संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७८७ ---|---
६३६ फालितैनोमहाक्षेत्रा—पापोंके महाक्षेत्रको नष्ट करनेवाली, ६३७ फणिलोकविभूषणम्—भोगवती गंगाके रूपमें नागलोकको विभूषित करनेवाली, ६३८ फेनच्छलप्रणुन्नैनाः—फेन छाँटनेके व्याजसे पापराशिको नाश करनेवाली, ६३९ फुल्लकैरवगन्धिनी—खिले हुए कुमुदपुष्पोंकी गन्धसे युक्त।^१
६४० फेनिलाच्छाम्बुधाराभा—फेनयुक्त स्वच्छ जलकी धारासे उद्भासित होनेवाली, ६४१ फुडुच्चाटितपातका—'फुद्' इस शब्दके साथ पातकोंको उखाड़ फेंकनेवाली, ६४२ फाणितस्वादुसलिला—सीराके समान स्वादिष्ट जलवाली, ६४३ फाण्टपथ्यजलाविला—मट्ठाके समान पथ्य (हितकर) जलसे भरी हुई।^२
६४४ विश्वमाता—समस्त संसारकी माता, ६४५ विश्वेशी—जगदीश्वरी, ६४६ विश्वा—सर्वस्वरूपा, ६४७ विश्वेश्वरप्रिया—विश्वनाथवल्लभा, ६४८ ब्रह्मण्या—ब्राह्मणहितकारिणी, ६४९ ब्रह्मकृत्—ब्रह्मा आदि देवताओंको उत्पन्न करनेवाली जगदीश्वरी, ६५० ब्राह्मी—ब्रह्मशक्ति, ६५१ ब्रह्मिष्ठा—ब्रह्मनिष्ठ, ६५२ विमलोदका—निर्मल जलवाली।^३
६५३ विभावरी—रात्रिस্বরূপा, ६५४ विरजा—रजोगुणरहिता, ६५५ विक्रान्तानेकविष्टपा—अनेक भुवनोंमें व्याप्त, ६५६ विश्वमित्रम्—सम्पूर्ण जगत्की सुहृद्, ६५७ विष्णुपदी—भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई, ६५८ वैष्णवी—विष्णुशक्ति, ६५९ वैष्णवप्रिया—विष्णुभक्तोंको प्रिय।^४
६६० विरूपाक्षप्रियकरी—भगवान् शंकरका प्रियकार्य करनेवाली, ६६१ विभूतिः—अणिमा आदि अष्टविध ऐश्वर्यरूपा, ६६२ विश्वतोमुखी—सब ओर मुखवाली, ६६३ विपाशा—बन्धनरहित, अथवा विपाशा (व्यास) नामक नदी, ६६४ वैबुधी—देवाधिदेव विष्णुकी शक्ति अथवा देवलोकमें प्रकट, ६६५ वेद्या—जानने योग्य, ६६६ वेदाक्षररसस्रवा—वेदके अक्षरोंसे प्रतिपादित ब्रह्मानन्दरसका स्रोत बहानेवाली, ब्रह्मद्रवरूपा।^५
६६७ विद्या—ब्रह्मविद्यास्वरूपा, ६६८ वेगवती—बड़े वेगसे बहनेवाली, ६६९ वन्द्या—वन्दनीया, ६७० बृंहणी—बृहत्स्वरूपा अथवा विस्तार करनेवाली, ६७१ ब्रह्मवादिनी—ब्रह्मका उपदेश करनेवाली, ६७२ वरदा—वर देनेवाली, ६७३ विप्रकृष्टा—सर्वोत्तम, ६७४ वरिष्ठा—श्रेष्ठा, ६७५ विशोधनी—विशेषरूपसे शुद्ध (पवित्र) करनेवाली।^६
६७६ विद्याधरी—सम्पूर्ण विद्याओंको धारण करनेवाली, ६७७ विशोका—शोकरहित, ६७८ वयोवृन्दनिषेविता—पक्षियोंके समुदायसे निषेवित, ६७९ बहुदका—बहुत जलवाली, ६८० बलवती—बलसे युक्त, ६८१ व्योमस्था—स्वर्गंगारूपसे आकाशमें स्थित, ६८२ विबुधप्रिया—देवताओंकी प्रियनदी।^७
६८३ वाणी—सरस्वतीस्वरूपा, ६८४ वेदवती—वैदिक ज्ञानसे सम्पन्न अथवा वेदवती नामवाली सती साध्वी स्वरूपा, ६८५ वित्ता—ज्ञानस्वरूपा, ६८६ ब्रह्मविद्यातरङ्गिणी—ब्रह्मविद्यारूपी तरंगोंसे युक्त, ६८७ ब्रह्माण्डकोटिव्याप्ताम्बुः—करोड़ों ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त जलवाली, ६८८ ब्रह्महत्यापहारिणी—ब्रह्महत्याका अपहरण करनेवाली।^८
१. फालितैनोमहाक्षेत्रा फणिलोकविभूषणम्। फेनच्छलप्रणुन्नैनाः फुल्लकैरवगन्धिनी ॥
२. फेनिलाच्छाम्बुधाराभा फुडुच्चाटितपातका। फाणितस्वादुसलिला फाण्टपथ्यजलाविला ॥
३. विश्वमाता च विश्वेशी विश्वा विश्वेश्वरप्रिया। ब्रह्मण्या ब्रह्मकृद्ब्राह्मी ब्रह्मिष्ठा विमलोदका ॥
४. विभावरी च विरजा विक्रान्तानेकविष्टपा। विश्वमित्रं विष्णुपदी वैष्णवी वैष्णवप्रिया ॥
५. विरूपाक्षप्रियकरी विभूतिर्विश्वतोमुखी। विपाशा वैबुधी वेद्या वेदाक्षररसस्रवा ॥
६. विद्या वेगवती वन्द्या बृंहणी ब्रह्मवादिनी। वरदा विप्रकृष्टा च वरिष्ठा च विशोधनी ॥
७. विद्याधरी विशोका च वयोवृन्दनिषेविता। बहुदका बलवती व्योमस्था विबुधप्रिया ॥
८. वाणी वेदवती वित्ता ब्रह्मविद्यातरङ्गिणी। ब्रह्माण्डकोटिव्याप्ताम्बुर्ब्रह्महत्यापहारिणी ॥