संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 844, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ८१५
तथा माता—ये क्रमशः कन्यादानके अधिकारी हैं। इनमें पहले-पहलेके न रहनेपर दूसरा-दूसरा कन्यादान कर सकते हैं। कुलमें कोई भी कन्यादाता न हो तो कन्या स्वयं ही किसी योग्य पतिको वरण कर सकती है। अनिच्छापूर्वक बलात्कार हो जानेसे ऋतुकालमें स्त्रीकी शुद्धि हो जाती है। स्त्रियोंके सत्कारका अवसर आनेपर तथा उत्सवोंमें उन्हें वस्त्र-आभूषण और उत्तम अन्न आदि देकर सदा सम्मानित करना चाहिये। जहाँ भूषण, वस्त्र और अन्न आदिसे पूजित होकर स्त्रियाँ प्रसन्न रहती हैं वहाँ सब देवता सुखपूर्वक निवास करते हैं और वहाँ किये हुए समस्त सत्कर्म सफल होते हैं। जिस घरमें पतिसे पत्नी और पत्नीसे पति सन्तुष्ट रहते हैं वहाँ पग-पगपर कल्याणकी प्राप्ति होती है^१। अहुत, हुत, प्रहुत, प्राशित तथा ब्राह्महुत—ये पाँच यज्ञ शुभ बताये गये हैं। इनमें जपको अहुत यज्ञ कहते हैं, होमका नाम हुत यज्ञ है, बलिवैश्वदेवको प्रहुत यज्ञ कहते हैं, पितरोंकी तृप्तिके लिये श्राद्ध आदि करना प्राशित यज्ञ है और ब्राह्मणोंका सत्कार करके उनको भोजन कराना ब्राह्महुत यज्ञ कहलाता है। इन पाँचों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला ब्राह्मण कभी दुखी नहीं होता और इनके न करनेसे वह पाँच प्रकारकी हिंसाओंका भागी होता है।
ब्राह्मणके साथ समागम होनेपर उससे कुशल पूछे, क्षत्रियसे अनामय (स्वास्थ्य) पूछे, वैश्यसे सुख और शूद्रसे सन्तोष पूछे। जो अपने द्वारा पोषण करनेयोग्य कुटुम्बीजन और सेवक आदि हैं उनका पालन-पोषण लौकिक और पारलौकिक दोनों फलोंका देनेवाला है और यदि उनका पालन नहीं किया जाय तो पाप होता है। अतः प्रयत्नपूर्वक उनके भरण-पोषणमें तत्पर रहना चाहिये। माता, पिता, गुरु, पत्नी, सन्तान, शरणागत व्यक्ति, अभ्यागत, अतिथि और अग्नि—ये नौ पोष्यवर्गके अन्तर्गत हैं। जो पुरुष इस लोकमें अनेक व्यक्तियोंकी जीविका चलाता है, उसीका जीवन सफल है। जो केवल अपना ही पेट भरता है, वह जीते-जी मृतकके तुल्य जाननेयोग्य है। जो देवता, पितर आदि सबको उनका यथायोग्य भाग अर्पण करता है, दयावान्, सुशील, क्षमाशील और देवता एवं अतिथियोंका भक्त है वह गृहस्थ धार्मिक माना गया है। रातके मध्यमें जो दूसरे और तीसरे प्रहर हैं, उनमें ही जो सोता और यज्ञशेष अन्नका भोजन करता है वह ब्राह्मण कभी दुखी नहीं होता। अभ्यागतके आनेपर गृहस्थको सदा ये नौ बातें करनी चाहिये, जो अमृतके समान मंगलकारक हैं—सौम्य वचन, सौम्य दृष्टि, सौम्य मन, सौम्य मुख, उठकर स्वागत करना, ‘आइये-बैठिये’ ऐसा कहना, स्नेहपूर्वक वार्तालाप करना, अतिथिके समीप बैठकर उसकी सेवा करना और जब वह जाने लगे तो उसके पीछे-पीछे पहुँचानेके लिये कुछ दूरतक जाना। ये नौ बातें गृहस्थकी उन्नति करनेवाली हैं। इसके सिवा जिनके करनेमें बहुत कम खर्च हैं, ऐसी नौ बातें और हैं, जो अवश्य करने योग्य हैं—अभ्यागतको आसन देना, उसके पैर धोना, उसे यथाशक्ति भोजन कराना, सोने-बैठनेके लिये भूमि, शय्या, तृण, जल, अभ्यंग (तैल-उबटन देना) और दीपक—ये नौ कार्य गृहस्थको सिद्धि देनेवाले हैं। चुगली, परस्त्रीसेवन, द्रोह, क्रोध, असत्यभाषण, अप्रिय वचन बोलना, द्वेष, दम्भ (पाखण्ड) और माया (छल-कपट)—ये नौ दुर्गुण स्वर्गका मार्ग रोकनेके लिये साँकलके समान हैं। अब नौ आवश्यक कर्म बतलाये जाते हैं, जो द्विजोंके द्वारा प्रतिदिन करने योग्य हैं—स्नान, सन्ध्या, जप, होम, स्वाध्याय, देवपूजा, बलिवैश्वदेव, अतिथि-सत्कार और पितृतर्पण^२।
१- यत्र तुष्यति भर्त्रा स्त्री स्त्रिया भर्ता च तुष्यति । तत्र वेश्मनि कल्याणं सम्प्रद्येत पदे पदे॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। ६०)
२- नवावश्यककर्माणि कार्याणि प्रतिवासरम् । स्नानं सन्ध्या जपो होमः स्वाध्यायो देवतार्चनम्॥
वैश्वदेवं तथाऽऽतिथ्यं नवमं पितृतर्पणम् ।
(स्क० पु०, का० पू० ४०। ७७)