे कहीं रम रहे हों, तो उस समय कोई अन्तरंग कार्य आ जानेपर भी उन्हें कभी नहीं उठातीं। रजस्वला होनेपर ये तीन राततक अपना मुँह पतिको नहीं दिखातीं। जबतक स्नान करके शुद्ध न हो जायँ, तबतक अपनी बात भी पतिके कानोंमें नहीं पड़ने देतीं। भलीभाँति स्नान कर लेनेपर पहले पतिका ही मुँह देखती हैं और किसीका नहीं। अथवा यदि पतिदेव उपस्थित न हों तो मन-ही-मन उनका ध्यान करके सूर्यदेवका दर्शन करती हैं। पतिकी आयुवृद्धि चाहती हुई पतिव्रता स्त्री अपने शरीरसे हल्दी, रोली, सिन्दूर, काजल, चोली, पान, शुभ मांगलिक आभूषण कभी दूर न करे। केशोंका सँवारना, वेणी गूँथना तथा हाथ और कान आदिके आभूषणोंको धारण करना कभी बंद न करे। अपने स्वामीसे द्वेष

७२२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

रखनेवाली स्त्रीसे ये कभी बाततक नहीं करती हैं। ये कहीं भी अकेली नही रहतीं और न कभी नंगी होकर स्नान करती हैं। सती स्त्रीको ओखली, मूसल, झाडू, सिलौट, चक्की और चौकठपर कभी नहीं बैठना चाहिये। पतिव्रता स्त्री कभी धृष्टताका परिचय न दे। जहाँ-जहाँ पतिकी रुचि हो, वहीं सती स्त्री सदा प्रेम रखे। यही स्त्रियोंका उत्तम व्रत, यही उनका परम धर्म और यही एकमात्र देवपूजा है कि वे पतिकी आज्ञाका उल्लंघन न करें। पति नपुंसक, दुर्दशाग्रस्त, रोगी, बूढ़ा, अच्छी स्थितिकाला अथवा बुरी परिस्थितिमें पड़ा हुआ हो, तो भी पतिका कभी त्याग न करे। पतिके हर्षमें हर्ष माने और पतिके मुखपर विषादकी छाया देखकर स्वयं भी विषादग्रस्त हो। पुण्यात्मा सती सम्पत्ति और विपत्तिमें भी पतिके साथ एकरूप होकर रहे। पतिको चिन्ता और परिश्रममें न डाले। तीर्थस्नानकी इच्छा रखनेवाली स्त्री अपने पतिका चरणोदक पीये; क्योंकि उसके लिये केवल पति ही भगवान् शिव और विष्णुसे बढ़कर है। जो पतिकी आज्ञाका उल्लंघन करके व्रत और उपवास आदिके नियम पालती है, वह अपने पतिकी आयु हर लेती है और मरनेपर नरकमें गिरती है। जो स्वयं प्रसन्न रहकर पतिको प्रसन्न रखती है, उसने तीनों लोकोंको प्रसन्न कर लिया है। पिता थोड़ा सुख देता है, भाई थोड़ा सुख देता है और पुत्र भी थोड़ा ही सुख देता है, अपरिमित सुख देनेवाला तो पति ही है। अतः उसकी सदा पूजा करनी चाहिये। पति ही देवता है, पति ही गुरु है और पति ही धर्म, तीर्थ एवं व्रत है। इसलिये स्त्री सबको छोड़कर केवल पतिकी पूजा करे।

इतना कहकर बृहस्पतिजी लोपामुद्रासे बोले—पतिके चरणारविन्दोंपर दृष्टि रखनेवाली महामाता लोपामुद्रे! हमने काशीमें आकर जो गंगा-स्नान किया है, उसीका यह फल है कि हमें आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। लोपामुद्राकी इस प्रकार स्तुति करके देवगुरुने अगस्त्य मुनिसे कहा—'महर्षे! आप प्रणव हैं और ये लोपामुद्रा श्रुति हैं। आप मूर्तिमान् तप हैं और ये क्षमा हैं। आप फल हैं और ये सत्क्रिया हैं। महामुने ! इन्हें पाकर आप धन्य हैं। ये देवी पातिव्रतका मूर्तिमान् तेज हैं और आप साक्षात् सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मतेज हैं। इसपर भी आपमें यह तपस्याका तेज और बढ़ा हुआ है। भला आपके लिये कौन-सा कार्य असाध्य है। यद्यपि कुछ भी आपसे अविदित नहीं है तथापि देवतालोग जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हैं, वह मैं बतलाता हूँ। मुने ! ध्यान देकर सुनें। विन्ध्य नामसे प्रसिद्ध पर्वत मेरु गिरिसे डाह रखनेके कारण बढ़कर इतना ऊँचा हो गया है कि उसने सूर्यदेवका मार्ग रोक लिया है, उसकी इस वृद्धिको आप रोकिये।'

देवगुरुका यह वचन सुनकर महामुनि अगस्त्यने क्षणभरके लिये चित्तको एकाग्र किया और 'बहुत अच्छा, आपलोगोंका कार्य सिद्ध करूँगा।' ऐसा कहकर देवताओंको विदा किया। तत्पश्चात् वे पुनः कुछ चिन्तन करते हुए ध्यानमग्न हो गये।

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अगस्त्यजीका काशीपुरीसे प्रस्थान, विन्ध्यपर्वतको लघुरूपमें रहनेका आदेश और महालक्ष्मीकी स्तुति

वेदव्यासजी कहते हैं—सूत! तदनन्तर ध्यानद्वारा भगवान् विश्वनाथजीका दर्शन करके मुनीश्वर अगस्त्य पुण्यमयी लोपामुद्रासे इस प्रकार बोले—'प्रिये ! काशीको लक्ष्य करके तत्त्वदर्शी मुनियोंने यह कहा है कि मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको कभी अविमुक्त क्षेत्र (काशीतीर्थ) का त्याग नहीं करना चाहिये, क्योंकि यह सदा सुलभ नहीं है। कहाँ विश्वाधार परमात्माको प्रकाशित करनेवाली काशीपुरी और कहाँ सब ओरसे अत्यन्त दुःख देनेवाला दूसरा कार्य। ऐसी

  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध *

७२३

काशीको शीघ्र कालके गालमें जानेवाला मनुष्य क्यों छोड़े। जो पाप एवं अविद्याका नाश करती है, देवताओंके लिये भी जो दुर्लभ है, गंगाजीके स्वच्छ जलसे जिसकी शोभा हो रही है, जो भव-बन्धनका नाश करनेवाली है, भगवान् शिव और अन्नपूर्णा जिसे कभी नहीं छोड़ते तथा जो मोक्षरूप मोतीको प्रकट करनेके लिये एकमात्र सीपी है, ऐसी मुक्तिमयी काशीपुरीको जीवन्मुक्त पुरुष कदापि नहीं छोड़ते। जो लहरें लेती हुई गंगाजीके जलसे अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होती है, जो प्रलयकालमें भी महादेवजीके त्रिशूलके अग्रभागपर स्थापित रहती है, ऐसी काशीको छोड़कर लोग अपने मनको जो अन्यत्र ले जाते हैं, यह उनकी कैसी जड़ता है! ब्राह्मणोंके आशीर्वाद और भगवान् विश्वनाथकी कृपासे ही काशी सुलभ होती है। काशी अपनी शरणमें आये हुए जीवोंकी रक्षा करनेवाली है। यहाँ मृत्युकालमें भगवान् शंकर सब जीवोंके कानमें तारक मन्त्रका उपदेश देते हैं, जिससे वे सब ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। वेदवादी विद्वान् कहते हैं कि काशीपुरीमें भगवान् शिव तारक मन्त्रके उपदेशसे वहाँ रहनेवाले सब जीवोंको निश्चय ही मुक्त कर देते हैं।'

तदनन्तर अगस्त्य मुनि कालभैरवजीके पास गये और प्रणाम करके बोले—भगवन्! आप काशीपुरीके स्वामी हैं, अतः मैं आपसे आज्ञा लेने आया हूँ। कालराज! मुझ निरपराधपर किस कारण आपकी यह अपराधदृष्टि हो गयी? क्यों आप मुझे काशीसे अन्यत्र जानेका अवसर देते हैं? यक्षराज! आप क्यों मुझे काशीसे बाहर भेजते हैं?—इस प्रकार विरहीकी भाँति विलाप करके 'हा काशी! हा काशी' की रट लगाते हुए अगस्त्यमुनि अपनी धर्मपत्नी लोपामुद्राके साथ चले और आधे पलमें उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ विन्ध्यपर्वत ऊँचे आकाशको रोककर खड़ा था। मुनिने अपने सामने ही खड़े हुए विन्ध्याचलपर दृष्टिपात किया। पर्वत भी पत्नीसहित अगस्त्य मुनिको अपने आगे खड़े देखकर काँप गया। वे तपस्या और क्रोधसे तथा काशीके विरहसे प्रकट हुई त्रिविध अग्नियोंसे प्रलयंकर अनलकी भाँति अत्यन्त प्रज्वलित-से जान पड़ते थे। उनपर दृष्टि पड़ते ही विन्ध्यपर्वत इतना छोटा हो गया मानो धरतीमें समा जाना चाहता हो। छोटा रूप धारण करके वह बोला—'भगवन्! मैं आपका सेवक हूँ, मेरे योग्य सेवाके लिये आज्ञा देकर मुझपर कृपा करें।'

अगस्त्यजी बोले—विन्ध्य! तुम साधुपुरुष हो, बुद्धिमान् हो और मुझे अच्छी तरह जानते हो। देखो, जबतक यहाँ पुनः लौटकर मेरा आना न हो, तबतक तुम अत्यन्त लघु रूपमें ही रहो। यों कहकर मुनिने अपने पदार्पणसे दक्षिण दिशाको सनाथ किया। मुनिवर अगस्त्यके चले जानेपर विन्ध्यपर्वतने मन-ही-मन विचार किया—आज अगस्त्य मुनिने जो मुझे शाप नहीं दिया है, इससे मैं समझता हूँ कि मेरा पुनः नया जन्म हुआ है। उस समय कालका ज्ञान रखनेवाले अरुण सारथिने अपने घोड़ोंको आगे बढ़ाया। पहलेकी भाँति सूर्यदेवके संचारणसे सम्पूर्ण जगत् पूर्णतः स्वस्थ हुआ। आज, कल अथवा परसोंतक मुनि अवश्य आवेंगे मानो इसी चिन्ताके महाभारसे दबा हुआ विन्ध्यगिरि ज्यों-का-त्यों स्थित है, परंतु आजतक न तो अगस्त्य मुनि आये और न पर्वत बढ़ा।

मुनिवर अगस्त्यजी गोदावरीके रमणीय तटपर विचरते हुए भी काशी-विरहजनित महान् सन्तापको नहीं छोड़ सके। वे पत्नीसहित विचरते हुए कोलापुरनिवासिनी महालक्ष्मीजीके समीप गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार स्तुति करने लगे—'कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली मातः कमले! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप भगवान् विष्णुके हृदयकमलमें निवास करनेवाली तथा सम्पूर्ण विश्वकी जननी हैं। कमलके कोमल गर्भके सदृश गौर वर्णवाली क्षीरसागरकी पुत्री

७२४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

महालक्ष्मी! आप अपनी शरणमें आये हुए प्रणतजनोंका पालन करनेवाली हैं। आप सदा मुझपर प्रसन्न हों। मदनकी एकमात्र जननी रुक्मिणीरूपधारिणी लक्ष्मी! आप भगवान् विष्णुके वैकुण्ठधाममें 'श्री' नामसे प्रसिद्ध हैं। चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली देवि! आप ही चन्द्रमामें चाँदनी हैं, सूर्यमें प्रभा हैं और तीनों लोकोंमें आप ही प्रभासित होती हैं। प्रणतजनोंको आश्रय देनेवाली माता लक्ष्मी! आप सदा मुझपर प्रसन्न हों। आप ही अग्निमें दाहिका शक्ति हैं। ब्रह्माजी आपकी ही सहायतासे विविध प्रकारके जगत्की रचना करते हैं। सम्पूर्ण विश्वका भरण-पोषण करनेवाले भगवान् विष्णु भी आपके ही भरोसे सबका पालन करते हैं। शरणमें आकर चरणमें मस्तक झुकानेवाले पुरुषोंकी निरन्तर रक्षा करनेवाली माता महालक्ष्मी! आप मुझपर प्रसन्न हों। निर्मल स्वरूपवाली देवि! जिनको आपने त्याग दिया है, उन्हींका भगवान् रुद्र संहार करते हैं। वास्तवमें आप ही जगत्का पालन, संहार और सृष्टि करनेवाली हैं। आप ही कार्य-कारणरूप जगत् हैं। निर्मलस्वरूपा लक्ष्मी! आपको प्राप्त करके ही भगवान् श्रीहरि सबके पूज्य बन गये। माँ! आप प्रणतजनोंका सदैव पालन करनेवाली हैं, मुझपर प्रसन्न हों। शुभे! जिस पुरुषपर आपका करुणापूर्ण कटाक्षपात होता है, संसारमें एकमात्र वही शूरवीर, गुणवान्, विद्वान्, धन्य, मान्य, कुलीन, शीलवान्, अनेक कलाओंका ज्ञाता और परम पवित्र माना जाता है। देवि! आप जिस किसी पुरुष, हाथी, घोड़ा, नपुंसक, तिनका, सरोवर, देवमन्दिर, गृह, अन्न, रत्न, पशु-पक्षी, शय्या और भूमिमें क्षणभर भी निवास करती हैं, समस्त संसारमें केवल वही शोभासम्पन्न होता है, दूसरा नहीं। हे श्रीविष्णुपत्नि! हे कमले! हे कमलालये! हे माता लक्ष्मी! आपने जिसका स्पर्श किया है, वह पवित्र हो जाता है और आपने जिसे त्याग दिया है, वही सब इस जगत्में अपवित्र है। जहाँ आपका नाम है, वहीं उत्तम मंगल है। जो लक्ष्मी, श्री, कमला, कमलालया, पद्मा, रमा, नलिनयुग्मकरा (दोनों हाथोंमें कमल धारण करनेवाली), माँ, क्षीरोदजा, अमृतकुम्भकरा (हाथोंमें अमृतका कलश धारण करनेवाली), इरा और विष्णुप्रिया—इन नामोंका सदा जप करते हैं, उनके लिये कहाँ दुःख है।'*

इस प्रकार हरिप्रिया भगवती महालक्ष्मीकी


* अगस्त्यिरुवाच—

मातर्नमामि कमले कमलायताक्षि श्रीविष्णृहृत्कमलवासिनि विश्वमातः।
क्षीरोदजे कमलकोमलगर्भगौरि लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये॥
त्वं श्रीरुपेन्द्रसदने मदनैकमातर्ज्योत्स्नासि चन्द्रमसि चन्द्रमनोहरास्ये।
सूर्ये प्रभासि च जगत्त्रितये प्रभासि लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये॥
त्वं जातवेदसि सदा दहनात्मशक्तिर्वेधास्त्वया जगदिदं विविधं विदध्यात्।
विश्वम्भरोऽपि बिभृयादखिलं भवत्या लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये॥
त्वत्त्यक्तमेतदमले हरते हरोऽपि त्वं पासि हंसि विदधासि परावरासि।
ईड्यो बभूव हरिरप्यमले त्वदाप्त्या लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये॥
शूरः स एव स गुणी स बुधः स धन्यो मान्यः स एव कुलशीलकलाकलापैः।
एकः शुचिः स हि पुमान् सकलेऽपि लोके यत्रापतेत्तव शुभे करुणाकटाक्षः॥
यस्मिन्वसेः क्षणमहो पुरुषे गजेऽश्वे स्त्रैणे तृणे सरसि देवकुले गृहेऽन्ने।
रत्ने पतत्रिणि पशौ शयने धरायां सश्रीकमेव सकले तदिहास्ति नान्यत्॥
त्वत्स्पृष्टमेव सकलं शुचितां लभेत त्वत्त्यक्तमेव सकलं त्वशुचीह लक्ष्मि।
त्वन्नाम यत्र च सुमङ्गलमेव तत्र श्रीविष्णुपत्नि कमले कमलालयेऽपि॥
लक्ष्मीं श्रियं च कमलां कमलालयां च पद्मां रमां नलिनयुग्मकरां च मां च।
क्षीरोदजाममृतकुम्भकरामिरां च विष्णुप्रियामिति सदा जपतां क्व दुःखम्॥
\hfill (स्क० पु०, का० पू० ५।८०–८७)

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७२५

स्तुति करके पत्नीसहित अगस्त्य मुनिने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।

लक्ष्मीजीने कहा—मित्रावरुणनन्दन अगस्त्य! उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो। उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली पतिव्रते लोपामुद्रे! तुम भी उठो। मैं इस स्तुतिसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम मनोवांछित वर माँगो।

यों कहकर विष्णुप्रिया श्रीलक्ष्मीजीने मुनिपत्नी लोपामुद्राको हृदयसे लगा लिया और प्रेमपूर्वक अनेक प्रकारके सौभाग्यसूचक आभूषणोंसे उन्हें विभूषित किया। तत्पश्चात् वे पुनः बोलीं—'मुने! मैं तुम्हारे आन्तरिक तापका कारण जानती हूँ।' यह सुनकर महाभाग मुनिवर अगस्त्यजीने लक्ष्मीदेवीको प्रणाम करके भक्तिसे भरा हुआ वचन कहा—'देवि! यदि मैं वर देनेयोग्य होऊँ तो आप मेरे लिये यही वर प्रदान करें कि मुझे पुनः काशीकी प्राप्ति हो। मेरे द्वारा की हुई आपकी इस स्तुतिका जो सदा भक्तिपूर्वक पाठ करें, उन्हें कभी सन्ताप और दरिद्रता न हो।'

लक्ष्मीजीने कहा—मुने! 'एवमस्तु'। तुमने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा होगा। इस स्तोत्रका पाठ मेरे सामीप्यकी प्राप्ति करानेवाला होगा। मुनीश्वर! आनेवाले उनतीसवें द्वापरमें तुम व्यास होओगे। उस समय काशीमें आकर वेदों-पुराणोंका विस्तार करके सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश देकर तुम मनोवांछित सिद्धि प्राप्त करोगे। इस समय मैं तुम्हारे हितकी एक बात बतलाती हूँ, उसका पालन करो। यहाँसे कुछ ही दूरीपर जाकर अपने सामने खड़े हुए स्वामिकार्तिकेयका दर्शन करो। ब्रह्मन्! वे तुम्हें काशीका यथार्थ रहस्य बतलायेंगे।

इस प्रकार वरदान पाकर महालक्ष्मीको प्रणाम करके मुनिवर अगस्त्य उस स्थानपर गये, जहाँ श्रीकार्तिकेयजी विराजमान हैं।


मुक्तिदायक तीर्थोंका वर्णन तथा मानसतीर्थ एवं काशीकी श्रेष्ठता

श्रीव्यासजी कहते हैं—सूत! जिन सत्पुरुषोंके हृदयमें परोपकारकी भावना जाग्रत् रहती है, उनकी विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और उन्हें पग-पगपर सम्पत्ति प्राप्त होती है। उपकारके द्वारा जैसे पुण्य-फलकी प्राप्ति होती है, तीर्थोंमें स्नान करनेसे भी वैसी शुद्धि नहीं होती, बहुतेरे दान देनेसे भी वह फल नहीं मिलता और कठोर तपस्याओंसे भी उस पुण्यकी प्राप्ति नहीं होती। परोपकारसे जो धर्म होता है तथा दान आदि सत्कर्मोंसे जिस धर्मकी प्राप्ति होती है, उन दोनोंको ब्रह्माजीने तौला था। उस समय परोपकारजनित धर्मका ही पलड़ा भारी रहा। सम्पूर्ण वाङ्मय (शास्त्र)-का मन्थन करके यही निर्णय किया गया है कि उपकारसे बढ़कर कोई धर्म नहीं और अपकारसे बढ़कर कोई पाप नहीं है। परोपकारजनित पुण्यके प्रभावसे ही साक्षात् महालक्ष्मीका दर्शन करके मुनिवर अगस्त्य कृतार्थ हो गये। वहाँसे आगे बढ़नेपर मुनिने श्रीपर्वतको

७२६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

देखा, जहाँ साक्षात् त्रिपुरारि महादेवजी निवास करते हैं। उसे देखकर मुनिके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने अपनी पत्नीसे कहा—'प्रिये! देखो। यह जो परम शोभायमान श्रीशैलका शिखर दिखायी देता है, इसके दर्शनसे मनुष्योंका इस संसारमें पुनर्जन्म कभी नहीं होता। इसका विस्तार चौरासी योजनका है। यह सम्पूर्ण पर्वत शिवममय है, अतः इसकी परिक्रमा करनी चाहिये।'

लोपामुद्रा बोली—यदि प्राणनाथकी आज्ञा हो तो मैं कुछ निवेदन करना चाहती हूँ; क्योंकि पतिकी आज्ञाके बिना जो स्त्री बोलती है, वह अपने धर्मसे गिर जाती है।

अगस्त्यजीने कहा—देवि! तुम क्या कहना चाहती हो, कहो। तुम्हारे-जैसी साध्वी स्त्रियोंका वचन पतिके लिये खेदजनक नहीं होता।

तदनन्तर मुनिको प्रणाम करके देवी लोपामुद्राने विनयपूर्वक पूछा—महर्षे! श्रीशैलका दर्शन करके मनुष्यका पुनर्जन्म नहीं होता है, यदि यह बात सत्य है, तो आप काशीकी अभिलाषा क्यों करते हैं।

अगस्त्यजी बोले—वरारोहे! सुनो। तत्त्वका विचार करनेवाले ज्ञानी मुनियोंने बार-बार यह निर्णय किया है कि मुक्तिके अनेक स्थान हैं। पहला तीर्थराज प्रयाग है, जो सर्वत्र विख्यात है। वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है। इसके सिवा नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, गंगाद्वार (हरिद्वार), अवन्ती, अयोध्या, मथुरा, द्वारका, अमरावती, सरस्वती और समुद्रका संगम, गंगासागर-संगम, कांचीपुरी, त्र्यम्बक तीर्थ, सप्त गोदावरीतट, कालंजरतीर्थ, प्रभास क्षेत्र, बदरिकाश्रम, महालय, ॐकारक्षेत्र (अमरकण्टक), पुरुषोत्तमक्षेत्र (जगन्नाथपुरी), गोकर्णतीर्थ, भृगुकच्छ, भृगुतुंग, पुष्कर, श्रीपर्वत और धारातीर्थ आदि बहुत-से तीर्थ मुक्तिदायक हैं। सत्य, दया आदि जो मानसिक-तीर्थ हैं, वे भी मोक्ष देनेवाले हैं। गया क्षेत्र भी पितरोंके लिये मोक्षदायक बताया गया है। वहाँ श्राद्ध करनेसे मनुष्य अपने पितरों, पितामहोंके ऋणसे मुक्त होते हैं।

लोपामुद्राने पूछा—महामते! आपने जिन्हें मानसतीर्थ कहा है, वे कौन-कौनसे हैं? बतानेकी कृपा करें।

अगस्त्यजीने कहा—शुभे! सत्य तीर्थ है, क्षमा तीर्थ है, इन्द्रियोंको वशमें रखना भी तीर्थ है, सब प्राणियोंपर दया करना तीर्थ है और सरलता भी तीर्थ है। दान, दम (मनका संयम) तथा सन्तोष—ये भी तीर्थ कहे गये हैं। ब्रह्मचर्यका पालन उत्तम तीर्थ है। प्रिय वचन बोलना भी तीर्थ ही है। ज्ञान तीर्थ है, धैर्य तीर्थ है और तपस्याको भी तीर्थ कहा गया है। तीर्थोंमें भी सबसे बड़ा तीर्थ है अन्तःकरणकी आत्यन्तिक शुद्धि। पानीमें शरीरको डुबो लेना ही स्नान नहीं कहलाता। जिसने दम तीर्थमें स्नान किया है, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखा है, उसीने वास्तविक स्नान किया है। जिसने मनकी मैल धो डाली है, वही शुद्ध है। जो लोभी, चुगलखोर, क्रूर, पाखण्डी और विषयासक्त है, वह सब तीर्थोंमें स्नान करके भी पापी और मलिन ही रह जाता है। केवल शरीरके मलका त्याग करनेसे ही मनुष्य निर्मल नहीं होता। मानसिक मलका परित्याग करनेपर ही वह भीतरसे अत्यन्त निर्मल होता है। जलमें निवास करनेवाले जीव जलमें ही जन्म लेते और मरते हैं। किंतु उनका मानसिक मल नहीं घुलता। इसलिये वे स्वर्गको नहीं जाते। विषयोंके प्रति अत्यन्त राग होना मानसिक मल कहलाता है और उन्हीं विषयोंमें विराग होना निर्मलता कही गयी है। यदि अपने भीतरका मन दूषित है तो मनुष्य तीर्थस्नानसे शुद्ध नहीं होता। जैसे मदिरासे भरे हुए घड़ेको ऊपरसे जलद्वारा सैकड़ों बार धोया जाय, तो भी वह पवित्र नहीं होता, उसी प्रकार दूषित अन्तःकरणवाला मनुष्य भी तीर्थस्नानसे शुद्ध नहीं होता। भीतरका