भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 854
* काशीखण्ड-पूर्वार्ध *८२५

जिसे पाकर मनुष्य पुनः इस संसारमें नहीं लौटता और जिसकी प्राप्ति होनेपर शोकसे सदाके लिये छुटकारा मिल जाता है, उस पदको योगी षडंगयोगकी साधनासे पा लेता है, परंतु इन्द्रियोंकी वृत्ति चंचल होनेसे और कलियुगमें पापके बढ़नेसे थोड़ी आयुवाले मनुष्योंको यहाँ योगका महान् अभ्युदय कहाँ प्राप्त हो सकता है? इसीलिये करुणासागर भगवान् विश्वनाथ जीवोंको महोदय पद प्रदान करनेके लिये काशीपुरीमें विराजमान हैं। जीव काशीमें जिस प्रकार सुखसे कैवल्य प्राप्त कर लेते हैं, उस प्रकार अन्य किसी स्थानमें योग, युक्ति आदि उपायोंके द्वारा भी नहीं पा सकते हैं, क्योंकि काशीपुरीसे अपने शरीरका संयोग करा देना ही उत्तम योग बताया गया है। इस संसारमें दूसरे किसी योगके द्वारा मनुष्यकी शीघ्र मुक्ति नहीं होती है।


मृत्युसूचक चिह्नोंका वर्णन

**अगस्त्यजीने पूछा—**स्कन्दजी! मृत्यु निकट आ गयी है, यह बात कैसे जानी जाय?

**कार्तिकेयजीने कहा—**मुने! मृत्यु निकट आनेपर जो चिह्न प्रकट होते हैं, उन्हें सुनो। जिसकी दाहिनी नासिकामें एक दिन-रात अखण्डरूपसे वायु चलती रहती है, उसकी आयु तीन वर्षमें समाप्त हो जाती है और जिसका दक्षिण श्वास लगातार दो दिन या तीन दिनतक निरन्तर चलता रहता है, उसके जीवनकी अवधि इस संसारमें केवल एक वर्षकी बतायी जाती है। यदि दोनों नासिकाछिद्र दस दिनतक निरन्तर ऊर्ध्व श्वासके साथ चलते रहें तो मनुष्य तीन दिनतक जीवित रह सकता है। यदि श्वासवायु नासिकाके दोनों छिद्रोंको छोड़कर मुखसे बहने लगे तो दो दिनके पहले ही उसका यमलोकके मार्गपर प्रस्थान हो जायगा, यह सूचित कर देना चाहिये। जिस कालमें मृत्यु अकस्मात् निकट आ जाती है, मृत्युके भयसे डरनेवाले पुरुषको उस कालका प्रयत्नपूर्वक विचार करना चाहिये। जब सूर्य सप्तम राशिपर हों और चन्द्रमा जन्मनक्षत्रपर आ गये हों, तब यदि दाहिनी नासिकासे श्वास चलने लगे तो उस समय सूर्यदेवतासे अधिष्ठित काल प्राप्त होता है। उसपर विशेष लक्ष्य रखना चाहिये। जो अकस्मात् किसी काले-पीले पुरुषको देखता है, फिर उसी क्षण उसके रूपको अदृश्य पाता है, वह केवल दो वर्ष और जीवित रह सकता है। जिसके मल-मूत्र और वीर्य अथवा मल-मूत्र एवं छींक एक साथ ही गिरते हैं, उसकी आयु केवल एक वर्ष और शेष है, ऐसा मानना चाहिये। जो इन्द्रनीलमणिके समान रंगवाले नागोंके झुंडको आकाशमें इधर-उधर फैला हुआ देखता है, वह छः महीने भी जीवित नहीं रहता। जिसकी मृत्यु निकट है, वह अरुन्धती और ध्रुवको भी नहीं देख पाता। जो अकस्मात् नीले-पीले आदि रंगोंको तथा कड़ुवे, खट्टे आदि रसोंको विपरीतरूपमें देखने और अनुभव करने लगता है, वह छः महीनेमें मृत्युका भागी होता है। वीर्य, नख और नेत्रोंका कोना—ये सब यदि नीले या काले रंगके हो जायँ तो मनुष्य छठे मासमें यमपुरीकी यात्रा करता है। भलीभाँति स्नान करनेके बाद भी जिनका हृदय शीघ्र ही सूख जाता है तथा हाथ और पैर भी जल्दी ही सूख जाते हैं, उसका जीवन केवल तीन मासतक चलता है। जो मनुष्य जल, घी और दर्पण आदिमें अपने प्रतिबिम्बका मस्तक नहीं देखता, वह एक मासतक जीवित रहता है। बुद्धि भ्रष्ट हो जाय, वाणी स्पष्ट न निकले, रातमें इन्द्रधनुषका दर्शन हो, दो चन्द्रमा और दो सूर्य दिखायी दें तो ये सब मृत्युसूचक चिह्न हैं। इन सब चिह्नोंमेंसे यदि एक चिह्नको भी मनुष्य देखता है तो मृत्यु केवल एक मासतक उसकी प्रतीक्षा करती है। हाथसे कान बंद कर लेनेपर जब किसी प्रकारकी आवाज न सुनायी