भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 765
७३६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करते हुए भगवान् सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये। यथा— 'ॐ हंसाय नमः, ॐ भानवे नमः' इत्यादि। अर्घ्यकी विधि इस प्रकार है— दोनों हाथोंमें निर्मल ताम्रपात्र लेकर उसे जलसे भर ले। उसमें कनेर आदिके पुष्प, रक्त चन्दन, दूर्वादल और अक्षत डाल दे। तत्पश्चात् पृथ्वीपर दोनों घुटने टेककर सूर्यकी ओर देख-देखकर एक-एक नामका पूर्वोक्त रूपसे उच्चारण करते हुए अर्घ्यपात्रको अपने मस्तकके पास लाकर परम पूजनीय सूर्यदेवको ध्यानपूर्वक अर्घ्य दे। सूर्योदय और सूर्यास्तके समय महामन्त्र-रहस्यरूप इन सत्तर नामोंके द्वारा प्रत्येक नाममय मन्त्रके साथ सूर्यदेवको नमस्कार करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य न कभी दरिद्र होता है और न कभी दुःखका ही भागी होता है। वह पूर्वजन्मोपार्जित भयंकर रोगोंसे भी मुक्त हो जाता है और समयपर मृत्युको प्राप्त होकर भगवान् सूर्यके लोकमें प्रतिष्ठित होता है।

इस पुण्यकथाको सुनते हुए शिवशर्माने क्षणभरमें देवराज इन्द्रके लोकमें पहुँचकर उनकी महापुरीका दर्शन किया।


इन्द्रलोक तथा अग्निलोकका वर्णन, विश्वानर मुनिके द्वारा की हुई आराधनासे प्रसन्न होकर शिवजीका उन्हें वरदान देना

शिवशर्माने पूछा—यह उत्तम पुरी किसकी है?

दोनों भगवत्पार्षदोंने कहा—महाभाग! यह देवराज इन्द्रकी पुरी है। विश्वकर्माजीने बड़ी भारी तपस्याके बलसे इस पुरीका निर्माण किया है। इस अमरावतीमें कपड़ा बुननेवाले और आभूषण बनानेवाले नहीं रहते; क्योंकि यहाँ कल्पवृक्ष ही सबको रुचिके अनुसार वस्त्र और आभूषण देता है। यहाँ रसोई बनानेके कार्यमें कुशल रसोइये भी नहीं हैं, एकमात्र कामधेनु ही यहाँ सम्पूर्ण रसोंको प्रस्तुत करती है। यहीं सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र हैं। ये ही स्वर्गलोकके अधिपति हैं। इन्होंने सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया है, इसलिये ये इन्द्रदेव शतमन्यु कहलाते हैं। अग्नि आदि सात लोकपाल इनकी उपासना करते हैं। जो कोई भी जितेन्द्रिय पुरुष पृथ्वीपर निर्विघ्नतापूर्वक सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान पूरा कर लेता है, वह इन्द्रपुरीमें जाकर इन्द्र-पदवीको पाता है। जिन्होंने सौ यज्ञ पूरे नहीं किये हैं, वे यज्ञकर्ता राजा भी इस लोकमें निवास करते हैं। जो ब्राह्मण ज्योतिष्टोम आदि यज्ञोंद्वारा यजन करते हैं, वे भी इस लोकमें निवास करते हैं। जो तुलापुरुषदान आदि सोलह महादानोंका अनुष्ठान करते हैं, वे शुद्ध चित्तवाले पुण्यात्मा पुरुष अमरावतीपुरीको प्राप्त करते हैं। जो संग्राममें कभी पीठ नहीं दिखाते, कायरोंकी-सी बात नहीं करते, धीरतापूर्वक पराक्रम दिखाते हुए वीरशय्यापर वीरगतिको प्राप्त होते हैं, वे राजा भी यहाँ निवास करते हैं। यज्ञविद्यामें कुशल यज्ञकर्ता मनुष्य भी यहाँ निवास करते हैं। इस प्रकार देवराज इन्द्रके नगरकी स्थिति संक्षेपसे बतायी गयी है। अब तुम इस ज्योतिर्मयी अग्निपुरीकी ओर देखो। जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुरुष अग्निदेवके उपासक हैं, वे इस लोकमें निवास करते हैं। अग्निहोत्रपरायण ब्राह्मण, अग्निसेवी ब्रह्मचारी तथा पंचाग्निव्रतका पालन करनेवाले तपस्वी अग्निलोकमें अग्निके समान तेजस्वी होकर रहते हैं। जो सर्दीके समय शीतका कष्ट दूर करनेके लिये सूखे काठ दान करते तथा मन्दाग्नि रोगवाले मनुष्यके जठराग्निकी वृद्धिके लिये वैश्वानर चूर्ण आदि औषध प्रदान करते हैं, वे चिरकालतक अग्निलोकमें निवास करते हैं। जो यज्ञके लिये