भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७८५ ---|---

५३५ नियता—नियमपूर्वक रहनेवाली अथवा एकरूपा, ५३६ नित्यसुखदा—सदा सुख देनेवाली, ५३७ नानाश्चर्यमहानिधिः—अनेक प्रकारके आश्चर्योंका भण्डार। १

५३८ नदी—अव्यक्त शब्द करनेवाली सरिता, ५३९ नदसरोमाता—नदों और सरोवरोंकी जननी, ५४० नायिका—जीवोंको संसार-समुद्रसे पार ले जानेवाली अथवा सब नदियोंकी स्वामिनी, ५४१ नाकदीर्घिका—स्वर्गलोककी बावली, ५४२ नष्टोद्धरणधीरा—संसार-सागरमें गिरकर नष्ट होनेवाले जीवोंका उद्धार करनेमें दक्ष, ५४३ नन्दना—समृद्धि देनेवाली, ५४४ नन्ददायिनी—आनन्द देनेवाली। २

५४५ निर्णिन्क्ताशेषभुवना—समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली, ५४६ निःसङ्गा—आसक्तिरहित, ५४७ निरुपद्रवा—विघ्नरहित, ५४८ निरालम्बा—आधाररहित, अपनी ही महिमामें प्रतिष्ठित, ५४९ निष्प्रपञ्चा—प्रपंचसे परे स्थित, ५५० निर्णाशितमहामला—अज्ञानरूपी महामलका पूर्णतया नाश करनेवाली। ३

५५१ निर्मलज्ञानजननी—विशुद्ध ज्ञानको प्रकट करनेवाली, ५५२ निःशेषप्राणितापहृत्—समस्त प्राणियोंका सन्ताप हर लेनेवाली, ५५३ नित्योत्सवा—नित्य उत्सवयुक्त, ५५४ नित्यतृप्ता—अपने स्वरूपभूत आनन्दसे सदा सन्तुष्ट, ५५५ नमस्कार्या—नमस्कार करनेयोग्य, ५५६ निरञ्जना—अज्ञानरहित। ४

५५७ निष्ठावती—श्रद्धा एवं नियम-निष्ठासे युक्त, ५५८ निरातङ्का—भयरहित, ५५९ निर्लेपा—पाप आदिसे अलिप्त, शुद्धस्वरूपा, ५६० निश्चलात्मिका—स्थिर बुद्धिवाली, ५६१ निरवद्या—निर्दोष, ५६२ निरीहा—चेष्टारहित, ५६३ नीललोहित-मूर्द्धगा—भगवान् शिवके मस्तकपर विराजमान। ५

५६४ नन्दिभृङ्गिगणस्तुत्या—नन्दी, भृंगी आदि शिवगणोंसे स्तुति की जाने योग्य, ५६५ नागा—नागस्वरूपा, ५६६ नन्दा—समृद्धिदायिनी, ५६७ नगात्मजा—गिरिराज हिमवान्‌की पुत्री, ५६८ निष्प्रत्यूहा—विघ्न-बाधाओंसे रहित, ५६९ नाकनदी—स्वर्गलोककी नदी, ५७० निर्याणव-दीर्घनौः—नरक-समुद्रसे पार होनेके लिये विशाल नौकास्वरूप। ६

५७१ पुण्यप्रदा—पुण्य देनेवाली, ५७२ पुण्य-गर्भा—अपने भीतर पुण्य धारण करनेवाली, ५७३ पुण्या—पुण्यस्वरूपा, ५७४ पुण्यतरङ्गिणी—पवित्र लहरोंवाली, ५७५ पृथुः—विशाल एवं परिपूर्ण, ५७६ पृथुफला—महान् फलवाली, ५७७ पूर्णा—सर्वत्र व्यापक, अविच्छिन्न धारासे युक्त, ५७८ प्रणतार्तिप्रभञ्जनी—शरणागतोंकी पीड़ाका नाश करनेवाली। ७

५७९ प्राणदा—प्राणदान करनेवाली, ५८० प्राणि-जननी—जीवोंको जन्म देनेवाली, ५८१ प्राणेशी—प्राणोंकी अधीश्वरी, ५८२ प्राणरूपिणी—प्राणस्वरूपा, ५८३ पद्मालया—कमलोंमें वास करनेवाली लक्ष्मीस्वरूपा, ५८४ पराशक्तिः—सर्वोत्कृष्ट शक्ति, ५८५ पुरजित्परमप्रिया—त्रिपुरारि शिवकी अतिशय वल्लभा। ८

५८६ परा—सर्वश्रेष्ठ, ५८७ परफलप्राप्तिः—


१. निर्मला निर्मलाख्याना नाशिनी तापसम्पदाम् । नियता नित्यसुखदा नानाश्चर्यमहानिधिः ॥
२. नदी नदसरोमाता नायिका नाकदीर्घिका । नष्टोद्धरणधीरा च नन्दना नन्ददायिनी ॥
३. निर्णिंक्ताशेषभुवना निःसङ्गा निरुपद्रवा । निरालम्बा निष्प्रपञ्चा निर्णाशितमहामला ॥
४. निर्मलज्ञानजननी निःशेषप्राणितापहृत् । नित्योत्सवा नित्यतृप्ता नमस्कार्या निरञ्जना ॥
५. निष्ठावती निरातङ्का निर्लेपा निश्चलात्मिका । निरवद्या निरीहा च नीललोहितमूर्द्धगा ॥
६. नन्दिभृङ्गिगणस्तुत्या नागा नन्दा नगात्मजा । निष्प्रत्यूहा नाकनदी निर्याणवदीर्घनौः ॥
७. पुण्यप्रदा पुण्यगर्भा पुण्या पुण्यतरङ्गिणी । पृथुः पृथुफला पूर्णा प्रणतार्तिप्रभञ्जनी ॥
८. प्राणदा प्राणिजननी प्राणेशी प्राणरूपिणी । पद्मालया पराशक्तिः पुरजित्परमप्रिया ॥