भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 764
  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७३५

४८ भास्वान्, ४९ पूषा, ५० वृषाकपि, ५१ एक-चक्ररथ, ५२ मित्र, ५३ मन्देहारी, ५४ तमिस्रहा, ५५ दैत्यहा, ५६ पापहर्त्ता, ५७ धर्म, ५८ धर्मप्रकाशक, ५९ हेलिक, ६० चित्रभानु, ६१ कलिघ्न, ६२ तार्क्ष्यवाहन, ६३ दिक्पति, ६४ पद्मिनीनाथ,६५ कुशेशयकर, ६६ हरि, ६७ धर्मरश्मि, ६८ दुर्निरिक्ष्य, ६९ चण्डांशु और ७० कश्यपात्मज *—सूर्यदेवके इन परम पवित्र नामोंके आदिमें प्रणव और अन्तमें 'नमः' शब्द जोड़कर प्रत्येक नामको चतुर्थ्यन्त करके उसका उच्चारण

* इन सत्तर नामोंका संक्षेपसे अर्थ-बोध कराया जाता है—
१. हन्ति गच्छति जानाति सर्वम् इति वा हंसः।
जो सर्वत्र जाता है अथवा सबको जानता है, वह हंस है, इस व्युत्पत्तिके अनुसार सर्वव्यापी सर्वज्ञ परमात्माका नाम ही हंस है। 'हंस' या 'सोऽहम्' यह अजपा-मन्त्र भी है।
२. भातीति भानुः, भाः नुदति प्रेरयति इति वा भानुः।
जो विभासित हो अथवा अपनी प्रभाका प्रसार करे, वह भानु है। ३. सहस्र (असंख्य) किरणोंवाले। ४. तपनेवाले। ५. तपानेवाले। ६. लोकान् अवति रक्षति इति रविः; जो सम्पूर्ण लोकोंका अवन—रक्षण करे, वह रवि है। अवधातुके पूर्वमें 'रुट्' का आगम होता है, जिससे 'रवि' शब्दकी सिद्धि होती है। जैसा कि अन्यत्र बताया गया है—
'अवेति रक्षणे धातुः प्रत्ययेऽस्य रुडागमः।
अवति त्रीनिमाँल्लोकांस्तेनासौ रविरुच्यते॥' ॥ इति॥
७. विश्वकर्माके द्वारा भगवान् सूर्यके तेजका विशेषरूपसे कर्तन—संक्षिप्तीकरण किया गया है, इसलिये उनका नाम विकर्तन है। ८. जिनका वसु अर्थात् तेज सबसे विशिष्ट है, उन्हें विवस्वान् कहते हैं। ९. सम्पूर्ण विश्व जिनका कर्म है अथवा जिनसे सम्पूर्ण विश्वकी कर्ममें प्रवृत्ति होती है, उन भगवान् सूर्यका नाम विश्वकर्मा है। १०. अग्निस্বরূপ होनेसे सूर्यदेवका नाम विभावसु है अथवा जिनके वसु—किरण अनेक प्रकारसे विभासित हैं, वे विभावसु कहलाते हैं। ११. सम्पूर्ण विश्वमें जिनका तेजोमय स्वरूप व्याप्त है अथवा यह विश्व जिनका ही स्वरूप है, वे भगवान् सूर्य विश्वरूप कहे गये हैं। १२. सम्पूर्ण विश्वको उत्पन्न करनेवाले। १३. मृत्तिकामय अर्थात् अचेतन अण्डमें वैराजरूपसे प्रविष्ट होनेके कारण सूर्यदेवका नाम मार्तण्ड हुआ। १४. मिहिं राति गृह्णाति नाशयति इति वा मिहिरः। हिम अथवा कुहरेको ग्रहण करते या नष्ट करते हैं, इसलिये सूर्य मिहिर कहलाते हैं। १५. किरणोंसे युक्त। १६. अदितिके पुत्र। १७ उष्ण (गरम) किरणोंवाले। १८. सूते इति सूर्यः; जो सबका उत्पादन करे, वह सूर्य है। १९. अर्यमा त्रैमूर्तिः; वेदत्रयी जिनका स्वरूप है, वे सूर्यदेव अर्यमा कहलाते हैं। २०. जो सम्पूर्ण जगत्को बढ़ाता है, वह ब्रह्म है। २१. दिनको प्रकट करनेवाले। २२. बारह महीनोंमें बारह स्वरूपोंसे आदित्यमण्डलका संचालन करनेवाले। २३ सात घोड़ोंवाले। २४ प्रभाको फैलानेवाले। २५ दिन प्रकट करनेवाले। २६ आकाशमें चलनेवाले। २७ जगत् सूते इति सूरः; संसारको उत्पन्न करते हैं, इसलिये सूर हैं। २८ प्रभाका विस्तार करनेवाले। २९ कान्तिमान्। ३० सम्पूर्ण जगत्के नेत्रोंमें प्रकाश देनेवाले। ३१ ग्रहोंके स्वामी। ३२ तीनों लोकोंके स्वामी। ३३ अन्तर्यामीरूपसे सम्पूर्ण जगत्के साक्षी। ३४ अन्धकारके शत्रु। ३५ नित्य। ३६ पवित्र। ३७ किरणरूपी हाथोंवाले। ३८ तीक्ष्ण किरणवाले। ३९ संसार-समुद्रसे तारनेवाले नौकारूप। ४० अत्यन्त महान् तेजकी उत्पत्तिके स्थान। ४१ आकाशमें मणिके समान प्रकाशित होनेवाले। ४२ हरे रंगके घोड़ेवाले। ४३ अतिशयेन इयति गच्छति इत्यर्कः; जो अत्यन्त तीव्र वेगसे गमन करे, वह अर्क है। ४४ प्रकाशमान किरणोंवाले। ४५ भयका निवारण करनेवाले। ४६ गायत्री आदि सात छन्द ही सूर्यदेवके सात अश्व हैं, इसलिये उनका नाम छन्दोश्व है। ४७ वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य। ४८ प्रकाशवान्। ४९ वृष्टिः आदि द्वारेण सर्वं जगत् पुष्णाति इति पूषा; वर्षा आदिके द्वारा समस्त जगत्का पोषण करते हैं, इसलिये उनका नाम पूषा है। ५० वर्षति पुण्यफलम् आक्रम्यति पापम् इति वृषाकपिः; पुण्यफलकी वर्षा करते और पापको आक्रमित (नष्ट) करते हैं, इसलिये सूर्यदेव वृषाकपि कहलाते हैं। ५१ सूर्यका रथ एक पहियेवाला है, इसलिये वे एक-चक्ररथ हैं। ५२ स्वभावतः सबके सुहृद् होनेसे उनका नाम मित्र है। ५३ आलस्यके प्रतीक मन्देह नामक राक्षसोंका शत्रु होनेके कारण भगवान् सूर्यको मन्देहारी कहते हैं। ५४ अन्धकारनाशक। ५५ दैत्योंके नाशक। ५६ पापोंका अपहरण करनेवाले। ५७ धारण करनेवाले अथवा धर्मस्वरूप। ५८ धर्मको प्रकाशित करनेवाले। ५९ हे आकाशे लिंकति गच्छति इति हेलिकः; 'ह' अर्थात् आकाशमें गमन करनेवाले होनेके कारण वे हेलिक हैं। ६० चित्र अर्थात् अनेक प्रकारकी किरणोंवाले। ६१ कलिके दोषोंका नाश करनेवाले। ६२ विष्णुरूपसे गरुड़की पीठपर चलनेवाले; अथवा तार्क्ष्य नाम है अरुणका, वह जिनका वाहन अर्थात् सारथि है, वे सूर्यदेव तार्क्ष्यवाहन कहे गये हैं। ६३ दिशाओंके स्वामी। ६४ कमलिनीके स्वामी अथवा उसे विकसित करनेवाले। ६५ हाथमें कमल धारण करनेवाले। ६६ अज्ञान एवं अन्धकारका अपहरण करनेवाले। ६७ उष्ण किरणवाले। ६८ जिनकी ओर देखना कठिन होता है। ६९ प्रचण्ड किरणवाले। ७० कश्यपजीके पुत्र।