संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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'तारकेश्वर' नामसे तीन रूपोंमें अभिव्यक्त होकर तीनों लोकोंको व्याप्त करके स्थित है। जो 'महाकाल, महाकाल, महाकाल' इस प्रकार सदा स्मरण करता है, उसका स्मरण भगवान् श्रीहरि और महादेवजी निरन्तर करते रहते हैं।
भूतनाथ भगवान् महाकालकी आराधना करके शिवशर्मा कांचीपुरीमें गये, जो तीनों लोकोंसे भी अधिक कमनीय है, जहाँ साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपति निवास करते हैं। कान्तिमान् पुरुषोंसे सेवित कान्तिमती कांचीनगरीका दर्शन कर, वहाँके आवश्यक तीर्थकृत्योंका पालन करके वे द्वारकापुरीकी ओर गये। वहाँ सब ओर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष— इन चतुर्विध पुरुषार्थोंके द्वार हैं; इसीलिये तत्त्वज्ञ विद्वानोंने उसे 'द्वारवती' कहा है। यमराज अपने दूतोंसे कहते हैं—'जिसके ललाटमें गोपीचन्दनका तिलक लगा हो, उसे प्रज्वलित अग्निकी भाँति समझकर प्रयत्नपूर्वक दूरसे ही त्याग देना उचित है। दूतो! जो तुलसीकी मालासे विभूषित, तुलसी नामका जप करनेवाले तथा तुलसीवनके रक्षक हैं, वे दूरसे ही त्याग देने योग्य हैं। द्वारकापुरीमें जो जीव कालसे प्रेरित हो मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे वैकुण्ठधाममें पहुँचकर पीताम्बरधारी तथा चार भुजाओंसे विभूषित होते हैं।' वहाँ जाकर शिवशर्माने उस क्षेत्रके सभी तीर्थोंमें स्नान और देवता, ऋषि, मनुष्य एवं पितरोंका तर्पण किया। वहाँसे वे मायापुरी (कनखलसे हरद्वार, ऋषिकेश होते हुए लक्ष्मणझूला)-में गये, जो पापी मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है और जहाँ वैष्णवी माया अपने मायापाशमें जीवोंको नहीं बाँधती है। कोई उसे 'हरिद्वार', कोई 'मोक्षद्वार', कोई 'गंगाद्वार' तथा कोई 'मायापुरी' कहते हैं। वहाँ पर्वतमालाओंसे बाहर निकली हुई गंगा इस भूतलपर भागीरथीके नामसे विख्यात होती है, जिसके नामोच्चारण करनेमात्रसे मनुष्योंकी पापराशिके सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं। ज्ञानी पुरुष हरिद्वारको वैकुण्ठका एक सोपान कहते हैं। वहाँ स्नान करनेवाले पुरुष भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त होते हैं। उस तीर्थमें उपवास करके उन्होंने प्रातःकाल गंगामें स्नान किया ओर जो-जो तर्पण करने योग्य हैं— उन देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करके ज्यों-ही पारणा करनेका विचार किया, त्यों-ही वे शीतज्वरसे आक्रान्त हो थरथर काँपने लगे। एक तो वे परदेशमें थे, दूसरे अकेले ही वहाँ आये थे, कोई भी सहायक नहीं था। इस दशामें अत्यन्त ज्वरसे पीड़ित होनेपर उनके मनमें बड़ी भारी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—'यह कैसी विपत्ति आ गयी। किंतु अब अत्यन्त सन्ताप देनेवाली व्यर्थकी चिन्ताओंसे क्या लाभ। मैं परम कल्याणकारी भगवान् विष्णु और शिवका चिन्तन करूँ। मैंने मुक्तिके एक उपायका तो भली-भाँति साधन कर लिया। मुक्ति देनेवाली सातों पुरियोंका अपने नेत्रोंसे दर्शन किया है। संग्राममें अथवा तीर्थमें मृत्यु होना श्रेष्ठ है। यह शरीर हाड़ और चामका संग्रह है; इसके द्वारा यहाँ मृत्यु होनेसे मैं निश्चय ही कल्याणमयी मुक्ति प्राप्त करूँगा।'
इस प्रकार चिन्तन करते हुए शिवशर्माको अत्यन्त भयंकर पीड़ा हुई। करोड़ों बिच्छुओंके डंक मारनेसे मनुष्यकी जो दशा हो सकती है, वही शिवशर्माको भी प्राप्त हुई। 'मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ' इसकी सुध न रही। स्मरण करने योग्य सभी बातें भूल गयीं। दो सप्ताह रोगग्रस्त रहकर शिवशर्मा मृत्युको प्राप्त हुए। इतनेमें ही वहाँ वैकुण्ठधामसे विमान आया। उसपर सुन्दर मुख और चार भुजावाले पुण्यशील और सुशील नामक दो पार्षद विराजमान थे। शिवशर्मा ब्राह्मणने उस विमानपर बैठकर चतुर्भुज रूप धारण कर लिया और पीताम्बर एवं दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो आकाश-मार्गकी शोभा बढ़ाते हुए वहाँसे प्रस्थान किया।
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