भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 841

८१२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


वह जन्मभरके संचित पुण्यसे तत्काल हाथ धो बैठता है¹। अतः आये हुए अतिथिकी प्रसन्नताके लिये सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन, सोनेके लिये स्थान, आसन और जल आदि वस्तुएँ तो सदा देनी ही चाहिये। सायंकालमें सूर्यास्तके समय आये हुए अतिथिका यत्नपूर्वक सत्कार करना चाहिये। सत्कार न पाकर यदि वह अन्यत्र चला जाता है तो अधिक पाप प्रदान करता है। जो अतिथिको भोजन करानेसे बचे हुए अन्नको स्वयं ग्रहण करता है, वह इस लोकमें दीर्घायु और धनवान् होता है। अतिथिको हटाकर स्वयं भोजन करनेवाला गृहस्थ पापका भागी होता है। वैश्वदेवकर्मके अन्तमें और सूर्यास्तके समय जो आता है वही अतिथि है। जो पहलेका आया हो अथवा कहींका देखा हुआ (परिचित) हो वह अतिथि नहीं है। छोटे बालक, (वृद्ध,) स्ववासिनी (पिताके घरमें रहनेवाली स्त्री), गर्भवती और अत्यन्त रोगी स्त्री-पुरुषोंको अतिथिसे पहले भी भोजन कराया जा सकता है। इसमें विचार नहीं करना चाहिये। देवता, पितर और मनुष्योंको देकर खानेवाला गृहस्थ अमृतभोजन करता है। जो केवल अपना पेट पालनेवाला है और अपने ही लिये रसोई बनाता है, वह मनुष्य पापमय भोजन करता है²। शूद्रको कभी वैदिक मन्त्रका श्रवण नहीं कराना चाहिये। उसे वेद-मन्त्रका श्रवण करानेपर ब्राह्मण ब्राह्मणत्वसे और शूद्र अपने धर्मसे गिर जाता है। ब्राह्मण आदि वर्णोंकी सेवा ही शूद्रोंका परम धर्म माना गया है। सदा मंगलमय वचन ही बोले, सबके मंगलका ही चिन्तन करे, कल्याणमय महापुरुषोंका ही संग करे, अमंगलकारी दुष्टोंका साथ कभी न करे³। बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह रूप, धन और कुलसे हीन मनुष्योंपर कभी आक्षेप न करे। मन, वाणी और जिह्वाके वेगको रोके। घूस, जुआ, दूतीपन और पीड़ित मनुष्यके धनको दूरसे ही त्याग दे। इस प्रकार देवता, ऋषि और पितरोंके ऋणसे उऋण होकर घरका सारा कार्यभार पुत्रको सौंप दे और स्वयं घरपर तटस्थ होकर रहे। घरमें रहकर भी ज्ञानका अभ्यास करे अथवा काशीकी शरण ले। क्योंकि सम्यग्ज्ञानसे मुक्ति प्राप्त होती है अथवा विश्वनाथपुरी काशीमें मुक्ति मिलती है। आज, कल, परसों अथवा सौ वर्ष बाद मृत्यु निश्चित है, शरीर शीघ्र जानेवाला है, अतः यदि वह काशीमें मृत्युको प्राप्त हो तो मनुष्य अमृत (मुक्त) हो जाता है। सदाचारी पुरुषको ही सदाके लिये काशी सुलभ होती है। अतः विद्वान् पुरुष मनसे भी सदाचारका उल्लंघन न करे। बड़ा भारी उपद्रव आनेपर भी जो काशीसे विलग न होने दे, वही महायोग है। अन्य जितने योग हैं, वे सब उपयोग हैं। भगवान् विश्वनाथको जो नियमपूर्वक शुद्ध हृदयसे पत्र, पुष्प, फल और जल अर्पण किया जाता है, वह यहाँ महादान ही है। भगवान् विश्वनाथके दक्षिण भागमें बैठकर हृदयमें उनका चिन्तन करते हुए जो क्षणभरके लिये नेत्र बंद किया जाता है, यही उत्तम महायोग है।

एक समयकी बात है। प्रजापति ब्रह्माजीने राजर्षियोंमें श्रेष्ठ राजा रिपुंजयको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। रिपुंजय अविमुक्त नामक महाक्षेत्रमें मन, इन्द्रियोंको वशमें करके तपस्या कर रहे थे। उनका जन्म राजा मनुके वंशमें हुआ था। वे वीर तो थे ही, मूर्तिमान् क्षत्रियधर्मकी भाँति


१- अनर्चितोऽतिथिर्गेहाद् भग्नाशो यस्य गच्छति । आजन्मसञ्चितात्पुण्यात् क्षणात् स हि बहिर्भवेत् ॥
(स्क० पु०, का० पू० ३८ । २९)
२- कुमाराश्च स्ववासिन्यो गर्भिण्योऽतिरुजान्विताः । अतिथेरादितोऽप्येते भोज्या नात्र विचारणा ॥
पितृदेवमनुष्येभ्यो दत्त्वाश्नात्यमृतं गृही । स्वार्थं पचन्नघं भुङ्क्ते केवलं स्वोदरंभरिः ॥
(स्क० पु०, का० पू० ३८ । ३६-३७)
३- भद्रमेव वदेन्नित्यं भद्रमेव विचिन्तयेत् । भद्रैरेवेह संसर्गो नाभद्रैश्च कदाचन ॥ (स्क० पु०, का० पू० ३८ । ८४)