भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 757
७२८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उद्देश्यसे उस पुतलेको नहलाया जाता है, वह तीर्थ-स्नानजनित पुण्यके आठवें अंशको प्राप्त कर लेता है। तीर्थमें जाकर उपवास तथा सिरका मुण्डन कराना चाहिये; क्योंकि मुण्डन करानेसे सिरपर चढ़े हुए पाप दूर हो जाते हैं। जिस दिन तीर्थमें पहुँचना हो उसके पहले दिन उपवास करना चाहिये और तीर्थमें पहुँचनेके दिन पितरोंके लिये श्राद्ध एवं दान करना चाहिये। काशी, कांची, माया (लक्ष्मणझूलेसे कनखलतक), अयोध्या, द्वारका, मथुरा और अवन्ती—ये सात पुरियाँ मोक्ष देनेवाली हैं।* श्रीशैल नामक पर्वतका सम्पूर्ण प्रदेश मोक्ष देनेवाला है। केदारतीर्थका महत्त्व उससे भी अधिक है। श्रीशैल और केदारसे भी उत्तम मोक्षदायक तीर्थ प्रयाग है तथा तीर्थश्रेष्ठ प्रयागसे भी बढ़कर अविमुक्त क्षेत्र है। अविमुक्त क्षेत्र (काशी)-में जैसा मोक्ष प्राप्त होता है, वैसा कहीं नहीं।


## शिवशर्माका सात पुरियोंकी यात्रा करना और हरिद्वारमें उसका परमधाम-गमन

अगस्त्यजी कहते हैं—मथुरामें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे। उनके पुत्रका नाम शिवशर्मा था। शिवशर्मा बड़े तेजस्वी और सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता थे। जब जवानी बीत गयी और कानोंके समीप बाल सफेद हो गये तब बुढ़ापाको आया हुआ देख द्विजश्रेष्ठ शिवशर्माको बड़ी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—‘मेरा सारा समय पढ़ने और धनोपार्जन करनेमें चला गया। मैंने कर्मोंकी जड़ उखाड़नेमें समर्थ भगवान् महेश्वरकी आराधना कभी नहीं की। सम्पूर्ण पापोंका हरण करनेवाले श्रीहरिको भी मैंने कभी सन्तुष्ट नहीं किया। ये वेद, शास्त्र, धन, स्त्री, पुत्र, खेत और महल आदि परलोकमें जाते समय मेरे साथ नहीं जायँगे।’ इस प्रकार विचार करके शिवशर्माने यह निश्चय किया कि जबतक मेरा यह शरीर स्वस्थ है, जबतक मेरी इन्द्रियोंमें विकलता नहीं आयी है, तबतक मैं अपने कल्याणके लिये तीर्थयात्रा करूँगा। यह विचार कर शुभ तिथि, शुभ दिन और शुभ लग्नमें शिवशर्माने एक रात उपवास करके प्रातःकाल पितरोंका श्राद्ध किया और श्रीगणेशजी तथा ब्राह्मणोंको नमस्कार करके व्रतका पारण करनेके पश्चात् तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान किया। मार्गमें ब्राह्मणने सोचा—‘मैं पहले किस तीर्थमें जाऊँ। इस पृथ्वीपर अनेक तीर्थ हैं। आयु क्षणभंगुर है और मन चंचल है। अतः मैं सबसे पहले सप्तपुरियोंकी यात्रा करूँ; क्योंकि वहाँ सभी तीर्थ विद्यमान हैं।’ इस निश्चयके अनुसार वे अयोध्यापुरीमें गये, सरयूमें स्नान किया और वहाँके भिन्न-भिन्न तीर्थोंमें पिण्डदान और तर्पण करके पितरोंको सन्तुष्ट किया। पाँच रात अयोध्यामें निवास करके वे प्रसन्नतापूर्वक तीर्थराज प्रयागको गये, जहाँ श्याम और श्वेत सलिलवाली सरिताओंमें श्रेष्ठ देवदुर्लभ यमुना तथा गंगाजी विराज रही हैं। जिनका शरीर प्रयागतीर्थके जलसे भीगता है, उन यज्ञकर्ताओंका इस संसारमें पुनरागमन नहीं होता। वहाँ शूलटंक महादेवजी निवास करते हैं; वहीं अक्षयवट है, जिसकी जड़ सात पाताललोकोंतक फैली हुई है। प्रलयकालमें उसीपर आरूढ़ होकर मार्कण्डेयजीने निवास किया था। अक्षयवटको वटवृक्षरूपधारी साक्षात् ब्रह्मा जानना चाहिये। उसके समीप ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराकर मनुष्य अक्षय पुण्यका भागी होता है। वहाँ लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु वैकुण्ठधामसे आकर श्रीमाधवस्वरूपसे

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\* काशी काञ्ची च मायाख्या त्वयोध्या द्वारवत्यपि। मधुरावान्तिका चैताः सप्त पुर्योऽत्र मोक्षदाः ॥ (स्क० पु०, का० पू० ६। ६८)