संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 760, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७३१
शिवशर्मा और विष्णुवार्षदोंका संवाद तथा विभिन्न लोकोंका वर्णन
शिवशर्माने कहा—हे विष्णुवार्षदो! आप दोनों पुण्यात्मा हैं। आप दोनोंके नेत्र कमलदलके समान परम सुन्दर हैं। मैं आपके नामको नहीं जानता, परंतु आकृतिसे कुछ-कुछ समझता हूँ। आप दोनों पुण्यशील और सुशील नामवाले गण हैं, ऐसा मेरा अनुमान है।
दोनों गण बोले—ठीक है, तुमने जैसा कहा है वही हमारा नाम है।
दिव्यरूपधारी ब्राह्मण शिवशर्माने पूछा—यह कौन-सा लोक है?
दोनों गण बोले—यह पिशाचलोक है। इसमें मांसभक्षी जीव निवास करते हैं। जो दान देकर पछताते हैं, नहीं-नहीं करते हुए देते हैं, कभी प्रसंगवश एक बार शिवजीकी पूजा करके सदा प्रायः अपवित्र चित्त ही रहते हैं एवं जिनका पुण्य बहुत थोड़ा और धन-सम्पत्ति भी बहुत थोड़ी है, सखे! वे ही ये पिशाच हैं।
तदनन्तर आगे जानेपर शिवशर्माने देखा, हृष्ट-पुष्ट नर-नारियोंसे भरा हुआ एक सुन्दर लोक है। उसे देखकर उन्होंने पूछा—‘पार्षदो! यह कौन-सा लोक है और किस पुण्यसे यहाँ आना होता है?’
दोनों गण बोले—ब्रह्मन्! यह गुह्यकलोक है। यहाँके निवासी गुह्यक माने गये हैं। जो न्यायपूर्वक धन कमाकर उसे धरतीमें गाड़कर छिपा देते हैं, अपने मार्गपर चलते और धनाढ्य होते हैं, जिनका व्यवहार प्रायः शूद्रोंके समान होता है, जो कुटुम्बके साथ रहकर और आपसमें बाँटकर खाते हैं, जिनमें क्रोध और असूया आदि दोष नहीं होते, वे ही ये गुह्यक हैं। ये सदा सुखमें मग्न होनेके कारण तिथि, वार, संक्रान्ति आदि पर्वका ज्ञान नहीं रखते। केवल एक बात जानते हैं। ये कुलपूज्य पुरोहित ब्राह्मणको गोदान देते और उसकी आज्ञाका पालन करते हैं। उसी पुण्यसे गुह्यकलोग समृद्धिशाली होते और यहाँ देवताओंकी भाँति निर्भय होकर स्वर्गीय सुख भोगते हैं।
तदनन्तर आगेके लोकको देखकर शिवशर्माने पूछा—ये कौन लोग हैं और इस लोकका क्या नाम है?
दोनों गण बोले—यह गन्धर्वलोक है, ये लोग उत्तम व्रतका पालन करनेवाले गन्धर्व हैं। ये देवताओंके गायक हैं। मनुष्योंमें जो स्तुति-पाठ करनेवाले चारण हैं, जो संगीतकी कलाको जानते हैं और अपने अति मनोहर गीतसे राजाओंको सन्तुष्ट करते हैं, वे राजाओंके प्रसादसे प्राप्त हुए उत्तम वस्त्र, धन, द्रव्य और सुगन्धित कर्पूर आदि अनेक पदार्थोंको जब ब्राह्मणोंके लिये दान देते हैं, तब उसी पुण्यसे उनको यह गन्धर्वलोक प्राप्त होता है। यह गुह्यकलोककी अपेक्षा श्रेष्ठ है। तुम्बुरु और नारद—ये दोनों गन्धर्व देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ हैं। नाद साक्षात् भगवान् शिवका स्वरूप है। वे दोनों उस नादतत्त्वके ज्ञाता हैं। यदि किसीने कहीं भगवान् विष्णु और शिवके समीप गीत गाया है, तो उसका फल मोक्ष है अथवा उन दोनोंके सामीप्यकी प्राप्तिको उसका फल बताया गया है। अतः संगीतमालाके द्वारा भगवान् विष्णुकी सदा पूजा करनी चाहिये।
तत्पश्चात् शिवशर्मा क्षणभरमें दूसरे मनोहर लोकमें जा पहुँचे और उन्होंने पूछा—इस नगरका क्या नाम है?’
दोनों गणोंने कहा—यह विद्याधरोंका लोक है। अनेक प्रकारकी विद्याओंमें विशारद ये विद्याधर लोग विद्यार्थियोंको अन्न और ओषधि दान करते रहे हैं। विद्याके गर्वसे रहित हो इन्होंने छात्रोंको नाना प्रकारकी कलाएँ सिखलायी हैं। शिष्यको पुत्रके समान देखा तथा भोजन और वस्त्र आदिसे उसका सत्कार किया है। ये धर्मपूर्वक अपनी सुन्दरी कन्याओंको वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित करके उनका विवाह