भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 837

८०८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सदैव सम्माननीय हैं। सायंकालकी सन्ध्योपासना एवं गायत्री-जप करके घरपर आये हुए अतिथिका मधुर वचन, रहनेके लिये स्थान, आसन और अन्न-जल आदिके द्वारा भलीभाँति सत्कार करे। इस प्रकार रात्रिका प्रथम प्रहर व्यतीत करके शयन करे। रातमें अधिक तृप्तिपूर्वक भोजन नहीं करना चाहिये (भूखसे कुछ कम ही खाना चाहिये)।


संस्कारोंका संक्षिप्त परिचय, ब्रह्मचारी एवं ब्रह्मचर्य-आश्रमके धर्म

स्कन्दजी कहते हैं—कुम्भज ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीनों वर्ण द्विज माने गये हैं। जिसका दो बार जन्म हो, उसको 'द्विज' कहते हैं। ये ब्राह्मण आदि वर्ण पहले तो मातासे उत्पन्न हुए हैं और फिर उपनयन-संस्कारसे इनका द्वितीय जन्म सम्पन्न हुआ है। इन सबकी गर्भाधान आदिसे लेकर अन्त्येष्टि कर्मतक समस्त क्रियाएँ वैदिक मन्त्रोंसे सम्पन्न होती हैं। बुद्धिमान् पुरुष ऋतुकालमें रजस्वला स्त्रीके स्नान आदिसे शुद्ध हो जानेपर उसके भीतर गर्भका आधान करे। गर्भाधानकर्ममें मूल और मघा नक्षत्रको त्याग दे। गर्भका बालक जब उदरमें चलने-फिरने लगता है, उसके पहले ही उसका पुंसवन-संस्कार होना चाहिये। तत्पश्चात् छठे या आठवें महीनेमें सीमन्तोन्नयन-संस्कार करे। जब बालक उत्पन्न हो जाय तब तुरंत जातकर्म-संस्कार करे। ग्यारहवें दिन नामकरण और चौथे महीनेमें बालकके घरसे बाहर निकलनेका मुहूर्त करे। छठे मासमें अन्नप्राशन और एक वर्षमें चूड़ाकर्म करे अथवा अपने कुलमें जैसा आचार हो, वैसा करे। इन सब संस्कारोंको करनेसे बीज अथवा गर्भजनित दोष नष्ट हो जाते हैं। कन्याओंके लिये ये सब संस्कार बिना मन्त्रके करने चाहिये। केवल विवाह-संस्कार मन्त्रयुक्त करनेका विधान है। ब्राह्मण सातवें या आठवें वर्षमें गायत्री-मन्त्रकी दीक्षा लेनेके योग्य हो जाता है, क्षत्रिय ग्यारहवें वर्षमें और वैश्य बारहवें वर्षमें इसके योग्य होता है अथवा जैसा अपने कुलका आचार हो वैसा करना चाहिये। ब्राह्मण ब्रह्मतेजकी वृद्धिके लिये पाँचवें वर्षमें, बलकी इच्छा रखनेवाला क्षत्रिय छठे वर्षमें और वैश्य आठवें वर्षमें मौंजी (मेखला) धारण करे। गुरुको चाहिये कि वह शिष्यका उपनयन-संस्कार करके उसे उसी समय महाव्याहृतिपूर्वक गायत्री-मन्त्रका उपदेश दें एवं वेदोंका स्वाध्याय करावें। साथ ही शिष्यको शौचाचारके पालनमें नियुक्त करें। ब्रह्मचारी बालक पूर्वोक्त विधिसे शौच और आचमन करे। दाँत और जिह्वाकी अच्छी तरह शुद्धि करके शरीरको खूब मल-मलकर स्नान करे। स्नानके समय जल-देवता-सम्बन्धी मन्त्रोंका भी उच्चारण करे। तत्पश्चात् यत्नपूर्वक प्राणायाम करके दोनों सन्ध्याओंके समय सूर्यका उपस्थान करे। फिर गायत्रीजपसे निवृत्त होकर अग्निहोत्र करके ब्राह्मणोंको प्रणाम करे। प्रणामके समय इस प्रकार कहे—'अमुक गोत्रः अमुक शर्माहं भो ब्राह्मणा! भवतोऽभिवादये' (मैं अमुक गोत्र और अमुक नामवाला हूँ, विप्रवरो! आपको मैं प्रणाम करता हूँ)। जो सदा गुरुजनोंको प्रणाम करता है और बड़े-बूढ़ोंकी सेवामें तत्पर रहता है, उसकी आयु, यश, बल और बुद्धि प्रतिदिन अधिक बढ़ती है*। शिष्यको चाहिये कि वह गुरुके बुलानेपर उनके समीप बैठकर पढ़े। भिक्षामें जो अन्न प्राप्त हो, वह गुरुकी सेवामें निवेदन करे। मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा गुरुके हितका कार्य करे। जो छात्र साधु, विश्वासपात्र, ज्ञानवान्, धन देनेमें समर्थ, शक्तिशाली, कृतज्ञ, पवित्र, द्रोहरहित और


* अभिवादनशीलस्य वृद्धसेवारतस्य च। आयुर्यशो बलं बुद्धिवर्द्धतेऽहरहोऽधिकम् ॥ (स्क० पु०, का० पू० ३६। १३)