संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 838, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ८०९ ---|---
दोषदृष्टि न रखनेवाले हों, उन सबको धर्मकी दृष्टिसे पढ़ाना गुरुका कर्तव्य है, अर्थके लोभसे नहीं। ब्रह्मचारी शिष्य मेखला, दण्ड, यज्ञोपवीत और मृगचर्म धारण करे। उत्तम ब्राह्मणोंके यहाँसे अपने निर्वाहके लिये भिक्षा ग्रहण करे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य क्रमशः आदि, मध्य और अन्तमें 'भवत्' शब्दका प्रयोग करके भैक्षचर्या करे। यथा 'भवति भिक्षां मे देहि मातः!' यह ब्राह्मण-बालक कहे; क्षत्रिय 'भिक्षां भवति मे देहि' ऐसा कहे और वैश्य ब्रह्मचारी 'भिक्षां मे देहि भवति' ऐसा बोले। गुरुकी आज्ञा लेकर मौनभावसे अन्नकी निन्दा न करते हुए भोजन करे। ब्रह्मचारी किसी एक व्यक्तिके घरका अन्न न खाय, परंतु श्राद्धमें अथवा आपत्तिकालमें वह एक व्यक्तिका अन्न भी खा सकता है। अधिक भोजन करना आरोग्य, आयु, स्वर्ग और पुण्यका नाश करनेवाला है। यह लोकविरुद्ध कार्य भी है। इसलिये अति भोजनका सर्वथा त्याग करे। मधु, मांस, प्राणियोंकी हिंसा, उगते हुए सूर्यकी ओर देखना, अंजन लगाना, स्त्रीकी ओर देखना, बासी और उच्छिष्ट अन्न खाना और दूसरोंकी निन्दा करना—ब्रह्मचारी यह सब सर्वथा त्याग दे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके उपनयनका अन्तिम समय क्रमशः सोलह वर्ष, बाईस वर्ष और चौबीस वर्षतक है। जिनकी आयु इससे ऊपरकी हो गयी है, उनका संस्कार नहीं करना चाहिये। वे पतित (व्रात्य) तथा धर्मसे भ्रष्ट होते हैं। व्रात्यस्तोम नामक यज्ञसे उनका पतितपन दूर होता है। जो गायत्री-मन्त्रसे भ्रष्ट हैं, ऐसे लोगोंके साथ विवाहादि सम्बन्ध नहीं करना चाहिये। ब्राह्मण आदि वर्णोंके लोग क्रमशः सन, रेशम और ऊनके वस्त्र धारण करें। ब्राह्मणकी मेखला मूँजकी, क्षत्रियकी मेखला मुर नामक तृणकी तथा वैश्यकी मेखला सनके तन्तुओंकी बनानी चाहिये। प्रत्येक मेखला तीन तारकी एवं चिकनी होनी चाहिये। ब्राह्मणादिके यज्ञोपवीत क्रमशः कपास, सन और ऊनके होने चाहिये। ब्राह्मणका दण्ड बेल और पलासका, क्षत्रियका दण्ड बरगद और खैरका तथा वैश्यका दण्ड पीलू और गूलरका होना चाहिये। पहले-पहल माता, मौसी, बहन और बुआ आदिसे भिक्षा माँगनी चाहिये तथा जो याचना करनेपर अस्वीकार न करें, ऐसी स्त्रियोंसे भी वह भिक्षा माँग सकता है। जबतक वेद पढ़े और वैदिक व्रतोंका पालन करता रहे, तबतक ब्रह्मचारी ही रहे। अध्ययन पूरा होनेके पश्चात् स्नातक होकर गृहस्थ होवे। जो गृहस्थ-आश्रमको स्वीकार करके पुनः ब्रह्मचर्याश्रमके नियमोंको ग्रहण करता है, वह सब आश्रमोंसे वर्जित हो जाता है। वह न तो वानप्रस्थ हो सकता है, न तो संन्यासी ही। आश्रमभ्रष्ट पुरुष जो जप, होम, व्रत, दान, स्वाध्याय और पितृतर्पण आदि कर्म करता है, वह उसका फल नहीं पाता। वेदपाठके आरम्भमें और अन्तमें सदा ॐकारका उच्चारण करे। ॐकारसे हीन वेदपाठ न तो सफल होता है और न सिद्धिदायक ही होता है। जो वेदोंका ज्ञाता ब्राह्मण दोनों सन्ध्याओंके समय ॐकार और व्याहृतियोंसहित गायत्रीमन्त्रका जप करता है, वह वेदपाठके पुण्यसे युक्त होता है।
विधिपूर्वक किये हुए यज्ञसे जपयज्ञ दसगुना उत्तम बताया गया है। उपांशु जप (सूक्ष्म स्वरसे उच्चारण किया हुआ जप) उससे सौगुना फल देनेवाला है। उपांशु जपकी अपेक्षा भी सहस्रगुना महत्त्व मानस-जपका माना गया है*। द्विजको अपनी शक्तिके अनुसार तीन, दो या एक वेदका अध्ययन करके सदा उसके अभ्यासमें लगे रहना चाहिये। वेदाभ्यास ब्राह्मणके लिये सर्वश्रेष्ठ तपस्या है। जो ब्राह्मण शिष्यका उपनयन-संस्कार करके उसे कल्प और रहस्यसहित वेद पढ़ाता है, उसे विद्वान् पुरुष आचार्य मानते हैं। जो जीविकाके
* विधिक्रतोर्दशगुणो जपक्रतुरुदीरितः। उपांशुस्तच्छतगुणः सहस्रो मानसस्ततः॥ (स्क० पु०, का० पू० ३६।४९)