संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 832, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *
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तीनों ऋणोंसे छुड़ानेवाला विशुद्धिकारक ऋणमोचन तीर्थ है। यह अद्भुत ॐकारेश्वरका स्थान है, जहाँ 'ॐकार' नामसे प्रसिद्ध परब्रह्म परमात्मा नित्य प्रकाशमान हैं। अ, उ, म्, नाद और बिन्दु—इन पाँच स्वरूपोंवाले प्रणवरूप परब्रह्म जहाँ सदैव प्रकाशित होते हैं। यह परम सुन्दर 'मत्स्योदरी' तीर्थ तथा ये परम दयालु भगवान् त्रिलोचनदेव हैं। इधर ये कामेश्वरदेव हैं। यहाँ भक्तोंके मनोरथकी सिद्धिके लिये स्वयं भगवान् शंकर लीन हुए हैं। इस कारण उनकी 'स्वर्लीन' संज्ञा हो गयी है। काशीमें इस क्षेत्रके अभिमानी देवता जो महादेवजी हैं, इन्हें पुराणोंमें भगवान् विश्वनाथ कहा जाता है। यह उन्हींका अद्भुत मन्दिर है और वे स्कन्देश्वर महादेव हैं, इनका श्रद्धापूर्वक दर्शन करनेसे मनुष्य आजन्म ब्रह्मचर्यका फल प्राप्त करता है। इधर ये सब सिद्धियोंके देनेवाले विनायकेश्वर हैं, जिनकी सेवासे मनुष्योंके सम्पूर्ण विघ्न नष्ट हो जाते हैं। यह साक्षात् काशीदेवी हैं, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्योंका पुनर्गर्भवास नहीं होता। यह पार्वतीश्वरका महान् मन्दिर है, जहाँ मोक्षदाता भगवान् महेश्वर गौरीदेवीके साथ नित्य निवास करते हैं। ये महापातकोंका नाश करनेवाले भृंगीश्वर हैं तथा ये चार वेदोंको धारण करनेवाले चतुर्वेदेश्वर हैं, जिनके दर्शनसे ब्राह्मण वेदाध्ययनका फल पाता है। इधर यज्ञोंद्वारा स्थापित यज्ञेश्वर नामक शिवलिंग है, जिसकी पूजासे मनुष्य सम्पूर्ण यज्ञोंका महान् फल पाता है। यह पुराणेश्वरलिंग है, जिसके दर्शनसे मनुष्य अठारह विद्याओंका ज्ञाता होता है। यह धर्मशास्त्रेश्वर महादेव हैं, जिनके दर्शनसे धर्म शास्त्रोंके अध्ययनका पुण्य प्राप्त होता है। यह सब प्रकारकी जड़ताका विनाश करनेवाला सारस्वतलिंग है और इधर यह सप्ततीर्थेश्वरलिंग है जो सबको तत्काल शुद्धि देनेवाला है। यह शैलेश्वरलिंगका परम अद्भुत मण्डप है। इधर यह सप्तसागरेश्वर नामक मनोहर लिंग है, जिसके दर्शनसे मनुष्य सात समुद्रोंमें स्नान करनेका फल पाता है। वे भगवान् मन्त्रेश्वर हैं तथा यह त्रिपुरेश्वर शिवके आगेवाला महान् कुण्ड है। इसे पूर्वकालमें त्रिपुरवासियोंने खोदा था। यह सहस्रबाहुसे पूजित बाणेश्वरलिंग है। यह प्रह्लादकेशवके सम्मुख पूर्व दिशामें वैरोचनेश्वरलिंग है। उधर बलिकेशव, नारदकेशव और आदिकेशव हैं। आदिकेशवके पूर्वमें आदित्यकेशव हैं। तत्पश्चात् वे भीष्मकेशव हैं। इधर ये दत्तात्रेयेश्वर हैं। दत्तात्रेयेश्वरके पूर्व आदि गदाधर हैं। फिर भृगुकेशव और ये वामनकेशव हैं। ये दोनों नर-नारायण हैं। उधर यज्ञवाराहकेशव हैं। फिर विदार नारसिंह और गोपीगोविन्द हैं। इधर यह लक्ष्मीनृसिंहका रत्नमय प्रासाद है। ये खर्वविनायक हैं, जो मनुष्योंको महासिद्धि देनेवाले हैं। फिर शेषमाधव हैं, जिनके भक्त प्रलयकालकी आगमें नहीं जलते। ये शंखमाधव हैं, जो शंखासुरको मारकर यहाँ विराजमान हैं। यह सारस्वत स्रोत है, जहाँ महानदी गंगाके साथ सरस्वतीका संगम हुआ है। यहाँ गोता लगानेवाले मनुष्य पुनः इस पृथ्वीपर जन्म नहीं लेते। ये साक्षात् लक्ष्मीपति विन्दुमाधव हैं, जिन्हें श्रद्धापूर्वक नमस्कार करनेवाला मनुष्य पुनः गर्भगृहमें निवास नहीं करता, दरिद्रताको नहीं प्राप्त होता तथा रोगोंसे भी पीड़ित नहीं होता। जो नाद-विन्दु-स्वरूपधारी एकमात्र प्रणवरूप परमात्मा है, जिसे निराकार परब्रह्म कहते हैं, वही ये भगवान् विन्दुमाधव हैं। यह पंचब्रह्मात्मक पंचनद (पंचगंगा) तीर्थ है, इधर ये मंगला गौरी हैं। अज्ञानान्धकारका नाश करनेवाले मयूखादित्य नामक सूर्य हैं, उधर वे दिव्य ज्योति प्रदान करनेवाले गभस्तीश्वर नामक महाशिव हैं। ये तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध किरणेश्वर हैं। इधर यह पातकोंको धो डालनेवाला 'धौतपापेश्वर' नामक शिवलिंग है। ये निर्वाणनृसिंह हैं, उधर ये मणिप्रदीप नाग हैं, यह कपिलेश्वरलिंग है; इनके दर्शनसे नरोंकी तो बात ही क्या है, वानर भी मुक्त हो जाते हैं। यह प्रियव्रतेश्वर नामक लिंग प्रकाशित हो रहा है। इधर यह कलिकालकी पीड़ा दूर करनेवाले श्रीकालराजका श्रेष्ठ मन्दिर है। यह परम सुन्दर मन्दाकिनी है जो तपस्या करनेके लिये यहाँ आयी है। यह काशीवासका सुख पाकर अब भी स्वर्गलोकमें