भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 842
  • काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ८१३ ---|---

प्रकट हुए थे। उनके समीप जाकर ब्रह्माजीने कहा—'महामते! तुम समुद्र, पर्वत और वनोंसहित समूची पृथ्वीका पालन करो। नागराज वासुकि तुम्हें पत्नी बनानेके लिये नागकन्या अनंगमोहिनीको देंगे। देवता भी प्रतिक्षण तुम्हारे प्रजापालनसे सन्तुष्ट होकर तुम्हें स्वर्गीय रत्न और पुष्प प्रदान करते रहेंगे। इसलिये 'दिवो दास्यन्ति' इस व्युत्पत्तिके अनुसार तुम्हारा नाम 'दिवोदास' होगा। राजन्! मेरे प्रभावसे तुम्हें दिव्य सामर्थ्यकी प्राप्ति होगी।'

ब्रह्माजीकी बात सुनकर राजाओंमें श्रेष्ठ रिपुंजयने उनकी अनेक प्रकारसे स्तुति की और इस प्रकार कहा—पितामह! मनुष्योंसे भरे हुए इस भूतलपर क्या दूसरे राजालोग नहीं हैं? मुझे ही ऐसी आज्ञा क्यों मिल रही है?

ब्रह्माजीने कहा—राजन्! तुम राज करोगे तो इन्द्रदेव इस पृथ्वीपर वर्षा करेंगे। दूसरा कोई पापनिष्ठ राजा राज्य करेगा तो देव वर्षा नहीं करेंगे।

राजा बोले—महामान्य पितामह! आप स्वयं ही तीनों लोकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, तो भी आप मुझे जो यह यश दे रहे हैं, यह आपका मेरे ऊपर महान् प्रसाद है। अतः मैं आपकी आज्ञा शिरोधार्य करता हूँ। परन्तु मुझे भी कुछ आपसे निवेदन करना है। यदि मेरे लिये मेरी इस प्रार्थनाको आप स्वीकार कर लेंगे तो मैं भूतलका अकण्टक राज्य करूँगा।

ब्रह्माजीने कहा—राजन्! तुम्हारे मनमें जो बात है, उसे शीघ्र कहो।

राजा बोले—पितामह! यदि मैं पृथ्वीका अधिपति होऊँ तो देवलोकके निवासी देवगण अपने ही लोकमें ठहरें, भूलोकमें न आवें। जब देवता देवलोकमें रहेंगे और मैं इस पृथ्वीपर निवास करूँगा तब यहाँ अकण्टक राज्य होनेसे प्रजावर्गको सुखकी प्राप्ति होगी।

'तथास्तु' कहकर ब्रह्माजीने जब उनकी प्रार्थना स्वीकार की, तब राजा दिवोदासने डंका बजाकर राज्यमें यह घोषणा करवा दी कि 'देवतालोग स्वर्गको चले जायँ और नागगण भी यहाँ कभी न आयें, जिससे मनुष्य स्वस्थ एवं सुखी रहें। पृथ्वीपर मेरे राज्य-शासनकालमें देवता स्वर्गमें सुखी रहें और मनुष्य पृथ्वीपर स्वस्थ रहें।'


गृहस्थोचित शिष्टाचार और धर्म

स्कन्दजी कहते हैं—महामते कुम्भज! अपनेको कल्याण प्रदान करनेवाले इस अविमुक्त क्षेत्र (काशी)-की प्राप्ति जिस प्रकार सम्भव है, उसे मैं बतलाता हूँ। पुण्यराशिसे मनोवांछित वस्तुकी प्राप्ति होती है और वह पुण्य वैदिक मार्गके सेवनसे उपलब्ध होता है। जो वैदिक मार्गका सेवन करता है उसके स्पर्शमात्रसे अवसर पाकर मनुष्यपर घात करनेकी इच्छा रखनेवाले कलि और काल दोनों नष्ट हो जाते हैं। निषिद्ध कर्मोंके सेवन और विहित कर्मोंके त्यागसे छिद्र देखकर