संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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इसके मुखमें वचनरूपसे स्थित होकर साक्षात् भगवान् शिवने ही यह बात कही है, अतः इसे टालने या बदलनेकी भी सामर्थ्य किसमें है।' यों सोच-विचारकर विश्वानर मुनिने पत्नीसे कहा—'प्रिये! ऐसा ही होगा।' उसे इस प्रकार आश्वासन देकर मुनि तपस्याके लिये चल दिये। उन्होंने काशीमें जाकर मणिकर्णिकाका दर्शन किया और सौ जन्मोंमें उपार्जित त्रिविध पाप-तापोंका परित्याग कर दिया। विश्वेश्वर आदि सम्पूर्ण शिवलिंगोंका दर्शन करके सभी कुण्डों, बावड़ियों, कुओं और तालाबोंमें स्नान किया। सम्पूर्ण गणेश-विग्रहोंको नमस्कार करके समस्त गौरी-विग्रहोंके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् पापोंका भक्षण करनेवाले कालराज भैरवका भलीभाँति पूजन करके आदिकेशव, आदिश्रीविष्णु-विग्रहोंको सन्तुष्ट किया। फिर लोलार्क आदि सूर्य-विग्रहोंको बार-बार नमस्कार करके सब तीर्थोंमें पिण्डदान किया। सहस्रोंकी संख्यामें भोजन कराकर संन्यासियों और ब्राह्मणोंको तृप्त किया।
तदनन्तर वे बार-बार यह सोचने लगे कि कौन-सा शिवलिंग शीघ्र सिद्धि प्रदान करनेवाला है। क्षणभर सोच-विचार करनेके बाद वे इस निर्णयपर पहुँचे कि जहाँ सिद्धिरूपिणी विकटा देवी प्रकट हुई हैं और जहाँ सिद्धिविनायकजी सब विघ्नोंका निवारण करके समस्त सिद्धियाँ प्रदान करते हैं, वह सिद्धिक्षेत्र ही अविमुक्त क्षेत्रमें सबसे प्रधान स्थान है। वहाँ वीरेश्वर नामसे प्रसिद्ध शिवलिंग अत्यन्त गुह्यतम माना गया है। काशीमें ऐसी भूमि नहीं है, जहाँ कोई शिवलिंग न हो। परंतु वीरेश्वरलिंगके समान शीघ्र सिद्धि प्रदान करनेवाला तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष देनेवाला दूसरा लिंग नहीं है। शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ चन्द्रमौलि तथा भरद्वाजजी पूर्वकालमें वीरेश्वरकी आराधना करके उनकी महिमाका गान करते हुए उन्हींमें लीन हो गये। नागराज शंखचूड़ने भी प्रतिदिन रातमें अपने फनोंकी मणियोंसे बार-बार आरती उतारते हुए छः महीनेमें सिद्धि प्राप्त कर ली। यहाँ वसुदत्त और रत्नदत्त नामक वैश्योंने एक वर्षतक श्रीवीरेश्वरकी आराधना करके सत्यवतीके समान पुत्री प्राप्त की थी। अतः मैं भी यहाँ तीनों काल वीरेश्वरकी आराधना करके अपनी स्त्रीकी रुचिके अनुसार शीघ्र ही पुत्र प्राप्त करूँगा।
धीर बुद्धिवाले विप्रवर विश्वानरने ऐसा निश्चय करके चन्द्रकूपके जलसे स्नान किया और व्रतकी दीक्षा ले नियम ग्रहण किया। वे एक मासतक प्रतिदिन केवल एक बार भोजन करके रहे। फिर दूसरे मासमें दिनभर उपवास करके केवल रातमें ही भोजन करते रहे। फिर एक मासतक बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, उसीपर निर्वाह करते रहे। उसके बाद पूरे एक मासतक उन्होंने अखण्ड उपवास किया। तदनन्तर, एक मासतक दूध पीकर, एक मासतक साग और फल खाकर, एक महीनेतक मुट्ठीभर तिल चबाकर और एक महीनेतक केवल जल पीकर जीवन-निर्वाह किया। तत्पश्चात् एक मासतक वे केवल पंचगव्य पीकर रहे, एक मासतक चान्द्रायण व्रतमें लगे रहे, एक मासतक कुशाके अग्रभागपर जितना जल आता है, उतना ही पीकर तप करते रहे और एक मासतक उन्होंने केवल वायुका आहार किया। इसके बाद तेरहवें मासमें गंगाजीके जलमें स्नान करके वे प्रातःकाल ज्यों ही भगवान् वीरेश्वरके समीप गये, त्यों ही उस लिंगके मध्यभागमें उन्हें एक विभूति-भूषित अष्टवर्षीय सुन्दर बालक दिखायी दिया। उसके नेत्र कानोंके समीपतक फैले हुए थे। ओठ बहुत ही लाल थे। मस्तकपर पीले रंगकी जटाका मनोहर मुकुट शोभा पा रहा था। वह बालक नंगा था और उसके मुखपर हास्यकी छटा छा रही थी। उसने बालकोचित वेष-भूषा धारण कर रखी थी। वह मनोहर बालक वैदिक सूक्तोंका पाठ करता और खेल-खेलमें ही हँसता था।