भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 762
  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७३३

जयद्रथ, रजि, सहस्रजित्, कुक्षि, दृढ़धन्वा, रिपुंजय, युवनाश्व, दन्तवक्र, शत्रुओंका भी मंगल चाहनेवाले नाभाग, करन्धम, धर्मसेन, परमर्द तथा परान्तक—ये और दूसरे भी बहुत-से नीतिज्ञ राजा, जो धर्म और अधर्मका विचार करनेमें कुशल हैं, धर्मराजकी सुधर्मा सभामें बैठते हैं।

**यमराज अपने दूतोंसे कहते हैं—**मेरे सेवको! जो मनुष्य गोविन्द, माधव, मुकुन्द, हरे, मुरारे, शम्भु, शिव, ईश, चन्द्रशेखर, शूलपाणि, दामोदर, अच्युत, जनार्दन और वासुदेव इत्यादि नामोंका सदा उच्चारण करते रहते हैं, उनको दूरसे ही त्याग देना। दूतो! जो लोग सदा गंगाधर, अन्धकरिपु, हर, नीलकण्ठ, वैकुण्ठ, कैटभरिपु, कमठ, पद्मपाणि, भूतेश, खण्डपरशु, मृड, चण्डिकेश आदि नामोंका जप करते हैं, वे तुम्हारे लिये सर्वथा त्याज्य हैं। मेरे दूतो! विष्णु, नृसिंह, मधुसूदन, चक्रपाणि, गौरीपति, गिरीश, शंकर, चन्द्रचूड़, नारायण, असुरविनाशन, शार्ङ्गपाणि इत्यादि नामोंका सदा जो लोग कीर्तन करते रहते हैं, उन्हें भी दूरसे ही त्याग देना उचित है*।

**अगस्त्यजी कहते हैं—**प्रिये लोपामुद्रे! इस प्रकार पापरहित मनोरम कथाका श्रवण करते हुए शिवशर्माने प्रसन्नमुख होकर अपने सामने अप्सराओंकी पुरी देखी।


शिवशर्माका सूर्यलोकमें पहुँचकर सूर्यदेवकी महिमा श्रवण करना

**अगस्त्यजी कहते हैं—**तदनन्तर विमानपर बैठे हुए शिवशर्मा सूर्यलोकमें जा पहुँचे। उन्होंने सूर्यदेवको हाथ जोड़कर प्रणाम किया। भगवान् सूर्य अपने भ्रूभंगमात्रसे उनके प्रणामको स्वीकार करके क्षणभरमें आकाशमार्गमें बहुत दूर निकल गये। तब शिवशर्माने भगवत्पार्षदोंसे पूछा—'भगवान् सूर्यका लोक कैसे प्राप्त होता है?'

**भगवान् विष्णुके पार्षदोंने कहा—**ब्रह्मन्! सुनो। जो समस्त प्राणियोंके एकमात्र नियन्ता, परम कारण, नाम और गोत्रसे रहित तथा रूप आदिसे शून्य हैं, जिनकी भौंहोंके विलासमात्रसे जगत्‌की सृष्टि और प्रलय होते हैं, वे सर्वात्मा वेद-पुरुष ऐसा कहते हैं कि जो आदित्य-मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष सूर्यदेव हैं, वही मैं हूँ। जो गायत्रीमन्त्रकी दीक्षा प्राप्त करके तीनों कालमें ठीक समयपर सन्ध्योपासना, सूर्योपस्थान तथा गायत्री-मन्त्रका जप नहीं करता, वह एक सप्ताहमें स्वधर्मसे भ्रष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं। प्रातःकाल सन्ध्योपासना करके गायत्री-मन्त्रका जप करते हुए तबतक खड़ा रहे, जबतक कि सूर्यदेवका आधा उदय न हो जाय। सायंकालमें मौनभावसे आसनपर बैठे हुए ही तबतक जप करता रहे, जबतक ताराओंका उदय न हो जाय। मध्याह्न-सन्ध्यामें सूर्यकी ओर मुख करके जप


* गोविन्द माधव मुकुन्द हरे मुरारे शम्भो शिवेश शशिशेखर शूलपाणे।
दामोदराच्युत जनार्दन वासुदेव त्याज्या भटा य इति सन्ततमामन्ति॥ (स्क० पु०, का० पू० ८।९९)