भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 742
  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * | ७१३ ---|---

मुनीश्वर नैध्रुवके इस प्रकार आदेश देनेपर शारदाने विश्वासपूर्वक उनके वचनोंको ग्रहण किया। तत्पश्चात् उसके पिता, माता और भाई बाहरसे घरमें आये। उन्होंने देखा मुनि भोजन करके सुखपूर्वक बैठे हुए हैं। सबने सहसा आकर उन महात्माके चरणोंमें प्रणाम किया और स्वयं भी उनका पूजन किया। 'साध्वी शारदाने उस श्रेष्ठ मुनिका पूजन किया है और मुनिने उसे अनुग्रहपूर्वक व्रतका उपदेश दिया है'— यह सब सुनकर उसके भाई-बन्धुओंको बड़ा हर्ष हुआ। वे सब हाथ जोड़कर बोले— 'मुने! आज आपके आगमनमात्रसे हम सब लोग धन्य हो गये। हमारा समस्त कुल पवित्र हो गया और यह घर भी सार्थक हो गया। आप हमारे घरके पास ही निवास करें और जो यह घरका मठ है, यह स्नान, पूजाके लिये बहुत उपयोगी है अतः इसीमें रहिये।' इस प्रकार प्रार्थना करनेपर उन मुनिश्रेष्ठने 'बहुत अच्छा' कहकर ब्राह्मणके उत्तम मठमें निवास किया।

इस प्रकार मुनिके समीप नियममें मन लगाकर उस महाव्रतका पालन करती हुई शारदाका एक वर्ष पूरा हो गया। वर्ष व्यतीत होनेपर उसने पिताके घरमें ही ब्राह्मण-भोजनपूर्वक भलीभाँति व्रतका उद्यापन किया। उन ब्राह्मणोंको यथायोग्य दक्षिणा देकर प्रणामपूर्वक विदा किया। माता-पिताने उसके इस कार्यकी बड़ी प्रशंसा की। शारदा उस दिन भी उपवास करके नियम-पालनपूर्वक महात्मा नैध्रुवके बताये हुए उत्तम मन्त्रका जप करती रही। तदनन्तर प्रदोषकाल आनेपर उसने भगवान् शंकरका पूजन किया और घरके पासवाले मठमें भगवान् शिवका ध्यान करती हुई साध्वी शारदा रातभर भगवान् शिवके समीप जागती रही। शारदाकी भक्ति और मुनिकी तपस्या एवं समाधिसे सन्तुष्ट होकर जगन्माता पार्वती उनके सामने प्रकट हुईं। उनके प्रकट होते ही अन्धे मुनिको दो नेत्र प्राप्त हो गये। अपने सम्मुख प्रकट हुई जगन्माता पार्वतीका दर्शन करके वे मुनि और वह ब्राह्मण-कन्या दोनों उनके चरणोंमें गिर पड़े। तब उन दोनोंको उठाकर पार्वतीदेवीने बड़े प्रेमसे कहा— 'मुनिश्रेष्ठ! मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ। पापरहित पुत्री शारदा! तुम्हारे ऊपर भी मैं प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम्हारी रुचिके अनुसार कौन-सा देवदुर्लभ वर प्रदान करूँ?'

मुनि बोले— देवि! यह 'शारदा' नामकी कन्या विधवा हो गयी है। मैंने अन्ध होनेके कारण इस बातको न जानकर इसकी सेवासे सन्तुष्ट हो यह आशीर्वाद दिया है कि 'तुम अपने पतिके साथ चिरकालतक विहार करके उत्तम पुत्र प्राप्त करो।' जगदम्बा! आप मेरे इस वचनको सत्य करें, आपको नमस्कार है।

श्रीपार्वतीदेवीने कहा— ब्रह्मन्! यह शारदा पूर्वजन्ममें एक द्राविड़ ब्राह्मणकी द्वितीय पत्नी थी। उस समय इसका नाम भामिनी था। भामिनी अपने पतिकी बड़ी प्यारी थी। अपनी रूपमाधुरीसे परम मनोहर दिखायी देनेवाली भामिनीने रूपवशीकरण आदि छलपूर्ण उपायोंसे पतिको अपने वशमें कर लिया। वह मोहग्रस्त ब्राह्मण अपनी छोटी पत्नीमें ही आसक्त होनेके कारण अपनी ज्येष्ठ एवं पतिव्रता पत्नीके पास कभी नहीं गया। पति-समागमसे वंचित होनेसे वह स्त्री पुत्रहीन रह गयी। इससे वह मन-ही-मन सदा सन्तप्त रहती थी और उसी दशामें समयानुसार उसकी मृत्यु हो गयी। भामिनीके घरके पास एक तरुण ब्राह्मण रहता था। वह इस सुन्दरीको देखकर मोहित हो गया था। एक दिन उसने कामसे आतुर होकर इसका हाथ पकड़ लिया। उस समय इसने क्रोधसे लाल आँखें करके उसे दूर