भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 843

८१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


कलि और काल ब्राह्मणको नष्ट कर देते हैं। प्याज, लहसुन, लसोड़ेका फल (लहेसुवा), गाजर, दस दिनके भीतर ब्यायी हुई गौका दूध और धरतीका फूल—इन सबको त्याग देना चाहिये। वृक्ष काटनेसे निकलनेवाले गोंद, देवता-पितरोंको निवेदन किये बिना खीर, पूआ और पूड़ी तथा बिना बछड़ेकी गायका दूध—ये सब त्याग देने चाहिये। एक खुरके पशुका दूध त्याज्य है। ऊँटनी और भेड़का दूध भी नहीं ग्रहण करना चाहिये। रातमें दही नहीं खाना चाहिये। मछलीका सर्वथा त्याग करना चाहिये। आयु तथा स्वर्गकी इच्छा रखनेवालेको यत्नपूर्वक मांसका त्याग करना चाहिये। बासी अन्न सभी त्याग देनेयोग्य है, परंतु घीका बना हुआ बासी अन्न भी ग्राह्य है। जो अज्ञानी अपने शरीरकी पुष्टिके लिये दूसरे जीवोंकी हत्या करता है, उस दुराचारीको न तो इस लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें ही। जो मांस खाता है, जो जीवोंको मारनेकी अनुमति देता है, जो मांस पकाता है, जो उसको खरीदता और जो बेचता है, जो अपने हाथसे मारता है, जो बाँटता-परोसता है तथा जो आज्ञा देकर जीवहिंसा कराता है—ये आठ प्रकारके मनुष्य हिंसक माने गये हैं।^१ जो सौ वर्षोंतक प्रत्येक वर्षमें अश्वमेध यज्ञद्वारा यजन करता है तथा जो मांस-भक्षण नहीं करता है, इन दोनोंकी परस्पर तुलना की जाय तो मांसका त्याग करनेवाला ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है^२। सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह जैसे अपने-आपको सुखी देखना चाहता है उसी प्रकार दूसरेको भी देखे। अपने और दूसरेमें बराबर ही सुख-दुःख होते हैं। दूसरे किसी जीवको जो सुख या दुःख दिया जाता है वह सब पीछे चलकर अपनेपर ही संघटित होता है। क्लेश उठाये बिना धन नहीं मिलता और धनके बिना कार्य कैसे हो सकते हैं। जो कर्म नहीं कर सकता, उसके द्वारा धर्मका अनुष्ठान कैसे सम्भव होगा और जो धर्महीन है उसे सुख कहाँसे मिलेगा। सुखकी अभिलाषा सभी रखते हैं। परंतु सुख धर्मसे ही प्राप्त होता है। अतः चारों वर्णोंके मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने धर्मका पालन करना चाहिये। न्यायोपार्जित द्रव्यसे पारलौकिक कर्म करना चाहिये और उसीसे उत्तम देश, काल और पात्रमें विधि एवं श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये। जो अपने धनद्वारा माता-पितासे हीन बालकोंका यज्ञोपवीत और ब्याह आदि संस्कार करवाता है, उसे अक्षय कल्याणकी प्राप्ति होती है। गायको पेन्हानेमें बछड़ेका मुख पवित्र है और फल गिरानेमें पक्षीकी चोंच पवित्र मानी गयी है। बकरे और घोड़ेका मुख पवित्र है। गौएँ पीठकी ओरसे शुद्ध मानी गयी हैं तथा ब्राह्मणोंके चरण पवित्र हैं। यदि किसीने स्त्रीसे बलात् भोग कर लिया हो अथवा वह चोरके हाथमें पड़ गयी हो तो भी अपनी प्रिय पत्नीका परित्याग नहीं करना चाहिये। उसके त्यागका विधान नहीं है^३। खटाईसे ताँबेके पात्रकी शुद्धि होती है, राखसे काँसेका बर्तन शुद्ध होता है, पत्नी रजोधर्मसे शुद्ध होती है और नदी प्रवाहसे पवित्र होती है। जो मनसे भी यहाँ पर-पुरुषका चिन्तन नहीं करती वह स्वर्गलोकमें पार्वतीजीके साथ सुख भोगती है और इस लोकमें भी सुयशकी भागिनी होती है।^४

पिता, पितामह, भ्राता, कुलका कोई भी पुरुष


१- यो जन्तूनात्मपुष्ट्यर्थं हिनस्ति ज्ञानदुर्बलः। दुराचारस्य तस्येह नामुत्रापि सुखं क्वचित्॥
भोक्तानुमन्ता संस्कर्ता क्रयिविक्रयिहिंसकाः। उपहर्ता घातयिता हिंसकाश्चाष्टधा स्मृताः॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। २१-२२)
२- प्रत्यब्दमश्वमेधेन शतं वर्षाणि यो यजेत्। अमांसभक्षको यश्च तयोरन्त्यो विशिष्यते॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। २३)
३- बलात्कारोपभुक्ता वा चौरहस्तगतापि वा। न त्याज्या दयिता नारी नास्यास्त्यागो विधीयते॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। ४७)
४- मनसापि हि या नेह चिन्तयेत् पुरुषान्तरम्। सोमया सह सौख्यानि भुङ्क्ते चात्रापि कीर्तिभाक्॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। ४०)