भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 756
  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७२७

भाव शुद्ध न हो तो दान, यज्ञ, तप, शौच, तीर्थसेवन, शास्त्रोंका श्रवण एवं स्वाध्याय—ये सभी अतीर्थ हो जाते हैं। जिसने अपने इन्द्रियसमुदायको वशमें कर लिया है, वह मनुष्य जहाँ निवास करता है, वहीं उसके लिये कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्कर आदि तीर्थ हैं। ध्यानसे पवित्र तथा ज्ञानरूपी जलसे भरे हुए राग-द्वेषमय मलको दूर करनेवाले मानसतीर्थमें जो पुरुष स्नान करता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है*। देवि! यह तुम्हें मानसतीर्थका लक्षण बताया गया। अब पृथ्वीपर जो तीर्थ हैं, उनकी पवित्रताका क्या हेतु है, यह सुनो। जैसे शरीरके कुछ अंग अत्यन्त पवित्र माने गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वीके कुछ भाग अत्यन्त पुण्यमय हैं। पृथ्वीके अद्भुत प्रभाव, जलके विलक्षण तेज तथा मुनियोंके निवासस्थान होनेसे तीर्थ पुण्यस्वरूप माने जाते हैं। अतः जो प्रतिदिन भूमण्डलके तीर्थों और मानसतीर्थोंमें भी स्नान करता है, वह परम-गतिको प्राप्त होता है। जिसके हाथ, पैर, मन, विद्या, तप और कीर्ति सभी संयममें हैं, वह तीर्थके पूर्ण फलका भागी होता है। जो प्रतिग्रह नहीं लेता और जिस किसी भी वस्तुसे सन्तुष्ट रहता है तथा जिसमें अहंकारका सर्वथा अभाव है, वह तीर्थफलका भागी होता है। जो दम्भी नहीं है, नये-नये कार्योंका प्रारम्भ नहीं करता, थोड़ा खाता है, इन्द्रियोंको काबूमें रखता है और सब प्रकारकी आसक्तियोंसे दूर रहता है, वह तीर्थफलका भागी होता है। जो क्रोधी नहीं है, जिसकी बुद्धि निर्मल है, जो सत्य बोलनेवाला और दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाला है, जो सब प्राणियोंके प्रति अपने ही समान बर्ताव करता है, वह तीर्थफलका भागी होता है। जो तीर्थोंका सेवन करनेवाला, धीर, श्रद्धालु और एकाग्रचित्त है, वह पहलेका पापाचारी हो, तो भी शुद्ध हो जाता है। फिर जो पुण्यकर्म करनेवाला है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। तीर्थसेवी मनुष्य कभी पशुयोनिमें जन्म नहीं लेता। कुदेशमें उसका जन्म नहीं होता और वह कभी दुःखका भागी नहीं होता। वह स्वर्ग भोगता और मोक्षका उपाय प्राप्त कर लेता है। अश्रद्धालु, पापात्मा, नास्तिक, संशयात्मा और केवल तर्कका सहारा लेनेवाला—ये पाँच प्रकारके मनुष्य तीर्थसेवनका फल नहीं पाते।

तीर्थयात्राकी इच्छा करनेवाला मनुष्य पहले अपने घरमें उपवास करके श्रीगणेशजीका यथाशक्ति पूजन करे। तत्पश्चात् पितरों, ब्राह्मणों और साधुपुरुषोंकी भी शक्तिके अनुसार पूजा करके व्रतका पारण करे। फिर प्रसन्नतापूर्वक संयम-नियमका पालन करते हुए तीर्थमें जाय। वहाँ पहुँचकर पितरोंका भलीभाँति पूजन करे। ऐसा करनेवाला पुरुष तीर्थके यथार्थ फलका भागी होता है। तीर्थमें ब्राह्मणके पूर्ण गोत्र और विद्याकी परीक्षा नहीं करनी चाहिये। यदि वह अन्नकी इच्छा रखनेवाला हो, तब तो उसे अवश्य भोजन कराना चाहिये। तीर्थोंमें सत्तू, चरु, खीर, पिण्याक (तिलके चूर्ण) और गुड़से पिण्डदान करना चाहिये। तीर्थमें अर्घ्य और आवाहनके बिना श्राद्ध करना चाहिये। श्राद्धके योग्य समय हो अथवा न हो, तीर्थमें पहुँचनेपर श्राद्ध और तर्पण अविलम्ब करना चाहिये। श्राद्धमें किसी प्रकार विघ्न नहीं आने देना चाहिये। अन्य कार्यके प्रसंगसे तीर्थमें जानेपर भी वहाँ अवश्य स्नान करे। ऐसा करनेसे वह स्नानजनित फलको पाता है, तीर्थयात्रासम्बन्धी फलको नहीं। पापचारी मनुष्योंके पापका तीर्थमें स्नान करनेसे नाश होता है। श्रद्धालु मनुष्योंको तीर्थ यथार्थ फल देनेवाला होता है। जो दूसरेके लिये तीर्थयात्रा करता है, वह तीर्थजनित पुण्यके सोलहवें अंशको पाता है। कुशका एक पुतला बनाकर उसे तीर्थके जलमें नहलावे। जिस पुरुषके


* ध्यानपूते ज्ञानजले रागद्वेषमलापहे। यः स्नाति मानसे तीर्थे स याति परमां गतिम्॥ (स्क० पु०, का० पू० ६।