संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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९९७ क्षेमदा—कल्याणदायिनी, ९९८ क्षालिताधौघा—पापराशिको धो डालनेवाली, ९९९ क्षुद्रविद्राविणी—दुष्टोंको मार भगानेवाली, १००० क्षमा—सहनशीला, पृथ्वीस्वरूपा। अगस्त्यजी ! इस प्रकार गंगाजीके सहस्र नामोंका कीर्तन करके मनुष्य गंगास्नानका उत्तम फल पा लेता है।*
यह गंगासहस्रनाम सब पापोंका नाश और सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करनेवाला है। समस्त स्तोत्रोंके जपसे इसका जप श्रेष्ठ है। यह सबको पवित्र करनेवाली वस्तुओंको भी पवित्र करनेवाला है। श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करनेपर यह मनोवांछित फल देनेवाला है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करानेवाला है। मुने ! इसका एक बार पाठ करनेसे भी एक यज्ञका फल प्राप्त होता है। गंगासहस्रनाम आयु तथा आरोग्य देनेवाला और सम्पूर्ण उपद्रवोंका नाश करनेवाला है। यह मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। जो इस स्तुतिका पाठ करता है, उसे सदाचारी जानना चाहिये। वह सदा पवित्र है तथा उसने सम्पूर्ण देवताओंकी पूजा सम्पन्न कर ली है। उसके तृप्त होनेसे साक्षात् गंगाजी तृप्त हो जाती हैं। अतः सर्वथा प्रयत्न करके गंगाजीके भक्तका पूजन करे। जो गंगाजीके इस स्तोत्रराजका श्रवण और पाठ करता है या दम्भ और लोभसे रहित होकर उनके भक्तोंको सुनाता है, वह मानसिक, वाचिक और शारीरिक तीनों प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा पितरोंका प्रिय होता है। जिसके घरमें गंगाजीका यह स्तोत्र लिखकर इसकी पूजा की जाती है, वहाँ पापका कोई भय नहीं है। वह घर सदा पवित्र है।
शिवकी कृपाके बिना काशीवासकी दुर्लभता तथा काशीकी महिमा
स्कन्दजी कहते हैं—महाभाग अगस्त्यजी ! सुनिये। सुप्रसिद्ध राजा भगीरथ श्रीमहादेवजीकी आराधना करके गंगाजीको बड़ी तपस्यासे भूमिपर ले आये। फिर वहाँसे तीनों लोकोंके हितके लिये गंगाको उस स्थानपर लाये जहाँ मणिकर्णिका तीर्थ है, भगवान् शंकरका आनन्दवन है और श्रीहरिका चक्रपुष्करिणी नामक तीर्थ है। वह परब्रह्म परमात्माका सर्वोत्तम क्षेत्र है, जो लीलासे ही समस्त जीवोंको मोक्ष अर्पण करता है। दिलीपनन्दन भगीरथ स्वयं आगे-आगे चलते हुए गंगाजीको उस पुरीमें ले आये, जो मोक्षको प्रकाशित करनेसे 'काशीपुरी' के नामसे विख्यात है। उस महाक्षेत्रको भगवान् शंकरने कभी नहीं छोड़ा है, इसलिये वह 'अविमुक्त' कहलाता है। मुने ! काशीका महत्त्व पहलेसे ही अधिक था, फिर गंगाजीके जलके समागमसे जो उसकी महिमा बढ़ी, उसके विषयमें क्या कहना है। वहाँका चक्र-पुष्करिणी तीर्थ पहलेसे ही कल्याणका निकेतन था, फिर भगवान् शंकरके मणिमय कर्णभूषणके गिरनेसे वह और भी श्रेष्ठ हो गया। भगवान् शिवके निवासस्थान अविमुक्तक्षेत्र अथवा आनन्द-काननमें पहलेसे ही मुक्ति सिद्ध है, फिर गंगाजीका सम्पर्क होनेसे उस तीर्थकी महिमामें और उत्कर्ष आ गया। जबसे मणिकर्णिकामें गंगाजी आकर मिल गयीं, तबसे वह क्षेत्र देवताओंके लिये भी दुर्लभ हो गया। काशीमें निवास करनेवाला तथा वहीं मृत्युको प्राप्त हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है। वेदान्तद्वारा जाननेयोग्य परब्रह्म परमात्माके निदिध्यासन, सांख्य और योगके बिना ही काशीमें मरा हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है। कालसे काशीमें शरीरका परित्याग करके मरा हुआ पुरुष तारकमन्त्रका उपदेश पाकर अमर हो जाता है। काशीमें शरीरका त्याग करना ही दान है, वही तपस्या है और वही मोक्षका सुख देनेवाला योग है। देवताओंने वहाँ पापियोंकी खोटी बुद्धिका खण्डन करनेवाली महान्
* क्षेमदा क्षालिताधौघा क्षुद्रविद्राविणी क्षमा। इति नाम सहस्रं हि गंगायाः कलशोद्भव ॥
कीर्तयित्वा नरः सम्यग्गंगास्नानफलं लभेत्।