भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 768
* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *७३९

उसे देखकर विश्वानरके शरीरमें आनन्दातिरेकसे रोमांच हो आया और वे गद्गदकण्ठसे बोल उठे—'नमस्कार है, नमस्कार है।' तत्पश्चात् उन्होंने इस प्रकार स्तवन किया—'यहाँ सब कुछ एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म ही है। यह बात सत्य है, सत्य है। इस विश्वमें भेद या नानात्व कुछ भी नहीं है। इसलिये एक अद्वितीयरूप आप महेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। शम्भो! आप रूपरहित अथवा एकरूप होकर भी जगत्‌के नाना स्वरूपोंमें अनेककी भाँति प्रतीत होते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे जलके भिन्न-भिन्न पात्रोंमें एक ही सूर्य अनेकवत् दृष्टिगोचर होता है। अतः आपके सिवा और किसी स्वामीकी मैं शरण नहीं लेता। जैसे रज्जुका ज्ञान हो जानेपर सर्पका भ्रम मिट जाता है, सीपीका बोध होते ही चाँदीकी प्रतीति नष्ट हो जाती है तथा मृगमरीचिकाका निश्चय होनेपर उसमें प्रतीत होनेवाला जलप्रवाह असत्य सिद्ध हो जाता है, उसी प्रकार जिनका ज्ञान होनेपर सब ओर प्रतीत होनेवाला यह सम्पूर्ण प्रपंच उन्हींमें विलीन हो जाता है, उन महेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। शम्भो! जैसे जलमें शीतलता, अग्निमें दाहकता, सूर्यमें ताप, चन्द्रमामें आह्लाद, पुष्पमें सुगन्ध तथा दूधमें घी स्थित है, उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्वमें आप व्याप्त हैं, इसलिये मैं आपकी ही शरण लेता हूँ। आप बिना कानके ही शब्दको सुनते हैं, नासिकाके बिना ही सूँघते हैं, पैरोंके बिना ही दूरसे चले आते हैं, नेत्रोंके बिना ही देखते और रसनाके बिना ही रसका अनुभव करते हैं, आपको यथार्थरूपसे कौन जानता है? अतः मैं आपकी ही शरण लेता हूँ। ईश! वेद भी आपके साक्षात् स्वरूपको नहीं जानता, बड़े-बड़े योगीश्वर तथा इन्द्र आदि देवता भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते, परंतु आपका भक्त आपकी ही कृपासे आपको जानता है, अतः मैं आपकी ही शरण लेता हूँ। आप ही वृद्ध हैं, आप ही तरुण हैं और आप ही बालक हैं। कौन-सा ऐसा तत्त्व है, जो आप नहीं हैं, सब कुछ आप ही हैं, अतः मैं आपके चरणोंमें मस्तक नवाता हूँ।'

इस प्रकार स्तुति करके विप्रवर विश्वानर अतिशय आनन्दमग्न हो दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़ गये। इतनेमें ही बालकरूपधारी शिव बोल उठे—'भूदेव! तुम कोई वर माँगो। तुमने अपनी धर्मपत्नी शुचिष्मतीके विषयमें अपने मनमें जो अभिलाषा की है, वह थोड़े ही समयमें पूर्ण होगी। महामते! मैं स्वयं ही शुचिष्मतीके गर्भमें आकर तुम्हारा पुत्र होऊँगा। उस समय सब देवताओंका परम प्रिय मैं गृहपति (अग्नि)-के नामसे विख्यात होऊँगा। तुमने जो इस अभिलाषाष्टक नामक पवित्र स्तोत्रका पाठ किया है, इस स्तोत्रको तीनों समय मेरे समीप यदि पढ़ा जाय तो यह सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला होगा। इस स्तोत्रका पाठ पुत्र, पौत्र और धन देनेवाला होगा, सब प्रकारकी शान्ति करनेवाला और सम्पूर्ण आपत्तियोंका नाशक होगा। इतना ही नहीं, यह स्वर्ग, मोक्ष तथा सम्पत्ति देनेवाला भी होगा। एक वर्षतक पाठ करनेपर यह स्तोत्र पुत्रदान करनेवाला होगा, इसमें संशय नहीं है।' ऐसा कहकर बालरूपधारी महादेवजी अन्तर्धान हो गये और विप्रवर विश्वानर भी अपने घर लौट गये।


## विश्वानरके पुत्र गृहपतिका भगवान् शिवकी आराधनासे अग्नि एवं दिक्पालका पद प्राप्त करना

**अगस्त्यजी कहते हैं—**तदनन्तर विश्वानरद्वारा विधिपूर्वक गर्भाधान-संस्कार सम्पन्न होनेपर उनकी स्त्री शुचिष्मती गर्भवती हुई। तत्पश्चात् विद्वान् विश्वानरने गृह्यसूत्रोक्त विधिसे बालककी पुरुषोचित शक्ति बढ़ानेके उद्देश्यसे गर्भिणीका पुंसवन-संस्कार किया। यह संस्कार गर्भस्थ बालकके