संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रवेश कर गयी और क्षणभरमें जलकर भस्म हो गयी। फिर शबरने उस भस्मको लेकर जले हुए घरके समीप ही भगवान् शिवका पूजन किया। पूजनके अन्तमें उसने प्रसाद लेनेको नित्य आनेवाली अपनी प्रियतमाका स्मरण किया। स्मरण करते ही वह पहलेकी भाँति हाथ जोड़कर सामने खड़ी दिखायी दी। पत्नीको देखकर तथा जलकर भस्म हुए घरको भी पूर्ववत् स्थित पाकर शबर आश्चर्यचकित हो सोचने लगा—'अहो! अग्नि तो अपने तेजसे वस्तुको जलाती है, सूर्य केवल किरणोंसे तपाते हैं, राजा अपने दण्डके द्वारा अपराधीको दग्ध करता है और ब्राह्मण मनसे जला डालता है। मेरी पत्नी तो प्रत्यक्ष अग्निमें जल गयी थी। यह जीवित कैसे हो गयी? पता नहीं यह स्वप्न है अथवा भ्रममें डालनेवाली माया।' इस प्रकार विचार करते हुए शबरने अपनी स्त्रीसे पूछा—'प्रिये! तुम तो अग्निमें भस्म हो गयी थी, यहाँ कैसे आ गयी और यह जला हुआ घर फिर पहलेके ही समान खड़ा कैसे हो गया?'
शबरीने कहा—जब मैं घरमें आग लगाकर उसके भीतर प्रविष्ट हुई, तबसे अपने-आपकी मुझे कोई सुध न रही। न तो मैंने आग देखी है और न लेशमात्र भी तापका अनुभव किया है। जान पड़ता था, मानो मैं जलमें घुसी हूँ। मैं आधे क्षणतक गाढ़ निद्रामें सोयी-सी रही और अब क्षणभरमें जाग उठी हूँ। उठते ही मैंने देखा अपना घर जला हुआ नहीं है, पूर्ववत् सुस्थिर है। इस समय भगवान्की पूजाके अन्तमें प्रसाद लेनेके लिये आपके पास आयी हूँ।
इस प्रकार वे दोनों दम्पति प्रेमपूर्वक आपसमें वार्तालाप कर रहे थे, इतनेमें ही उनके आगे परम अद्भुत दिव्य विमान प्रकट हुआ। उसपर भगवान् शंकरके चार सेवक आगेकी ओर बैठे थे। उन्होंने दोनों निषाद-दम्पतिका हाथ पकड़कर उन्हें विमानपर बिठा लिया। शबर और शबरीको अपने शरीरका त्याग भी नहीं करना पड़ा। शिवदूतोंके हाथोंका स्पर्श प्राप्त होते ही निषाद-दम्पतिके वे ही शरीर तत्काल उन्हींके समान दिव्य हो गये। इसलिये समस्त पुण्यकर्मोंमें श्रद्धा ही करनी चाहिये, क्योंकि शबरने नीच होकर भी श्रद्धाके बलसे योगियोंकी गति प्राप्त की। सब वर्णके लोगोंसे उत्तम जन्म पानेसे क्या लाभ? सम्पूर्ण शास्त्रोंका विचार करनेवाली विद्यासे भी यदि श्रद्धा न हो, तो क्या लाभ है? जिसके चित्तमें सदा भगवान् शिवकी भक्ति बनी रहती है, उससे बढ़कर तीनों लोकोंमें कौन पुरुष धन्य है।
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उमामहेश्वरव्रतकी महिमा, इसके पालनसे शारदाको शिवलोककी प्राप्ति तथा सत्कथा-श्रवणका माहात्म्य और ब्राह्मखण्डकी समाप्ति
सूतजी कहते हैं—आनर्तदेशमें वेदरथ नामक एक ब्राह्मण थे। उनका जन्म उत्तम कुलमें हुआ था। वे स्त्री-पुत्रसे सम्पन्न और विद्वान् थे। ब्राह्मणके एक कन्या हुई, जिसका नाम शारदा रखा गया। वह रूप और शुभ लक्षणोंसे सुशोभित कन्या जब बारह वर्षकी हुई, तब उसे पद्मनाभ नामक एक प्रौढ़ ब्राह्मणने माँगा। पद्मनाभजीकी पत्नी मर गयी थी। वे बड़े धनी, शान्त और राजाके मित्र थे। पिताने उनकी याचना भंग होनेके भयसे अपनी कन्या उन्हें दे दी। दोपहरमें विवाह करके पद्मनाभजी ससुरालमें सायंकाल होनेपर सन्ध्योपासना करनेके लिये एक सरोवरके