संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मुने! नौ बातें परम गोपनीय हैं, उनको सुनिये— अपने जन्मका नक्षत्र, मैथुनकर्म, मन्त्र, अपने घरका कोई कलंक, छलना अथवा छला जाना, अपनी आयु, धन, अपमान और पत्नी— ये कभी किसी प्रकार भी प्रकाशमें लानेयोग्य नहीं हैं। सुपात्र, मित्र, विनययुक्त, दीन, अनाथ, उपकारी, माता-पिता और गुरु— इन नौ प्रकारके मनुष्योंको जो कुछ दिया जाता है वह अक्षय होता है। चिकनी-चुपड़ी बातें करनेवाले, चारण (प्रशंसाके गीत गानेवाले), चोर, अयोग्य वैद्य, धूर्त, छली, शठ, पहलवान और वन्दी— इन नौ व्यक्तियोंको जो कुछ दिया जाता है वह निष्फल होता है। अपनी स्त्री, शरणागत पुरुष, दूसरेकी धरोहर, बन्धक, कुलकी जीविका, अधिक समयतकके लिये घरमें रखी हुई दूसरेकी वस्तु, स्त्रीका धन, पुत्र तथा पुत्र रहते हुए सर्वस्व— ये नौ वस्तुएँ आपत्तिकालमें भी किसी दूसरेको नहीं देनी चाहिये। जो मूढात्मा इन वस्तुओंको देता है, वह अनेकों प्रायश्चित्त करनेपर ही शुद्ध होता है। सत्य, शौच, अहिंसा, क्षमा, दान, दया, दम (मन-इन्द्रियोंका संयम), अस्तेय (चोरीसे दूर रहना) तथा इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटाकर अपने भीतर स्थापित करना (प्रत्याहार)— ये नौ सबके लिये धर्मके साधन हैं१। जिसकी जिह्वा, स्त्री, पुत्र, भाई, मित्र, सेवक और आश्रित मनुष्य— ये सभी विनयशील हों उसका सर्वत्र गौरव है। मदिरापान, दुष्टोंका संग, पतिसे अलग रहना, स्वच्छन्द घूमना, अधिक सोना, दूसरेके घरमें निवास करना— ये छः बातें स्त्रियोंको दूषित करनेवाली हैं२।
जबतक तैयार किया हुआ अन्न गरम रहता है, जबतक उसे मौनपूर्वक भोजन किया जाता है और जबतक उस अन्न या हविष्यके गुणोंका वर्णन नहीं किया जाता, तबतक ही पितरलोग जीमनेवाले ब्राह्मणोंके साथ उस अन्नको भोजन करते हैं। विद्वान् और विनयशील वेदज्ञ ब्राह्मण जब घरपर आता है, तब घरके सब अन्न हर्षसे उछलने लगते हैं कि ‘अब हम उत्तम गतिको प्राप्त होंगे।’ शौच, व्रत और आचारसे रहित वैदिक ज्ञानसे शून्य मूर्ख ब्राह्मणको जब कोई अन्न दिया जाता है, तब वह अव्यक्त स्वरमें रोता है कि ‘मैंने कौन-सा पाप किया था जो ऐसे व्यक्तिके उपयोगमें आया।’ जिस ब्राह्मणके पेटमें गया हुआ अन्न वेद-वेदांगोंके अभ्यासद्वारा पचता है वह दाताको और उसकी पिछली दस-दस पीढ़ियोंको भी तार देता है। जो ज्येष्ठ भ्राताके अविवाहित रहते हुए स्वयं विवाह करता और अग्निहोत्रकी दीक्षा लेता है उसे परिवेत्ता जानना चाहिये। उसका बड़ा भाई ‘परिवित्ति’ कहलाता है। परिवित्ति, परिवेत्ता तथा जिस कन्यासे विवाह करनेके कारण यह ‘परिवेत्ता’ संज्ञा प्राप्त होती है, वह कन्या, उसका दान करनेवाला पिता तथा वह विवाह करानेवाला पुरोहित— ये पाँचों नरकमें पड़ते हैं। यदि बड़ा भाई नपुंसक हो, परदेश (भारतेतर विलायत आदि)-में रहने लग जाय, गूँगा हो, संन्यास ले या जड़ (अत्यन्त मूर्ख), कुब्ज (कुबड़ा), खर्व (नाटा) अथवा पतित हो जाय तो छोटे भाईके विवाह कर लेनेमें कोई दोष नहीं है। जो संन्यासी हो जानेके बाद पुनः मैथुनका सेवन करता है, वह साठ हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। जो ब्राह्मण गोरक्षा और वाणिज्य-वृत्तिको अपना ले, कारीगर अथवा शिल्पी हो जाय, किसीकी दासता स्वीकार कर ले अथवा सूदपर रुपया लगावे तो वह शूद्रवत् बर्ताव करनेयोग्य होता है। देवताके धनको बाँटकर लेने, ब्राह्मणके धनका अपहरण करने तथा ब्राह्मणका तिरस्कार करनेसे समूचे कुलका शीघ्र विनाश हो जाता है। जो वाणीसे प्रतिज्ञा करके क्रियाद्वारा पूर्ण नहीं किया गया वह धर्मयुक्त ऋण इहलोक और परलोकमें भी बढ़ता
१- सत्यं शौचमहिंसा च क्षान्तिर्दानं दया दमः। अस्तेयमिन्द्रियाकोचः सर्वेषां धर्मसाधनम्॥ (स्क० पु०, का० पू० ४०।८६)
२- पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम्। स्वप्नोऽन्यगृहवासश्च नारीणां दूषणानि षट्॥ (स्क० पु०, का० पू० ४०।८९)