संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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'मेरे सैकड़ों जन्मोंमें जो भयंकर पाप संचित हुए हैं, उन सबका विनाश करनेके लिये मैं शिवकी पूजा प्रारम्भ करता हूँ। सौभाग्य, विजय, आरोग्य, धर्म और ऐश्वर्यकी वृद्धि तथा स्वर्ग एवं मोक्षकी सिद्धिके लिये मैं शिवजीकी पूजा करूँगा'—इस प्रकार संकल्प बोलकर मनुष्य एकाग्रतापूर्वक यथायोग्य अंगन्यास करके शिव और पार्वतीका ध्यान करे। अपने हृदय-कमलकी कर्णिकामें जगत्के माता-पिता शिव-पार्वतीका ध्यान करके तत्सम्बन्धी मन्त्रोंका जप करे। जपके पश्चात् बाह्य-पूजन प्रारम्भ करे। दोनों सुवर्ण-प्रतिमाओंमें शिव-पार्वतीका आवाहन करके उनके लिये आसन आदि दे। फिर निम्नांकित मन्त्रसे मन्त्रज्ञ पुरुष उन्हें अर्घ्य दे—
नमस्ते पार्वतीनाथ त्रैलोक्यवरदर्षभ।
त्र्यम्बकेश महादेव गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
नमस्ते देवदेवेशि प्रपन्नभयहारिणि।
अम्बिके वरदे देवि गृहाणार्घ्यं शिवप्रिये॥
'तीनों लोकोंको वर देनेवाले देवताओंमें सबसे श्रेष्ठ पार्वतीनाथ! आपको नमस्कार है। त्र्यम्बकेश्वर महादेव! आपको नमस्कार है, यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये। शरणागतोंका भय दूर करनेवाली देवदेवेश्वरी जगदम्बिके! वरदायिनी देवि! शिवप्रिये! आप यह अर्घ्य स्वीकार कीजिये।'
इस प्रकार तीन बार कहकर मनुष्य एकाग्रचित्त हो उन्हें अर्घ्य दे। फिर विधिपूर्वक गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप और दीप आदि उपचारोंको चढ़ावे। खीरके साथ घीमें तैयार किया हुआ नैवेद्य अर्पण करे। तत्पश्चात् मूलमन्त्रद्वारा एक सौ आठ बार हविष्यकी आहुति दे। फिर नैवेद्य हटाकर धूप, आरती करके ताम्बूल अर्पण करे और मनको एकाग्र करके नमस्कार करे। इस प्रकार उपचारसे पूजा करके ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन करावे। इसी प्रकार सायंकालकी पूजा करके ब्राह्मणकी अनुमति ले रातमें मौनभावसे दूधमें तैयार किया हुआ हविष्य भोजन करे। इस प्रकार विद्वान् पुरुष एक वर्षतक दोनों पक्षोंमें इस व्रतका पालन करता रहे। वर्ष पूरा होनेपर व्रतका उद्यापन करे। शतरुद्रियका पाठ करते हुए दोनों प्रतिमाओंको जलसे स्नान करावे। आगमोक्त मन्त्रोंसे शिव-पार्वतीकी भलीभाँति पूजा करे। अन्तमें वस्त्र, सुवर्ण और प्रतिमासहित कलश सदाचारी आचार्यको देकर ब्राह्मणोंको भोजन करावे। उनका भी यथाशक्ति स्वागत-सत्कार करके उन्हें गौ, सुवर्ण और वस्त्र आदिकी दक्षिणा दे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर अपने इष्टमित्रों और बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार जो भक्तिपूर्वक इस त्रिभुवनप्रसिद्ध व्रतका पालन करता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके मनोवांछित भोगोंका उपभोग करता है। इन्द्र आदि लोकपालोंके दिव्य लोकोंमें रमण करता है और अन्तमें भगवान् शिवको ही प्राप्त होता है। शुभे! मेरे बताये हुए इस महाव्रतका तुम भी श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करो। इससे अत्यन्त दुर्लभ मनोरथको भी प्राप्त कर लोगी।