संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 802, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७७३ ---|---
गंगासहस्रनामस्तोत्र^१
अगस्त्यजी बोले—गंगामें स्नान किये बिना मनुष्योंका जन्म व्यर्थ ही बीतता है। क्या कोई दूसरा उपाय भी है, जिससे गंगास्नानका फल प्राप्त हो सके ?
स्कन्दने कहा—अगस्त्यजी ! जान पड़ता है, यही सोचकर देवाधिदेव भगवान् शंकरने अपने मस्तकपर गंगाजीको धारण कर रखा है। एक परम गोपनीय उपाय है, जिससे देवनदी गंगामें स्नान करनेका पूरा फल प्राप्त होता है। वह उपाय उसीको बतलाना चाहिये, जो भगवान् शिव और विष्णुका भक्त, शान्त, श्रद्धालु, आस्तिक तथा गर्भवाससे छूटनेकी इच्छा रखनेवाला हो। दूसरे किसीके सामने कहीं भी उसकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। वह परम रहस्यमय साधन महापातकोंका नाश करनेवाला है। वह उपाय है— भगवती गंगाका सहस्रनामस्तोत्र। वह सम्पूर्ण उत्तम स्तोत्रोंमें श्रेष्ठ है, जपनेयोग्य मन्त्रोंमें सर्वोत्तम है और वेदोंके उपनिषद्-भागके समान मनन करनेयोग्य है। साधकको मौन होकर प्रयत्नपूर्वक इसका जप करना चाहिये। यदि पवित्र स्थान हो तो वहाँ स्वयं भी पवित्रभावसे बैठकर सुस्पष्ट अक्षरोंमें इसका पाठ करना चाहिये।
स्कन्दजी कहते हैं— ॐ नमो गङ्गादेव्यै।
१ ॐकाररूपिणी—प्रणवरूपा, सच्चिदानन्दस्वरूपा अथवा ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूपिणी, २ अजरा—वृद्धावस्थासे रहित, ३ अतुला—तुलनारहित, ४ अनन्ता—जिसका कभी कहीं भी अन्त न हो, ऐसी, ५ अमृतस्रवा—अमृतमय जलका स्रोत बहानेवाली, ६ अत्युदारा—अतिशय उदार, किसीको भी शरणमें लेने अथवा सद्गति देनेमें संकोच न करनेवाली, ७ अभया—भयरहित, जिसका आश्रय लेनेसे संसार-भयका निवारण हो जाता है, ऐसी, ८ अशोका—शोकसे रहित अथवा जिससे शोकका निवारण होता है, ऐसी, ९ अलकनन्दा—अलकावासियोंको आनन्द देनेवाली अथवा केशोंमें जिसके जलका स्पर्श होनेसे आनन्द प्राप्त होता है, ऐसी, १० अमृता—सुधारूपिणी अथवा मुक्ति देनेके कारण अमृतस्वरूपा, ११ अमला—निर्मल जलवाली अथवा संसाररूपी मलका निवारण करनेवाली।^२
१२ अनाथवत्सला—अनाथोंपर दया करनेवाली, १३ अमोघा—जिनकी सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती, ऐसी, १४ अपांयोनिः—जलकी उत्पत्तिका स्थान, १५ अमृतप्रदा—मोक्ष प्रदान करनेवाली, १६ अव्यक्तलक्षणा—अव्यक्तब्रह्मस्वरूपा अथवा अव्याकृत प्रकृतिरूपा, १७ अक्षोभ्या—किसीके द्वारा भी क्षुब्ध न की जा सकनेवाली, १८ अनवच्छिन्ना—अपने दिव्य एवं व्यापक स्वरूपके कारण त्रिविध परिच्छेदसे शून्य, १९ अपरा—जिसके लिये कोई भी पराया नहीं है अथवा जिससे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है, ऐसी, २० अजिता—किसीसे भी परास्त न होनेवाली।^३
२१ अनाथनाथा—अनाथोंको भी शरण देनेवाली, २२ अभीष्टार्थसिद्धिदा—भक्तजनोंके अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करनेवाली, २३ अनङ्गवर्द्धिनी—कामनाकी पूर्ति या मनोवांछित भोगोंकी वृद्धि करनेवाली अथवा कामभावका नाश या निराकार ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाली, २४ अणिमादि-गुणा—अणिमा आदि आठ प्रकारके ऐश्वर्य प्रदान करना जिसका स्वाभाविक गुण है, ऐसी, २५ आधारा—'अ' अर्थात् विष्णु आधार हैं जिसके, ऐसी, २६ अग्रगण्या—श्रेष्ठता और पवित्रतामें सबसे प्रथम गणना करने योग्य, २७ अलीकहारिणी—अलीक अर्थात् अज्ञानका हरण करनेवाली।^४
२८ अचिन्त्यशक्तिः—जिनकी शक्ति चिन्तनका
१. स्कन्दपुराण, काशीखण्ड पूर्वार्ध, अध्याय २९, श्लोक १७ से ६८ तक।
२. ॐकाररूपिण्यजरातुलानन्तामृतस्रवा । अत्युदाराभयाशोकालकनन्दामृतामला ॥
३. अनाथवत्सलामोघापांयोनिरमृतप्रदा । अव्यक्तलक्षणाक्षोभ्यानवच्छिन्नापराजिता ॥
४. अनाथनाथाभीष्टार्थसिद्धिदानङ्गवर्द्धिनी । अणिमादिगुणाऽऽधाराग्रगण्यालीकहारिणी ॥