भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 743

७१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भगा दिया। वह दिन-रात इसीका चिन्तन करते-करते मृत्युको प्राप्त हुआ।

इसने स्वामीको मोहित करके जो उन्हें ज्येष्ठ पत्नीसे विमुख किया था, उसी पापसे यह इस जन्ममें विधवा हुई। जो स्त्रियाँ संसारमें पति-पत्नीमें वियोग कराती हैं, उन्हें इक्कीस जन्मोंतक बाल्यावस्थामें विधवा होना पड़ता है। और वह काममोहित ब्राह्मण जो परायी स्त्रीके विरहसे पीड़ित होकर मृत्युको प्राप्त हुआ था, उसने भी पाप ही किया था। अतः इस जन्ममें वह इसका पाणिग्रहणमात्र करके मृत्युको प्राप्त हुआ है। पूर्वजन्ममें जो इसका पति था, वह इस समय पाण्ड्यदेशमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें उत्पन्न हुआ है। उसके पास धन, सम्पत्ति, स्त्री तथा सुखभोगकी सामग्री सब कुछ है। यह शारदा अपने उसी पतिके साथ प्रत्येक रात्रिमें स्वप्नावस्थामें समागम करके जागरण कालकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ रतिसुखका अनुभव करे। स्वप्नावस्थामें पति-समागमसे यह कुछ ही समयमें वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् पुत्र प्राप्त कर लेगी। वे ब्राह्मणदेवता भी स्वप्नमें अपने साथ चिरसमागमसे इसके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्रको सदैव देखा करेंगे। महामुने! पूर्वजन्ममें इसने मेरी आराधना की है और इसीको वर देनेके लिये मैं प्रकट हुई हूँ।

तदनन्तर महादेवी पार्वतींने शारदासे आदरपूर्वक कहा—बेटी! तुम मेरी उत्तम बात सुनो। जब कभी भी किसी देशमें अपने स्वप्नमें देखे हुए पूर्वपतिको देखना, तब समझ लेना कि यही मेरे पुरातन पति हैं। वे ब्राह्मण भी तुम्हें देखकर पहचान लेंगे। उस समय तुम दोनोंमें वार्तालाप होगा। ऐसा अवसर आनेपर तुम अपने विद्वान् पुत्रको उन्हीं ब्राह्मणकी सेवामें समर्पित कर देना। उमा-महेश्वर-व्रतका जो श्रेष्ठ फल है, उसके अर्धभागको इस प्रकार उन्हींके हाथोंमें सौंप देना और तबसे उन्हींके अधीन होकर रहना। तुम दोनोंको स्वप्न-मिलनके सिवा कभी शारीरिक संग नहीं करना चाहिये। समय आनेपर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण जब मृत्युको प्राप्त होंगे, तब उन्हींके साथ चिताकी अग्निमें प्रवेश करके तुम मेरे धामको प्राप्त होओगी।

ऐसा कहकर जगन्माता पार्वती अन्तर्धान हो गयीं। वह कन्या करुणामयी पार्वतीका वरदान पाकर बहुत प्रसन्न हुई। रात्रि व्यतीत होनेपर नूतन नेत्र पाये हुए धर्मज्ञ मुनिने उसके माता-पितासे एकान्तमें सब बात बतायी। तत्पश्चात् वे चले गये। इस प्रकार कुछ दिन बीतनेपर शारदाने स्वप्नमें पतिका समागम प्राप्त किया। पार्वतीदेवीके वरदानसे उसके गर्भ रह गया। उस विधवाको गर्भवती हुई सुनकर सब लोग व्यभिचारिणी कहकर उसे धिक्कार देने लगे। उसके मरे हुए पतिके जातिभाइयोंने जब यह असह्य बात सुनी, तब वे सब लोग शारदाके पिताके घर आये। गाँवके बड़े-बूढ़े पण्डित भी आये। सबने कुलके वृद्ध पुरुषोंके साथ बैठकर गोष्ठी की। लज्जासे नतमुख हुई गर्भवती शारदाको बुलाकर कुछ लोग बड़े क्रोधमें भरकर उसे डाँटने लगे। कुछ लोगोंने उसकी ओरसे मुँह फेर लिया। कुछ निर्दयी वृद्धोंने अपना निर्णय इस प्रकार व्यक्त किया—'यह पापबुद्धिवाली कन्या दोनों कुलोंका नाश करनेवाली है, इसके केश मुँड़वाकर नाक और कान काट दिये जायँ और इसे कुल और जातिसे बहिष्कृत करके गाँवसे बाहर निकाल दिया जाय।' यह सुनकर सब लोग ऐसा ही करनेको तैयार हो गये। इसी समय सबको आकाशवाणी सुनायी पड़ी—'इस कन्याने न तो कोई पाप किया है, न कुलमें कलंक लगाया है और न इसके पातिव्रत्यका भंग ही हुआ है। यह सदाचारपरायणा स्त्री है। इसके बाद जो लोग