भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 846, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 846

* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *

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है। श्रेष्ठ द्विज स्नान करके जलद्वारा जो पितरोंका तर्पण करता है, उसीसे पितृयज्ञका सारा फल पा लेता है। जो यज्ञकर्ममें संलग्न हैं, किसी यज्ञ या मन्त्रकी दीक्षा ले चुके हैं अथवा जो संन्यासी, ब्रह्मचारी तथा कर्म करनेवाले ऋत्विज हैं, उनको सूतक नहीं लगता। श्मशान वृक्ष, चिता, यूप और शिवनिर्माल्य भोजन करनेवाले तथा वेद बेचनेवालेका स्पर्श कर लेनेपर वस्त्रसहित जलमें प्रवेश करके स्नान करे। अग्निशाला, गोशाला, देवता और ब्राह्मणके समीप तथा स्वाध्याय, भोजन और जलपानके समय खड़ाऊँ और जूते उतार देने चाहिये। धर्मशास्त्ररूपी रथपर चढ़े हुए और वेदरूपी खड्ग धारण करनेवाले ब्राह्मण खिलवाड़में भी जो कुछ कह दें, वह सब परम धर्म माना गया है। नीलमें रँगा हुआ वस्त्र दूरसे ही त्याग देना चाहिये। नीलके पालन, विक्रय और उसकी वृत्तिसे जीविका चलानेमात्रसे ब्राह्मण अपवित्र हो जाता है और तीन कृच्छ्र व्रत करनेपर उसकी शुद्धि होती है। जो नीलका रँगा हुआ वस्त्र पहनता है, उसके स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण और पंच महायज्ञ—ये सभी व्यर्थ हो जाते हैं। ब्राह्मण जब अपने अंगोंपर नीलका रँगा वस्त्र धारण कर लेता है, तब वह उस वस्त्रके ताने-बानेमें जितने सूत लगे हैं, उतने नरकोंमें निश्चय ही निवास करता है^{१}। एक दिन-रात उपवास करके पंचगव्य पीनेसे उसकी शुद्धि होती है। नीलके रँगे वस्त्र धारण करके जो रसोई बनायी जाती है, उस अन्नको जो खाता है, वह मानो विष्ठा भोजन करता है। वह अन्न देनेवाला यजमान नरकमें जाता है।^{२}

बलिवैश्वदेव, होम, देवपूजा, जप तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंद्वारा संस्कृत होनेसे ब्राह्मणका अन्न अमृत कहा गया है। व्यवहारके अनुरूप, न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए जिस अन्नका उपार्जन किया जाता है, वह क्षत्रियका अन्न दूधके समान है। यदि वैश्य सीता-यज्ञकी विधिके अनुसार एक पहरतक जोते जानेवाले बैलोंसे अन्न उत्पन्न करके देता है तो उसके द्वारा संस्कृत अन्न वास्तवमें अन्न कहा गया है। श्रेष्ठ मनुष्य छोटी-छोटी बातके लिये शपथ न करे। व्यर्थ शपथ करनेवाला मनुष्य इहलोक और परलोकमें भी नष्ट होता है। विद्वान् पुरुष यमराजको यमराज नहीं कहते, अपना मन ही यमराज कहलाता है। जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, उसका यमराज क्या कर लेगा? क्षमावाले पुरुषोंके लिये एक ही दोष है कि संसारके लोग उस क्षमाशील मनुष्यको असमर्थ (दुर्बल) मानते हैं। जो सदा एकान्तमें रहनेवाला, देवताकी आराधनामें तत्पर, सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी प्रीतिसे दूर रहनेवाला तथा स्वाध्याय-योगमें मनको लगाये रखनेवाला है और जो कभी भी किसी जीवकी हिंसा नहीं करता, ऐसे पुरुषको निश्चय ही मोक्षकी प्राप्ति होती है^{३}। परंतु काशीमें इन गुणोंके बिना भी सहज ही मुक्ति हो जाती है। वहाँ भगवान् विश्वनाथकी सेवा ही योग है, काशीवास ही तपस्या है, उत्तरवाहिनी गंगामें स्नान ही व्रत, दान, यम और नियमका पालन है।

जो न्यायसे धनका उपार्जन करता है, तत्त्वज्ञानमें स्थित है, अतिथियोंको प्यार करनेवाला है तथा श्राद्धकर्ता और सत्यवादी है, वह गृहस्थ


१. स्नानं दानं तपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम्। वृथा तस्य महायज्ञा नीलीवासो बिभर्ति यः॥
नीलीरक्तं यदा वस्त्रं विप्रः स्वाङ्गेषु धारयेत्। तन्तुसन्ततिसंख्याके नरके स वसेद् ध्रुवम्॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। १४४-१४५)
२. नीलीरक्तेन वस्त्रेण यदन्नमुपकल्पयेत्। भोक्ता विष्ठासमं भुङ्क्ते दाता च नरकं व्रजेत्॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। १४७)
३. एकान्तशीलस्य सदैव तस्य सर्वेन्द्रियप्रीतिनिवर्तकस्य। स्वाध्याययोगे गतमानसस्य मोक्षो ध्रुवं नित्यमहिंसकस्य॥
(स्क० पु०, का० पू० ४०। १६१)

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