भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 740, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 740
  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ७११

तटपर गये। वहाँ विधिपूर्वक सन्ध्योपासन करके जब लौटने लगे, तब अन्धकारपूर्ण मार्गमें एक साँपने उन्हें काट लिया। इससे उनकी मृत्यु हो गयी। विवाह करनेके पश्चात् सहसा उनकी मृत्यु होनेपर भाई-बन्धु रोने और विलाप करने लगे। सास-श्वशुर और वह कन्या सभी शोकमें डूब गये। भाई-बन्धु मृतकका दाह-संस्कार करके अपने-अपने घर लौट गये। विधवा शारदा पिताके ही घरमें रह गयी।

एक दिन 'नैध्रुव नामवाले कोई अन्धे मुनि अपने शिष्यका हाथ पकड़े हुए शारदाके घरपर आये। मुनि बहुत वृद्ध हो गये थे। जिस समय वे घरपर पधारे, शारदाके भाई कहीं बाहर चले गये थे। अतः शारदा ही उनके समीप आयी और इस प्रकार बोली—'महाभाग! आपका स्वागत है, इस पीढ़ेपर बैठिये। आप मुनिनाथको मेरा नमस्कार है। आज्ञा दीजिये मैं आपका कौन-सा कार्य करूँ?' यों कहकर शारदाने बड़े भक्ति-भावसे मुनिके पैर धुलवाये और पंखेसे हवा करके उन्हें सन्तुष्ट किया। थके-माँदे मुनिको पीढ़ेपर बिठाकर उन्हें विधिपूर्वक स्नान कराया और जब वे देवपूजा करके सुखपूर्वक आसनपर बैठे, तब उन्हें आदरपूर्वक उत्तम अन्न भोजन कराया। भोजन करके तृप्त हो जब वे मुनि आनन्दसे परिपूर्ण हुए, तब अन्धमुनिने उस कन्याके लिये उत्तम आशीर्वाद दिया—'भद्रे! तुम पतिके साथ विहार करके सर्वगुणसम्पन्न श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करो और संसारमें बड़ी भारी कीर्ति पाकर देवताओंके प्रसादकी अधिकारिणी बनो।'

अन्धमुनिके द्वारा कहे हुए इस वचनको सुनकर शारदा बहुत विस्मित हुई और हाथ जोड़कर बोली—ब्रह्मन्! आपका वचन सदा सत्य होता है, कभी झूठ नहीं होता। परंतु यह मुझ अभागिनीके लिये कैसे सफल होगा? मैं विधवा हूँ, आपके इन आशीर्वादोंकी पात्र कैसे हो सकूँगी।

मुनि बोले—शुभे! मुझ अन्धेने तुझे न देख सकनेके कारण तुम्हारे लिये जो कुछ कहा है, उसे मैं अवश्य सिद्ध करूँगा। तुम मेरी आज्ञाका पालन करो। यदि तुम उमा-महेश्वर नामक व्रत करोगी, तो उसके प्रभावसे शीघ्र ही कल्याण-भागिनी होओगी।

शारदाने कहा—ब्रह्मन्! आपके बताये हुए दुष्कर व्रतका भी मैं यत्नपूर्वक पालन करूँगी। मुझे वह व्रत और उसका विधान विस्तार-पूर्वक बताइये।

मुनि बोले—चैत्र अथवा मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षमें शुभ दिनको इस व्रतका प्रारम्भ करना चाहिये। अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या अथवा पूर्णिमाको विधिपूर्वक संकल्प करके प्रातःकाल स्नान करे, देवताओं और पितरोंका तर्पण करके अपने घर आकर एक सुन्दर मण्डप बनावे, जो चंदोवे आदिसे अलंकृत हो। उसे फल, फूल, पल्लव और बन्दनवारोंसे सजावे। बीचमें पाँच प्रकारके रंगोंसे कमलका चिह्न अंकित करे। उसके मध्यभागमें धान्य अथवा चावलोंकी राशि करके उसके ऊपर कुशा रखे और उस कुशाके ऊपर जलपूर्ण कलश स्थापित करके उसके ऊपर रँगा हुआ वस्त्र रखे। वस्त्रके ऊपर सोनेकी दो प्रतिमाएँ (जो शिव-पार्वतीकी प्रतीक हैं) स्थापित करे। तत्पश्चात् भक्तिभावसे अपनी शक्तिके अनुसार विस्तारपूर्वक उनकी पूजा करे। पंचामृतसे स्नान कराकर फिर शुद्ध जलसे नहलावे। एकादश रुद्रमन्त्रका जप करके एक सौ आठ बार 'नमः शिवाय' इस पंचाक्षरमन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। फिर सिंहासनपर उन प्रतिमाओंको पधराकर पूजा करे। बुद्धिमान् पुरुष स्वयं धुले हुए श्वेत वस्त्र धारण करके शुद्ध आसनपर बैठे। पीठको अभिमन्त्रित करके प्राणायाम करे। भगवान् शिवके आगे हाथ जोड़कर यों संकल्प पढ़े—