संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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| * काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७२९ |
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| निवास करते हैं और मनुष्योंको अपने परम धाममें पहुँचाते हैं। श्याम और श्वेत जलवाली दो नदियाँ वैदिक मन्त्रोंद्वारा वर्णित हुई हैं। उन सितासित सरिताओं—यमुना और गंगामें गोता लगानेवाले पुरुष अमृतत्वको प्राप्त होते हैं। माघमासमें अरुणोदयके समय प्रयागतीर्थमें स्नान करनेके लिये शिवलोक, ब्रह्मलोक, पार्वतीलोक, कुमारलोक, वैकुण्ठलोक और सत्यलोकसे भी वहाँके निवासी आते हैं। तपोलोक, जनलोक, महर्लोक तथा स्वर्गलोकके निवासी भी आते हैं। भुवर्लोक, भूलोक तथा सम्पूर्ण नागलोकसे भी वहाँके रहनेवाले प्राणी पधारते हैं। हिमवान् आदि श्रेष्ठ पर्वत और कल्पवृक्ष आदि तरुवर भी माघमें प्रयाग-स्नान करनेके लिये आते हैं। प्रयाग निश्चय ही इच्छानुसार फल देनेवाला तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला तीर्थ है। 'ज्ञानी पुरुष भगवान् विष्णुके उस सच्चिदानन्दमय पदको सदा देखते हैं, वेदकी श्रुतियोंद्वारा जिसके विषयमें बारंबार यह बात कही जाती है, वह प्रयागतीर्थ ही है। देवि! तीर्थराज प्रयाग सब तीर्थोंद्वारा सेवित है, उसके गुणोंका वर्णन करनेमें यहाँ कौन समर्थ है। उत्तम बुद्धिवाले शिवशर्मा प्रयागके गुणोंको जानकर माघभर वहीं रहे। उसके बाद वे काशीपुरीमें चले आये। वहाँ प्रवेश करते ही उन्हें पुरीकी द्वारदेहलीपर भगवान् गणेशजीका दर्शन हुआ। शिवशर्माने भक्तिपूर्वक गणेशजीके ऊपर घी मिलाये हुए सिन्दूरका लेप किया और उन्हें पाँच मोदकोंका नैवेद्य लगाकर क्षेत्रके भीतर प्रवेश किया। वहाँ मणिकर्णिकातीर्थमें जाकर उन्होंने देखा कि स्वर्गीय नदी गंगाजी दक्षिणसे उत्तरकी ओर प्रवाहित हो रही हैं। पापहीन पुण्यात्मा मनुष्य उन्हें तटपर घेरे हुए हैं। उत्तरवाहिनी गंगाका दर्शन करके शिवशर्माने वस्त्रसहित निर्मल जलमें गोता लगाया; इससे उनकी बुद्धि तत्काल शुद्ध हो गयी। वे कर्मकाण्डके ज्ञाता थे; अतः | स्नान करके उन्होंने विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों, दिव्य मनुष्यों, दिव्य पितरों, (चतुर्दश यमों) तथा अपने पितरोंका तर्पण किया। फिर शीघ्र ही काशीके पंचतीर्थोंका सेवन करके अपने वैभवके अनुसार भगवान् विश्वनाथका पूजन किया। शिवशर्मा भगवान् शिवकी उस पुरीको बारंबार देखकर बहुत विस्मित हुए और सोचने लगे—इस काशीकी महिमाका वर्णन कोई नहीं कर सकता। काशीमें यह मणिकर्णिका तीर्थ संसारी जीवोंके लिये साक्षात् चिन्तामणिके समान है। यहाँ साधुपुरुषोंके कानोंमें मृत्युके समय भगवान् शिव तारक मन्त्रका उपदेश देते हैं। इसीलिये उसका नाम मणिकर्णिका है। यहाँ निवास करनेवाले जरायुज (मनुष्य आदि), अण्डज (पक्षी आदि), उद्भिज्ज (वृक्ष आदि) और स्वेदज (मक्खी आदि) सभी जीव मोक्षके भागी होते हैं। इस प्रकार विचार करते हुए शिवशर्मा बार-बार उस पवित्र एवं विचित्र क्षेत्रको नेत्रोंसे निहारते रहे; परंतु उन्हें तृप्ति नहीं होती थी। वे मन-ही-मन कहने लगे—'मैं उत्तम मोक्ष प्रदान करनेमें कुशल काशीपुरीको सातों पुरियोंमें श्रेष्ठ समझता हूँ। तथापि काशी और अयोध्याके अतिरिक्त अन्य पुरियोंका मैंने अभीतक दर्शन नहीं किया है; इसलिये उनका भी प्रभाव जानकर मैं पुनः यहाँ आऊँगा।'<br><br>अगस्त्यजी कहते हैं—प्रिये! अनेकानेक शास्त्रीय प्रमाणोंसे उस क्षेत्रके श्रेष्ठ गुणोंको जानकर भी तीर्थयात्रापरायण शिवशर्मा ब्राह्मण काशीपुरीसे बाहर निकले, यह कितने आश्चर्यकी बात है! वे एक देशसे दूसरे देशमें भ्रमण करते हुए महाकालपुरी (उज्जयिनी या अवन्ती)-में पहुँचे, जहाँ कभी कलिकालका प्रभाव नहीं पड़ता। वह पुरी पापसे अवन—रक्षा करती है, इसलिये उसे 'अवन्ती' कहते हैं। कलियुगमें उसका नाम 'उज्जयिनी' होता है। भगवान् शिवका एक ही स्वरूप पातालमें 'हाटकेश्वर', भूतलपर 'महाकाल' तथा स्वर्गलोकमें |