संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ८०५ ---|---
नमस्कार है। आप हमारी मनोकामना पूर्ण करें। राजासे प्रार्थना करके हमको भी वहाँ ले चलें। जो चित्रपटमें प्राप्त होनेपर भी आपको ज्ञान देनेवाली हुई है, वह अवश्य ही नामसे 'ज्ञानवापी' कहलाने योग्य है।' कलावतीने उन सबकी प्रार्थना स्वीकार करके महाराजसे कहा—'प्राणनाथ ! आप-जैसे
पतिको पाकर मेरे सब मनोरथ पूर्ण हो गये। आर्यपुत्र ! अब एक ही मनोरथ शेष है, जिसके लिये मैं प्रार्थना करती हूँ।
राजाने कहा—प्रिये ! मैं ऐसी कोई वस्तु नहीं देखता जो तुम्हारे लिये देने योग्य न हो। अतः शीघ्र कहो। तुम किससे माँगती हो, किस वस्तुको माँगती हो और कौन माँगनेवाला है? हम दोनोंका आपसका बर्ताव दो भिन्न-भिन्न व्यक्तियोंकी भाँति नहीं है। राज्य, कोष, सेना और दुर्ग तथा अन्य भी जितनी वस्तुएँ हैं, वे सब तुम्हारी हैं, मेरा कुछ भी नहीं है। मैं नाममात्रके लिये ही इनका स्वामी हूँ।
कलावती बोली—नाथ ! मुझे शीघ्र काशीपुरीमें पहुँचाइये।
राजा माल्यकेतुने कहा—प्रिये ! यदि तुमने काशी जानेका ही निश्चय कर लिया तो अब मुझे भी यहाँ रहनेकी क्या आवश्यकता। अतः हम-तुम दोनोंको काशी चलना चाहिये।
इस प्रकार अपनी प्यारी पत्नी कलावतीको आश्वासन देकर राजा माल्यकेतुने पुरवासियोंको बुलाकर सत्कार किया और पुत्रको राजसिंहासनपर बिठाकर कुछ रत्न-धन साथ ले काशीपुरीको प्रस्थान किया। विश्वनाथजीकी नगरीका दर्शन करके राजाने अपनेको कृतार्थ माना और संसार-सागरसे पार गया हुआ समझा। पहले जन्मकी वासनासे रानी कलावतीने उस पुरीकी समस्त गलियों और मार्गोंको स्वयं पहचान लिया। उन्होंने मणिकर्णिकामें स्नान करके बहुत धन दान किया और विश्वनाथजीकी पूजा करके परिक्रमा करनेके पश्चात् मुक्तिमण्डपमें प्रवेश किया। वहाँ धर्मकथा सुनकर धन-दान किया। फिर राजाने सायंकालकी महापूजा की और रातमें जागरण किया। तदनन्तर प्रातःकाल उठकर शौच और स्नानसे निवृत्त हो रानीके बताये हुए मार्गसे वे ज्ञानवापीपर गये। वहाँ हर्षमें भरे हुए राजाने कलावतीके साथ स्नान किया और श्रद्धापूर्वक पिण्डदान देकर पितरोंको तृप्त किया। वहाँ सुपात्र ब्राह्मणोंको सुवर्ण और रजत दान किये। फिर दीनों, अन्धों, दरिद्रों और अनाथोंको धनसे सन्तुष्ट करके नरेशने पारणा की तथा रत्नमयी सीढ़ियाँ लगवाकर ज्ञानवापीका संस्कार कराया। रानी कलावतीने अपने पतिके साथ ज्ञानवापीतीर्थके प्रति भक्ति-भाव बढ़ाया और आयुके शेष दिन तपस्यापूर्वक व्यतीत किये।
एक दिन प्रातःकाल वे दोनों दम्पति ज्ञानवापीमें स्नान करके बैठे हुए थे। इसी समय किसी जटाधारी व्यक्तिने आकर उनके हाथमें विभूति दी और इस प्रकार कहा—'उठो, आज एक ही क्षणमें तुम दोनोंको यहाँ तारक मन्त्रका उपदेश प्राप्त होगा।' उस जटाधारी तपस्वीके इतना कहते ही आकाशसे एक तेजस्वी विमान उतर आया और सब लोगोंके देखते-देखते भगवान् शिव उस