संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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करते रहे हैं और प्रतिदिन फलकी इच्छासे इन्होंने इष्टदेवोंकी पूजा की है। उन्हीं पुण्योंसे ये विद्याधरलोग यहाँ निवास करते हैं।
शिवशर्मा और विष्णुगार्षदोंमें इस प्रकार बातचीत हो रही थी कि धर्मराज वहाँ आ पहुँचे और इस प्रकार बोले—शिवशर्मन् ! तुम्हें साधुवाद है। तुमने वह कार्य किया, जो ब्राह्मणकुलके लिये सर्वथा उचित है। पहले वेदोंका अभ्यास किया, गुरुजनोंको अपनी सेवासे सन्तुष्ट किया, धर्मशास्त्र और पुराणोंमें प्रतिपादित धर्मको जाना और उसका आदर किया तथा इस क्षणभंगुर शरीरको मोक्षदायिनी सात पुरियोंके जलसे नहलाया। इसीलिये बुद्धिमान् पुरुष विद्वत्ताका आदर करते हैं; क्योंकि विद्वान् लोग दिनका एक क्षण भी व्यर्थ नहीं बीतने देते। आयु शीघ्र बीत जानेवाली है, लोक शोकमें डूबा हुआ है, अतः श्रेष्ठ धर्मात्मा पुरुषोंको तुम्हारी ही भाँति सदा धर्ममें मन लगाना चाहिये। देखो, यह सत्कर्मोंका ही फल है कि तुम्हारे और मेरे लिये भी वन्दनीय ये भगवान्के पार्षद आज तुम्हारे सखा हो गये हैं। आज मैं धन्य हूँ कि यहाँ मुझे भगवान्के युगल पार्षदोंका दर्शन हुआ।
तत्पश्चात् उन दोनों गणोंके कहनेपर यमराज अपनी पुरीको लौट गये। उसके बाद शिवशर्माने उन दोनों पार्षदोंसे कहा—'ये साक्षात् धर्मराज थे, इनकी आकृति तो बड़ी ही सौम्य है। यह संयमनी पुरी भी अतिशय शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है, जिसका नाम सुनकर भी पापी जीव अत्यन्त भयभीत हो उठते हैं। मर्त्यलोकमें मनुष्य यमराजके स्वरूपका अन्य प्रकारसे वर्णन करते हैं, परंतु मैंने यहाँ इन्हें और ही प्रकारसे देखा है। इसका क्या कारण है, यह आपलोग बतलावें।'
दोनों गण बोले—सौम्य! सुनो, तुम-जैसे पुण्यात्मा पुरुषोंको ही ये अत्यन्त सौम्य दिखायी देते हैं; क्योंकि धर्मराज स्वभावसे ही धर्ममूर्ति हैं। ये ही पापियोंके लिये विकराल स्वरूप धारण कर लेते हैं। इनकी पीली-पीली आँखें क्रोधसे लाल हो उठती हैं, बड़ी-बड़ी दाढ़ोंसे इनका मुख विकराल हो उठता है तथा बिजलीकी-सी लपलपाती हुई जिह्वासे ये और भी भयंकर दिखायी देते हैं। इनके केश ऊपरकी ओर उठे होते हैं, शरीरका रंग अत्यन्त काला हो जाता है और इनकी आवाज प्रलयकालीन मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान होती है। हाथमें कालदण्ड उठाये टेढ़ी भौंहोंसे कुटिल मुख किये यमराज अपने दूतोंको आज्ञा देते हैं—'इस पापात्माको यहाँ लाओ, नीचे गिरा दो, अच्छी तरह बाँध दो और कठोर दण्ड दो। इस दुराचारीके मस्तकपर लोहेके मुद्गरोंसे जोर-जोरसे मारो। दोनों पैर पकड़कर इसे पत्थरकी चट्टानोंपर दे मारो। अपने पैरोंसे इसका गला दबाकर इसकी दोनों आँखें निकाल लो। परायी स्त्रीकी ओर फैलनेवाले इस पापात्माके हाथ काट डालो। परायी स्त्रीके शरीरमें नखक्षत करनेवाले इस दुरात्माके शरीरमें सब ओरसे रोम-रोममें सूई चुभो दो। पर-स्त्रीका मुख चूमने और सूँघनेवाले इस दुष्टके मुँहमें थूक दो। दूसरोंकी निन्दा करनेवाले इस पापीके मुँहमें तीखी कील ठोंक दो। इस कुलकलंकिनी कुलटाको तपाये हुए लोहेके बने उपपतिके शरीरसे सटा दो। जो अजितेन्द्रिय पुरुष अपने ही ग्रहण किये हुए नियमोंका त्याग करता है, उस दुष्टात्माको भ्रमरदंश नामक नरकमें बार-बार गिराओ।' इत्यादि बातें कहते हुए यमराजका शब्द दुराचारी पुरुषोंको दूरसे ही सुनायी देता है। पापात्माओंको यमराज अत्यन्त भयंकर दिखायी देते हैं।
जो राजा इस जगत्में अपने औरस पुत्रोंकी भाँति प्रजाका पालन करते और धर्मके अनुसार दण्ड देते हैं, वे यमराजकी सभाके सदस्य होते हैं। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सदा अपने धर्ममें तत्पर रहते हैं तथा दूसरे भी जो संयमी जीवन व्यतीत करनेवाले हैं, वे सब लोग संयमनीपुरीमें धर्मसभाके सदस्य होकर निवास करते हैं। उशीनर (शिवि), सुधन्वा, वृषपर्वा,