भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 833, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 833

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  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नहीं जाना चाहती है। यहाँ विधिपूर्वक पितरोंका श्राद्ध और तर्पण करके पापी मनुष्य भी नरकका दर्शन नहीं करता। यह रत्नेश्वर नामक शिवलिंग है। रत्नेश्वरके प्रसादसे किसने मोक्षरूपी रत्न नहीं पाया है। भगवान् कृत्तिवासेश्वर सब लिंगोंमें प्रधान हैं। ये भगवती दुर्गा हैं और यह उत्तम पितृलिंग है। यह चित्रघण्टेश्वरीदेवी हैं और यह घण्टाकर्ण सरोवर है। यह ललिता गौरी और यह अद्भुत रूपवाली विशालाक्षी हैं। ये आशाविनायक हैं और यह परम अद्भुत धर्मकूप है जहाँ पिण्डदान करके मनुष्य अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा सकता है। ये विश्वभुजादेवी हैं और वे वन्दी देवी हैं। यह त्रिलोकवन्दित दशाश्वमेधतीर्थ है। यह सब तीर्थोंमें उत्तम है और इसे प्रयागतीर्थ बताया गया है। यह अशोकतीर्थ है और ये गंगाकेशव हैं। यह श्रेष्ठ मोक्ष-द्वारतीर्थ है और इसको स्वर्गद्वारतीर्थ भी कहते हैं।


ज्ञानवापीकी महिमा और उसके सेवनसे माल्यकेतु और कलावतीको तारक ब्रह्मकी प्राप्ति

स्कन्दजी कहते हैं—मुने ! कलावतीने पुनः उस चित्रपटमें स्वर्गद्वारके आगे श्रीमResource?मणिकर्णिकातीर्थको देखा जहाँ संसाररूपी सर्पसे डसे हुए जीवोंके दाहिने कानमें भगवान् शिव अपने दाहिने हाथसे स्पर्श करते हुए तारक ब्रह्मका उपदेश देते हैं। बार-बार चित्रपटको निहारती हुई उसने भगवान् विश्वनाथके दक्षिण भागमें ज्ञानवापीको देखा। पुराणमें महादेवजीको जिन आठ मूर्तियोंसे युक्त बताया जाता है, उनमेंसे उनकी जलमयी मूर्ति यह ज्ञानवापी ही है, जो ज्ञान प्रदान करनेवाली है। ज्ञानवापीका दर्शन करके कलावतीके शरीरमें रोमांच हो आया। शरीर कुछ कम्पित होने लगा और माथेमें पसीना आ गया। उसके दोनों नेत्र आनन्दके आँसुओंसे भर आये। देह जडवत् हो गयी। मुँहका रंग फीका हो गया और वह चित्रपट उसके हाथसे छूटकर गिर पड़ा। वह क्षणभरके लिये अपने-आपको भूल गयी। तदनन्तर कलावतीकी दासियाँ इधर-उधरसे दौड़ती हुई आयीं और आपसमें पूछने लगीं—'क्या हुआ? क्या हुआ? यह क्या हो गया?' फिर वे शान्तिदायक उपचारोंसे धैर्यपूर्वक उसकी सेवामें जुट गयीं। उसे इस अवस्थामें देखकर बुद्धिशरीरिणी नामवाली एक सखी बोली—'मैं इसके सन्तापको शान्त करनेके लिये एक उत्तम ओषधि जानती हूँ। यह इस चित्रपटको देखकर तत्काल विकलताको प्राप्त हुई है, अतः फिर उसीका स्पर्श करनेसे सन्तापरहित होगी।' बुद्धिशरीरिणीके कहनेसे दासियोंने कलावतीके आगे उस चित्रपटको रखकर कहा—'रानीजी! इस चित्रपटको देखिये, जिसमें आपको आनन्द देनेवाले कोई इष्टदेव विराज रहे हैं।' चित्रपटका स्पर्श प्राप्त होते ही कलावती मूर्च्छा त्यागकर सहसा उठ बैठी। फिर उसने ज्ञानदायिनी ज्ञानवापीको देखा। चित्रपटमें अंकित उस ज्ञानवापीका स्पर्श करके ही उसने जन्मान्तरका वैसा ही ज्ञान प्राप्त कर लिया जैसा कि पूर्वजन्ममें था। तब उसने प्रसन्न होकर अपनी दासियोंसे पूर्वजन्मका वृत्तान्त कह सुनाया।

**कलावती बोली—**पूर्वजन्ममें मैं ब्राह्मणकी कन्या थी और काशीमें विश्वनाथ-मन्दिरके समीप ज्ञानवापीके तटपर प्रसन्नतापूर्वक खेला करती थी। मेरे पिताका नाम हरस्वामी, माताका नाम प्रियंवदा और मेरा नाम सुशीला था। इस समय ज्ञानवापीको देखनेसे क्षणभरमें मुझे यह पूर्वजन्मका ज्ञान हो आया है।

**कलावतीकी यह बात सुनकर बुद्धिशरीरिणी तथा वे सब दासियाँ हर्षमें भरकर बोलीं—**अहो! जिस तीर्थका ऐसा प्रभाव है, उसका दर्शन हमें कैसे प्राप्त हो सकता है। कलावती रानी ! आपको

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