भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७९३ ---|---

गर्भभृत्—कार्तिकेयको गर्भमें धारण करनेवाली। १

९४९ शंसनीयचरित्रा—स्तवन करनेयोग्य दिव्य चरित्रोंवाली, ९५० शातिताशेषपातका—समस्त पातकोंका नाश करनेवाली, ९५१ षड्गुणैश्वर्य-सम्पन्ना—ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान तथा वैराग्य—इन छः प्रकारके ऐश्वर्योंसे सम्पन्न, ९५२ षडङ्गश्रुतिरूपिणी—शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष तथा कल्प—ये वेदके छः अंग तथा वेद जिसके स्वरूप हैं, वह। २

९५३ षण्ढताहारिसलिला—नपुंसकता एवं निर्वीर्यता आदि दोष दूर करनेमें समर्थ जलवाली, ९५४ स्त्यायन्नदनदीशता—जिसमें सैकड़ों नद और नदियाँ कल-कल नादके साथ आकर मिलती हैं, वह, ९५५ सरिद्वरा—नदियोंमें श्रेष्ठ, ९५६ सुरसा—उत्तम रससे युक्त, ९५७ सुप्रभा—सुन्दर प्रभाववाली, ९५८ सुरदीर्घिका—देवताओंकी बावली। ३

९५९ स्वःसिन्धुः—स्वर्गलोककी नदी, ९६० सर्वदुःखघ्नी—सबके दुःखोंका नाश करनेवाली, ९६१ सर्वव्याधिमहौषधम्—समस्त रोगोंकी एकमात्र महौषधि, ९६२ सेव्या—सेवन करने योग्य, ९६३ सिद्धिः—अणिमा आदि अष्टसिद्धिस्वरूपा, ९६४ सती—पतिव्रता, ९६५ सूक्तिः—शुभ उक्तिरूप अथवा वैदिक-सूक्तस्वरूपा, ९६६ स्कन्दसूः—कार्तिकेयजननी, ९६७ सरस्वती—वाणीकी अधिष्ठात्री देवी। ४

९६८ सम्पत्तरङ्गिणी—सम्पत्तिरूप लहरोंवाली, ९६९ स्तुत्या—स्तवन करने योग्य, ९७० स्थाणु-मौलिकुतालया—भगवान् शंकरके मस्तकको अपना निवासस्थान बनानेवाली, ९७१ स्थैर्यदा—स्थिरता प्रदान करनेवाली, ९७२ सुभगा—उत्तम ऐश्वर्यसे युक्त, ९७३ सौख्या—सुख देनेवाली, ९७४ स्त्रीषु सौभाग्यदायिनी—स्त्रियोंको सौभाग्य प्रदान करनेवाली। ५

९७५ स्वर्गनिःश्रेणिका—स्वर्गलोकमें जानेके लिये सीढ़ी, ९७६ सूक्ष्मा—इन्द्रियोंकी पहुँचसे परे स्थित, सूक्ष्मस्वरूपा, ९७७ स्वधा—पितृतृप्तिस्वरूपा, ९७८ स्वाहा—हव्यस्वरूपा, ९७९ सुधाजला—अमृतके समान मधुर जलवाली, ९८० समुद्ररूपिणी—समुद्ररूपा, ९८१ स्वर्ग्या—स्वर्गलोककी प्राप्तिमें सहायक, ९८२ सर्वपातक-वैरिणी—समस्त पापोंकी शत्रु। ६

९८३ स्मृताघहारिणी—स्मरण करनेपर समस्त पापोंका संहार करनेवाली, ९८४ सीता—सीता नामवाली गंगा, जनकनन्दिनीस्वरूपा, ९८५ संसाराब्धि-तरण्डिका—संसारसागरसे पार उतारनेके लिये नौकारूप, ९८६ सौभाग्यसुन्दरी—अतिशय सौभाग्यसे परम सुन्दर प्रतीत होनेवाली, ९८७ सन्ध्या—सन्ध्याकालमें उपास्य गायत्रीरूपा, ९८८ सर्वसार-समन्विता—समस्त शक्तियोंसे संयुक्त। ७

९८९ हरप्रिया—भगवान् शिवकी वल्लभा, ९९० हृषीकेशी—इन्द्रियोंकी स्वामिनी अथवा हृषीकेश भगवान् विष्णुकी पत्नी, ९९१ हंसरूपा—शुद्धस्वरूपा, हंसरूपधारिणी, ९९२ हिरण्मयी—स्वर्णमयी, ज्ञानस्वरूपा, ९९३ हताघसंघा—पापराशियोंका विनाश करनेवाली, ९९४ हितकृत्—हित-साधन करनेवाली, ९९५ हेला—एक प्रकारकी शृंगारजनित चेष्टा, ९९६ हेलाघगर्वहृत्—लीलापूर्वक पापका घमण्ड चूर करनेवाली। ८


१. श्मशानशोधनी शान्ता शश्वच्छतधृतिस्तुता । शालिनी शालिशोभाढ्या शिखिवाहनगर्भभृत् ॥
२. शंसनीयचरित्रा च शातिताशेषपातका । षड्गुणैश्वर्यसम्पन्ना षडङ्गश्रुतिरूपिणी ॥
३. षण्ढताहारिसलिला स्त्यायन्नदनदीशता । सरिद्वरा च सुरसा सुप्रभा सुरदीर्घिका ॥
४. स्वःसिन्धुः सर्वदुःखघ्नी सर्वव्याधिमहौषधम् । सेव्या सिद्धिः सती सूक्तिः स्कन्दसूश्च सरस्वती ॥
५. सम्पत्तरङ्गिणी स्तुत्या स्थाणुमौलिकुतालया । स्थैर्यदा सुभगा सौख्या स्त्रीषु सौभाग्यदायिनी ॥
६. स्वर्गनिःश्रेणिका सूक्ष्मा स्वधा स्वाहा सुधाजला । समुद्ररूपिणी स्वर्ग्या सर्वपातकवैरिणी ॥
७. स्मृताघहारिणी सीता संसाराब्धितरण्डिका । सौभाग्यसुन्दरी सन्ध्या सर्वसारसमन्विता ॥
८. हरप्रिया हृषीकेशी हंसरूपा हिरण्मयी । हताघसंघा हितकृद्धेला हेलाघगर्वहृत् ॥