संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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गंगाजीकी महिमा
भगवान् शिव कहते हैं—जो तीनों लोकोंमें प्रवाहित होनेवाली गंगाजीके तटपर जाकर एक बार भी पिण्डदान करता है, वह तिलमिश्रित जलके द्वारा अपने पितरोंका भवसागरसे उद्धार कर देता है। सम्पूर्ण देवता और पितर गंगाजीमें सदा वर्तमान रहते हैं इसलिये वहाँ उनका आवाहन और विसर्जन नहीं होता। पिताके कुलमें अथवा माताके कुलमें तथा गुरु, श्वशुर और भाई-बन्धुओंके कुलमें जो अपने सम्बन्धी मरे हों; अथवा जो अन्य बन्धु-बान्धव मृत्युको प्राप्त हुए हों; जो दाँत निकलनेके पहले अथवा गर्भमें ही पीड़ित होकर मरे हों; जो अग्नि, बिजली और चोरके द्वारा मरे हों; जो व्याघ्र अथवा अन्य दाढ़ोंवाले हिंसक जीवोंसे मारे गये हों; जो फाँसी लगाकर या ऊपरसे नीचे गिरकर मरे हों; जिन्होंने आत्मघात किया हो अथवा जो अपना शरीर बेचनेवाले, चोर, यज्ञके अनधिकारियोंसे यज्ञ करानेवाले, रस-विक्रयी, पापरोगी, घरोंमें आग लगानेवाले, जहर देनेवाले अथवा गोहत्यारे रहे हों और अपने कुलमें ही उनका जन्म हुआ रहा हो; उनको भी यदि एक बार मनुष्य विधिपूर्वक गंगाजलसे तर्पण करे तो वे भी स्वर्गलोकमें पहुँच जाते हैं और यदि पहलेसे स्वर्गमें हों तो मोक्षको प्राप्त होते हैं। तीनों लोकोंमें जो कोई भी मनोवांछित फल देनेवाले हैं, वे सब काशीमें उत्तरवाहिनी गंगाका सेवन करते हैं। केवल गंगा भी मुक्ति देनेमें समर्थ हैं, ऐसा निर्णय हो चुका है। किंतु अविमुक्त क्षेत्रमें मेरे निवासस्थानके गौरवसे वे विशेषरूपसे मुक्तिदायिनी होती हैं। पापोंसे चंचल चित्तवाले तथा संसाररूपी रोगसे ग्रस्त रहनेवाले मन्दबुद्धि मनुष्योंके लिये गंगाजी ही सर्वश्रेष्ठ हैं। जो गंगाजीके तटपर टूटे-फूटे घाटोंका संस्कार करते हैं अथवा वहाँके गिरे-पड़े देवमन्दिरोंका जीर्णोद्धार करते हैं, वे मेरे लोकमें चिरकालतक अक्षय सुख भोगते हैं। मनुष्योंकी हड्डी जबतक गंगाजीके जलमें स्थित रहती है, उतने हजार वर्षोंतक वे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं।
स्कन्दजी कहते हैं—मुनिवर अगस्त्य! वस्तुशक्तिका यह विचार अद्भुत एवं अनिर्वचनीय है। गंगाजी द्रवके रूपमें भगवान् सदाशिवकी कोई परा शक्ति हैं। करुणारूपी अमृतरससे भरे हुए देवाधिदेव भगवान् शंकरने समस्त संसारका उद्धार करनेके लिये ही गंगाजीको प्रवृत्त किया है। मुने! गंगाधर शिवने दयावश श्रुतियोंके अक्षरोंको निचोड़कर उस ब्रह्मद्रवसे ही गंगाका निर्माण किया है। जो गंगाजीके तटकी मिट्टीको अपने मस्तकपर लगाता है उसका अज्ञानान्धकार नष्ट हो जाता है। गंगा अपने नामका कीर्तन करनेसे पुण्यकी वृद्धि और पापका नाश करती है। दर्शन, स्पर्श, जलपान तथा उसमें स्नान करनेसे क्रमशः दसगुना फल होता है, ऐसा जानना चाहिये। ऋषियोंद्वारा सेवित, भगवान् विष्णुके चरणोंसे उत्पन्न, अति प्राचीन तथा परम पुण्यमयी धारासे युक्त भगवती गंगाकी जो लोग मनसे शरण लेते हैं वे ब्रह्मधामको प्राप्त होते हैं। जो माताकी भाँति इस संसारके जीवोंको पुत्र मानकर सदा उन्हें स्वर्गलोकको पहुँचाती है और सम्पूर्ण उत्तम गुणोंसे सम्पन्न है, उत्तम ब्रह्मलोककी इच्छा रखनेवाले जितेन्द्रिय पुरुषोंको सदा ही उस गंगाकी उपासना करनी चाहिये। जैसे ब्रह्मलोक सब लोकोंमें उत्तम है, उसी प्रकार गंगा समस्त सरिताओं और सरोवरोंसे श्रेष्ठ है। गंगाके जलमें स्नान करनेवाले पुरुषका समस्त पातक तत्काल नष्ट हो जाता है और उसे उसी क्षण महान् श्रेयकी प्राप्ति हो जाती है। गंगामें पुत्र-पौत्र आदि यदि अपने पितरोंके लिये श्रद्धापूर्वक जल देते हैं तो उस जलसे वे पितर तीन वर्षोंतक पूर्णतया तृप्त रहते हैं।
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