भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 800, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 800
  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७७१ तथा मनोवांछित वर देनेवाली हैं, आपको बारंबार | कल्याणमयी गंगे! आदि, मध्य और अन्तमें नमस्कार है। आप प्रलयकालमें उग्ररूपा हैं, अन्य | सर्वत्र आप हैं। गंगे! आप ही मूल-प्रकृति हैं, समयमें सदा सुखका भोग करानेवाली हैं तथा | आप ही परम पुरुष हैं तथा आप ही परमात्मा उत्तम जीवन प्रदान करनेवाली हैं, आपको | शिव हैं; शिवे! आपको नमस्कार है*। जो नमस्कार है। आप ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मज्ञान देनेवाली | श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्रको पढ़ता और सुनता है, तथा पापोंका नाश करनेवाली हैं, आपको बार- | वह मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले पूर्वोक्त बार नमस्कार है। प्रणतजनोंकी पीड़ाका नाश | दस प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है। यह करनेवाली जगन्माता आपको नमस्कार है। आप | स्तोत्र जिसके घरमें लिखकर रखा हुआ हो, समस्त विपत्तियोंकी शत्रुभूता तथा सबके लिये | उसे कभी अग्नि, चोर और सर्प आदिका भय मंगलस्वरूपा हैं, आपके लिये बार-बार नमस्कार | नहीं होता। ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षमें हस्त है। शरणागतों, दीनों तथा पीड़ितोंकी रक्षामें | नक्षत्रसहित दशमी तिथिका यदि बुधवारसे योग संलग्न रहनेवाली और सबकी पीड़ा दूर करनेवाली | हो, तो उस दिन गंगाजीके जलमें खड़ा होकर देवि नारायणि ! आपको नमस्कार है। आप पाप- | जो दस बार इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह ताप अथवा अविद्यारूपी मलसे निर्लिप्त, दुर्गम | दरिद्र हो या असमर्थ, वह भी उसी फलको दुःखका नाश करनेवाली तथा दक्ष हैं, आपको | प्राप्त होता है, जो पूर्वोक्त विधिसे यत्नपूर्वक बारंबार नमस्कार है। आप पर और अपर सबसे | गंगाजीकी पूजा करनेपर उपलब्ध होनेवाला परे हैं। मोक्षदायिनी गंगे! आपको नमस्कार है। | बताया गया है। विष्णो ! जैसे मैं हूँ, वैसे तुम गंगे ! आप मेरे आगे हों, गंगे! आप मेरे पीछे | हो, जैसे तुम हो, वैसी उमादेवी हैं और जैसी रहें, गंगे! आप मेरे उभयपार्श्वमें स्थित हों तथा | उमादेवी हैं, वैसी गंगा हैं। इन चारों रूपोंमें गंगे! मेरी आपमें ही स्थिति हो । आकाशगामिनी | भेद नहीं है।
* ॐ नमः शिवायै गङ्गायै शिवदायै नमो नमः । नमस्ते विष्णुरूपिण्यै ब्रह्ममूर्त्यै नमोऽस्तु ते ॥
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै शाङ्कर्यै ते नमो नमः । सर्वदेवस्वरूपिण्यै नमो भेषजमूर्तये ॥
सर्वस्य सर्वव्याधीनां भिषक्रेष्ठ्यै नमोऽस्तु ते । स्थास्नुजङ्गमसम्भूतविषहन्त्र्यै नमोऽस्तु ते ॥
संसारविषनाशिन्यै जीवनायै नमोऽस्तु ते । तापत्रितयसंहन्त्र्यै प्राणेश्यै ते नमो नमः ॥
शान्तिसन्तानकारिण्यै नमस्ते शुद्धमूर्तये । सर्वसंशुद्धिकारिण्यै नमः पापारिमूर्तये ॥
भुक्तिमुक्तिप्रदायिन्यै भद्रदायै नमो नमः । भोगोपभोगदायिन्यै भोगवत्यै नमोऽस्तु ते ॥
मन्दाकिन्यै नमस्तेऽस्तु स्वर्गदायै नमो नमः । नमस्त्रैलोक्यभूषायै त्रिपथायै नमो नमः ॥
नमस्त्रिशुक्लसंस्थायै क्षमावत्यै नमो नमः । त्रिहुताशनसंस्थायै तेजोवत्यै नमो नमः ॥
नन्दायै लिङ्गधारिण्यै सुधाधारात्मने नमः । नमस्ते विश्वमुख्यायै रेवत्यै ते नमो नमः ॥
बृहत्यै ते नमस्तेऽस्तु लोकधात्र्यै नमोऽस्तु ते । नमस्ते विश्वमित्रायै नन्दिन्यै ते नमो नमः ॥
पृथ्व्यै शिवामृतायै च सुवृषायै नमो नमः । परापरशताढ्यायै तारायै ते नमो नमः ॥
पाशजालनिकृन्तिन्यै अभिन्नायै नमोऽस्तु ते । शान्तायै च वरिष्ठायै वरदायै नमो नमः ॥
उग्रायै सुखजग्ध्व्यै च सञ्जीवन्यै नमोऽस्तु ते । ब्रह्मिष्ठायै ब्रह्मदायै दुरितघ्न्यै नमो नमः ॥
प्रणतार्तिप्रभञ्जिन्यै जगन्मात्रे नमोऽस्तु ते । सर्वापत्तिप्रशमयै मङ्गलायै नमो नमः ॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
निर्लेपायै दुर्गहन्त्र्यै दक्षायै ते नमो नमः । परापरपरायै च गङ्गे निर्वाणदायिनि ॥
गङ्गे ममाग्रतो भूया गङ्गे मे तिष्ठ पृष्ठतः । गङ्गे मे पार्श्वयोरेधि गङ्गे त्वय्यस्तु मे स्थितिः ॥
आदौ त्वमन्ते मध्ये च सर्वं त्वं गाङ्गते शिवे ।
त्वमेव मूलप्रकृतिस्त्वं पुमान् पर एव हि । गङ्गे त्वं परमात्मा च शिवस्तुभ्यं नमः शिवे ॥
(स्क० पु०, का० पू० २७ । १५७-१७४)
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