संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें$* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७३७$
उपयोगी सामग्री अथवा धन अपनी शक्तिके अनुसार देते हैं, वे अर्चिष्मती पुरीमें स्थान पाते हैं। द्विजातियोंके लिये एकमात्र अग्निदेवता ही परम कल्याणकारी हैं—गुरु, देवता, व्रत और तीर्थ सब अग्नि ही हैं। सभी अपवित्र वस्तुएँ अग्निके संसर्गमें आनेपर क्षणभरमें पवित्र हो जाती हैं, अतएव उनका नाम पावक है। अग्निदेव त्रिभुवनके स्वामी परमेश्वरके नेत्र हैं। जब संसार घोर अन्धकारसे आच्छादित हो जाता है उस समय उनके सिवा दूसरा कौन प्रकाशक होता है।
पूर्वकालकी बात है, नर्मदा नदीके रमणीय तटपर नर्मपुरमें एक विश्वानर नामक मुनि थे, जो भगवान् शिवके भक्त और बड़े पुण्यात्मा थे। एक समय भगवान् शिवका ध्यान करके वे मन-ही-मन विचार करने लगे कि चारों आश्रमोंमें कौन-सा आश्रम सत्पुरुषोंके लिये विशेष कल्याणकारक है, जिसका भलीभाँति पालन करनेपर इहलोक और परलोकमें भी सुख होता है। यह साधन श्रेष्ठ है, यह उससे भी श्रेष्ठ है और यह सुगम है, इस प्रकार सबकी आलोचना करके उन्होंने गृहस्थ-आश्रमकी प्रशंसा की। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी—इन सबका आधार गृहस्थ-आश्रम ही है। देवता, मनुष्य, पितर तथा पशु-पक्षी आदि भी प्रतिदिन गृहस्थसे ही अपनी जीविका चलाते हैं, इसलिये गृहस्थाश्रमी पुरुष ही सर्वश्रेष्ठ है। जो गृहस्थ स्नान, होम अथवा दान किये बिना ही भोजन कर लेता है, वह देवता आदिका ऋणी होकर नरकमें पड़ता है। जो हठसे, लोकभयसे अथवा स्वार्थसे ब्रह्मचर्य-व्रतको धारण करता है, किंतु मन-ही-मन विषयभोगोंका चिन्तन करता रहता है, उसका धारण किया हुआ व्रत भी नहींके समान हो जाता है। परायी स्त्रीका परित्याग करने, अपनी ही स्त्रीसे सन्तुष्ट रहने तथा ऋतुकालके समय पत्नी-समागम करनेवाले गृहस्थको ब्रह्मचारी ही कहा गया है। जिसने राग-द्वेषको त्याग दिया है, जो काम-क्रोधसे दूर रहता है, वह अग्नि और स्त्रीके साथ रहनेवाला गृहस्थ वानप्रस्थसे भी बढ़कर है। जो वैराग्यसे घर छोड़कर निकले, किंतु हृदयमें घरका सदा चिन्तन करता रहे, वह दोनों ओरसे भ्रष्ट होता है। उसको न तो गृहस्थ कहा जा सकता है और न वानप्रस्थ ही। जो गृहस्थ ब्राह्मण बिना माँगे प्राप्त हुई जीविकासे जीवन-निर्वाह करता और जिस किसी वस्तुसे भी सन्तुष्ट रहता है, वह संन्यासीसे भी बढ़कर है। जो संन्यासी जहाँ कहीं भी कोई दुर्लभ वस्तु भी माँग बैठता है और भोजनसे सन्तुष्ट नहीं होता, वह संन्यास-धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है।
इस प्रकार गुण-अवगुणका विचार करके विश्वानर ब्राह्मणने अपने योग्य उत्तम कुलकी कन्याके साथ विधिपूर्वक विवाह किया। वे अग्निसेवामें तत्पर रहते, पंचयज्ञोंका अनुष्ठान करते, सदा यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन और दान-प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें संलग्न रहते तथा देवता, पितर एवं अतिथियोंसे प्रेम रखते थे। मनको संयममें रखनेवाले विश्वानर मुनि धर्म, अर्थ और कामका तदनुकूल समयमें संग्रह करते थे। दोनों दम्पति एक-दूसरेके अनुकूल चलते थे; अतः उनमें परस्पर कोई संकोच नहीं था। वे ब्राह्मण कर्मकाण्डके ज्ञाता थे, अतः पूर्वाह्नकालमें देवयज्ञ, मध्याह्नमें मनुष्ययज्ञ (अतिथि-सेवा) तथा अपराह्नमें पितृयज्ञ करते थे। इस तरह बहुत समय बीत जानेपर उन ब्राह्मणदेवताकी पतिव्रता पत्नी शुचिष्मती एक दिन अपने पतिसे इस प्रकार बोली—'प्राणनाथ! स्त्रियोंके योग्य जितने भोग हैं, वे सब आपके प्रसादसे मेरे द्वारा पूर्णरूपसे भोगे गये हैं। अब आप मुझे भगवान् शंकरके सदृश पुत्र प्रदान करें।'
शुचिष्मतीका यह वचन सुनकर विश्वानर मुनिने क्षणभर समाधि लगाकर मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—'अहो! मेरी इस पत्नीने यह कैसा अत्यन्त दुर्लभ वर माँगा है। परंतु