भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 840

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ८११

ही होनेकी सम्भावना हो, ऐसी स्त्रीसे विवाह न करे। जिसके कोई रोग न हो, जिसके भाई हों, जो अपनेसे कुछ छोटी हो, जिसका मुख सौम्य हो और जो मीठे वचन बोलनेवाली हो, ऐसी स्त्रीके साथ द्विजको विवाह करना चाहिये। पर्वत, भालू, वृक्ष, नदी, सर्प, पक्षी, नाग और दास आदिका बोध करानेवाले नामोंसे युक्त स्त्रीके साथ विवाह न करे। जिसका नाम सौम्य हो, उसीसे विवाह करे। जिसके कोई अंग अधिक या कम हों, जो बहुत बड़ी अथवा अत्यन्त दुबली हो, बिना रोमकी अथवा अधिकरोमवाली हो तथा जिसके केश रूखे एवं मोटे (चिपके हुए) हों, ऐसी स्त्रीके साथ भी विवाह न करे। मोहवश नीच कुलकी कन्यासे तो कभी विवाह न करे; क्योंकि हीन कुलकी कन्याके साथ विवाह करनेसे अपनी सन्तान भी हीनताको प्राप्त होती है। पहले कन्याके लक्षणोंकी परीक्षा करके तदनन्तर उसके साथ विवाह करे। उत्तम लक्षणोंवाली तथा सदाचारका पालन करनेवाली पत्नी पतिकी आयु बढ़ाती है। अगस्त्यजी ! इस प्रकार मैंने आपसे ब्रह्मचारियोंके सदाचारका वर्णन किया है।

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गृहस्थ-आश्रमके धर्म, पंचयज्ञकी महिमा, काशीवासकी महत्ता तथा राजा दिवोदासको पृथ्वीके राज्यकी प्राप्ति

**स्कन्दजी कहते हैं—**यदि स्त्री शुभलक्षणा हो तो गृहस्थ पुरुष सदा सुख भोगता है। अतः सुखकी वृद्धिके लिये पहले स्त्रीके लक्षणोंकी ही परीक्षा करे। शरीर, आवर्त, गन्ध, छाया (कान्ति), सत्त्व, स्वर, गति और वर्ण—विद्वानोंद्वारा स्त्रीके लक्षणोंकी परीक्षाके लिये यह आठ प्रकारका आधार बताया गया है। (सामुद्रिक शास्त्रीय) उत्तम लक्षणोंसे युक्त होनेपर भी जिसने अपना शील (सतीत्व) दूषित कर लिया हो, वह कुलक्षणा स्त्रियोंकी शिरोमणि है तथा जो बाह्य शुभ लक्षणोंसे युक्त न होनेपर भी सती-साध्वी है, उसे समस्त शुभ लक्षणोंका आधार मानना चाहिये। भगवान् विश्वनाथकी कृपासे ही गृहस्थके घरमें शुभलक्षणा, सदाचारिणी, पतिके अधीन रहनेवाली और पतिव्रता स्त्री प्राप्त होती है। जिन्होंने पूर्वजन्ममें उत्तम तीर्थोंमें अपने शरीरको क्षीण किया अथवा छोड़ा है, वे ही इस जगत्में शुभलक्षणा स्त्री होती हैं। जिन स्त्रियोंने जगन्माता पार्वतीजीका पूजन किया है, वे ही सदाचारिणी होती हैं। जिनका पति उनकेगुणोंसे रीझकर उनके अनुकूल बना रहता है तथा जो उत्तम शील-स्वभाववाली हैं, ऐसी मृगनयनी स्त्रियोंके लिये यहीं स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) सुलभ है। वह उनके उत्तम लक्षणोंका ही फल है। स्त्रियाँ अपने अच्छे लक्षणों और विशुद्ध आचरणोंसे अल्पायु पतिको भी दीर्घायु एवं आनन्दका भागी बना देती हैं। अतः सुलक्षणा स्त्रीसे विवाह करना चाहिये।<br><br>गृहस्थ-आश्रममें रहनेवाले पुरुषके द्वारा प्रतिदिन पाँच प्रकारकी हिंसाएँ होती हैं। ओखली, चक्की, चूल्हा, जलका घड़ा और झाडू—ये पाँचों हिंसाके स्थान हैं। ऐसी हिंसाओंका निराकरण करनेके लिये पाँच यज्ञ बताये गये हैं, जो गृहस्थके कल्याणकी वृद्धि करनेवाले हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ। वेद और शास्त्रोंके पठन-पाठनका नाम ब्रह्मयज्ञ है। तर्पणको पितृयज्ञ कहते हैं। होम देवयज्ञ, बलिवैश्वदेव भूतयज्ञ और अतिथि-सत्कार मनुष्ययज्ञ है। जिसके घरसे आदर न पाकर अतिथि निराश लौट जाता है,