भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 839

८१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


लिये वेदके किसी एक भागको अथवा वेदांगोंका ही अध्ययन कराता है, उसे विद्वान् पुरुष उपाध्याय कहते हैं। जो विधिपूर्वक गर्भाधान आदि संस्कार कराता है तथा अन्नसे पालन करता है, वह गुरु कहा गया है। जो जिसके द्वारा वरण किये जानेपर उसके यहाँ अग्न्याधानपूर्वक किये जानेवाले आहवनीय आदि कर्म, पाकयज्ञ तथा अग्निष्टोम आदि याग सम्पन्न करता है, वह उस यजमानका ऋत्विज् कहलाता है। उपाध्यायकी अपेक्षा दसगुना गौरव आचार्यका है, आचार्यसे सौगुना महत्त्व पिताका है और पितासे भी सहस्रगुना गौरव धारण करनेके कारण माता बड़ी है^१। ब्राह्मणोंमें वही बड़ा माना जाता है, जो ज्ञानमें बड़ा हो, क्षत्रियोंमें बलसे, वैश्योंमें धन-धान्यसे और शूद्रोंमें जन्मसे ज्येष्ठताका व्यवहार होता है। जैसे काठका हाथी और चमड़ेका मृग है, वैसे ही बिना पढ़ा हुआ ब्राह्मण है। ये तीनों केवल नाम धारण करनेवाले हैं। जहाँ गुरुकी निन्दा हो और जहाँ गुरुपर झूठे लांछन लगाये जाते हों, वहाँ अपने कानोंको मूँद लेना चाहिये अथवा उठकर अन्यत्र चले जाना चाहिये। गुरुकी सती एवं युवती पत्नीके दोनों चरणोंका स्पर्श करके कभी प्रणाम न करे, दूरसे ही नमस्कार करे। माता, पुत्री अथवा बहिनके साथ भी एकान्तमें नहीं रहना चाहिये, क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं। वे विद्वानोंको भी मोहमें डाल देती हैं^२। जैसे प्रयत्नपूर्वक कुआँ खोदनेवाला पुरुष पृथ्वीसे जल प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार गुरुकी पूर्णतः सेवा करनेसे शिष्य विद्याको पा लेता है। पुत्रके जन्म और लालन-पालनमें पिता-माता जो क्लेश सहन करते हैं, उसका बदला सौ वर्षोंमें भी नहीं चुकाया जा सकता। इसलिये माता-पिता और गुरुका भी सदैव प्रिय करे। इन तीनोंके सन्तुष्ट हो जानेपर पूर्ण तपस्याका फल प्राप्त होता है। इन तीनोंकी सेवा श्रेष्ठ तपस्या कहलाती है। माताकी सेवासे भूलोक, पिताकी सेवासे भुवर्लोक और गुरुकी सेवासे पुण्यात्मा पुरुष स्वर्गलोकको जीत लेता है। भगवान् विश्वनाथकी कृपासे मनुष्य अखण्ड ब्रह्मचर्यसे युक्त होता है। विश्वनाथजीकी उत्तम दया ही काशीकी प्राप्ति करानेवाली है। काशीकी प्राप्तिसे ज्ञान होता है और ज्ञानसे मनुष्य निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है। अतः मोक्षके उद्देश्यसे ही बुद्धिमानोंका सदाचारके लिये प्रयत्न होता है।

गृहस्थ-आश्रममें जिस प्रकार सदाचारका पालन होता है, वैसा दूसरे आश्रममें नहीं। इसलिये विद्याध्ययन पूर्ण करके अन्तमें गृहस्थ-आश्रमकी शरण लेनी चाहिये। यदि पत्नी अपने अधीन रहनेवाली हो तो गृहस्थ-आश्रमसे बढ़कर दूसरा कोई आश्रम नहीं है। पति और पत्नीकी अनुकूलता धर्म, अर्थ तथा कामकी प्राप्ति करानेवाली होती है। यदि स्त्री अपने अनुकूल रहनेवाली हो तो स्वर्गको लेकर भी क्या करना है और यदि पत्नी अपनेसे विपरीत चलनेवाली हो तब तो उसके सामने नरक भी किस गिनतीमें है? कार्यकुशल, पुत्रवती, पतिव्रता, मीठे वचन बोलनेवाली और अपने अधीन रहनेवाली—इन गुणोंसे युक्त पत्नी वस्तुतः स्त्रीके रूपमें साक्षात् लक्ष्मी है^३। विद्याध्ययन समाप्त होनेपर ब्रह्मचारी गुरुकी आज्ञासे ब्रह्मचर्यव्रतका उद्यापन करके स्नातक होकर अपने ही वर्णकी शुभलक्षणा स्त्रीके साथ विवाह कर ले। वह स्त्री अपने पिताके गोत्रकी न हो और माताकी सपिण्ड न हो। विवाह-सम्बन्धमें ऐसे कुलका परित्याग कर दे, जिसमें मृगीरोग, राजयक्ष्मारोग और कोढ़का रोग होता हो। जिस कुलमें किसी प्रकारका कलंक लगा हो, उसको भी त्याग दे। जिससे केवल कन्या


१- उपाध्यायाद्दशाचार्य आचार्यात्तु शतं पिता। सहस्रं तु पितुर्माता गौरवेणातिरिच्यते॥ (स्क० पु०, का० पू० ३६। ५७)
२- न मात्रा न दुहित्रा वा न स्वस्रैकान्तशीलता। बलवतीन्द्रियाण्यत्र मोहयन्त्यपि कोविदान्॥ (स्क० पु०, का० पू० ३६। ६९)
३- दक्षा प्रजावती साध्वी प्रियवाक् च वशंवदा। गुणैरेमीभिः संयुक्ता सा श्रीः स्त्रीरूपधारिणी॥ (स्क० पु०, का० पू० ३६। ८७)